पहला प्यार

अनुगूँज पाँचवा आयोजनAkshargram Anugunj

कहते है प्यार किया नही जाता हो जाता है.प्यार एक खूबसूरत जज्बा है, जिसका सिर्फ एहसास किया जा सकता है, शब्दो मे बयान करना शायद सम्भव नही होगा, फिर भी मै कोशिश करता हूँ, अपनी बात कहने की.इसके पहले एक डिसक्लेमर “मै अपनी मौजूदा जिन्दगी से बहुत खुश हूँ और पहले प्यार की बात सुनकर कोई मेरे ऊपर जूता चप्पल ना उठावे, यहाँ पर पिछली बाते हो रही है, इसलिये इसको एक संस्मरण की तरह ही लिया जाय,दिल से ना लगाया जाय”

बस इक झिझक है यही हाल ए दिल सुनाने मे
तेरा भी जिक्र आयेगा इस फसाने मे.

बात उन दिनो की है जब मै नवीं क्लास मे पढता था. पढाई मे मै काफी अव्वल था.हमारे घर मे ज्यादा जगह ना होने की वजह से मैने पढाई के लिये छत पर डेरा डाला, लगभग सारा समय छत पर ही गुजरता था. हमारे घर के सामने वाले मकान मे एक जैन परिवार ने आकर रहना शुरु किया.जिनकी सबसे बड़ी लड़की भी हाईस्कूल मे पढती थी. हम दोनो के कालेज अलग अलग थे,अलबत्ता कुछ सब्जेक्ट कामन थे.उनके घरवालो ने जब मेरे को देखा कि काफी पढाकू हूँ और अपनी बेटी को भी मेरे से कुछ सीखने की प्रेरणा देने के लिये एक दिन उन्होने मेरे को अपने घर बुलवाया और अपनी बेटी “??? जैन” से मिलवाया. मैने भी शरमाते हुए उससे बात की. फिर बातें शुरु हो गयी पढाई की. जैन अंकल ने मुझसे अपनी बेटी की हैल्प करने के लिये कहा, जो कुछ विषयों,खासकर अंग्रेजी मे कमजोर थी, मैने सकुचाते हुए स्वीकार कर लिया.हफ्ते मे एक या दो दिन मिलने का समय तय हुआ. कभी मै उनके घर चला जाता था, कभी वो मेरी घर या कहो छत पर आ जाती थी. कभी भी हमने पढाई के अलावा कोई बात नही की. और ऐसा कोई आकर्षण भी नही था, एक दूसरे के प्रति. उसके घरवालो ने भी उसको छत पर एक शैड डलवाकर दी, ताकि वो भी इत्मीनान से अपनी पढाई कर सके. वो अपनी छत पर पढती और मै अपनी छत पर.बस कभी नजरे मिली तो एक दूसरे को देखकर मुस्करा दिये बस.

वैसे तो मै काफी बढबोला और खुराफाती किस्म का बन्दा था, लेकिन ना जाने क्यो उसके सामने मेरा सारा बढबोलापन गायब हो जाता था, मुँह से कोई बोल ही नही फूटता था,सिवाय पढाई की बातों के,धीरे धीरे हमने पढाई के अलावा दूसरी बाते भी करना शुरु कर दी, लेकिन कभी भी रूमानियत वाली बातें नही की.उसकी किस्मत कहो या मेहनत,उसके काफी अच्छे नम्बर आये, उसके घरवाले खुश थे, कि मेरी मदद से उनकी लड़की मे इम्प्रूवमेन्ट आ रहा है.धीरे धीरे हम दोनो का एक दूसरे के घर आना जाना शुरु हो गया. अब हम काफी घुलमिल गये थे, और हर तरह की बाते करने लगे थे.वो हमेशा मेरी तारीफ किया करती, और बोलती कि मेरे को बहुत तरक्की करनी है, वगैरहा वगैरहा.मै लड़कियों की तरह शरमाते हुए उसकी बातें सुनता, मेरे को कोई जवाब नही सूझता. अक्सर वो मेरे से वह कुछ ऐसा मजाक करती कि मै उसका जवाब ना दे पाता. धीरे धीरे मेरे को उसकी बाते अच्छी लगने लगी….और मुझे उसका इन्तजार रहने लगा, जब कभी वो ना आती तो, मेरा दिल बैचेन होने लगा, अक्सर मुझे ख्यालो मे उसका चेहरा दिखायी देता और मै मन ही मन मुस्करा देता.अब मेरे को नही पता था कि उस तरफ क्या हाल है, और जानने की कोशिश भी नही की. क्योंकि पहली प्राथमिकता तो हाईस्कूल पार करने की थी. हम दोनो ही अच्छे परसेन्टेज से पास हुए. अब दो महीने की गर्मियों की छुट्टियाँ थी. मै अपने ननिहाल ग्वालियर चला गया और वो अपने ननिहाल खन्डवा, हमारे परिवार मे पहाड़ो पर जाने का रिवाज नही था, सो गर्मियां शुरु होते ही मेरे को ननिहाल के लिये लदवा दिया जाता था. ग्वालियर मे मैने उसको बहुत मिस किया, और कहते है जुदाई मे प्यार और परवान चढता है, किसी तरह से छुट्टियाँ काटी, वापस लौटा

यहाँ तो वो पहले से ही मेरा इन्तजार कर रही थी,हमने दिल की हालत एक दूसरे से की और अपने प्यार का इजहार किया.दिल तो बल्लियों उछलने लगा, कलेजा मुँह को आने लगा, ना जाने क्यों बाते करते करते गला सूखने लगता, किसी चीज मे मन नही लगता, पढाई और कोर्स तो बहुत दूर की बात थी.दूसरी तरफ भी हालात लगभग वही थे, लेकिन अब एक दूसरे से मिलने मे शर्म आती थी, बाते करने के लिये बाते ही नही होती थी, बस लगता था, वो मेरे पास बैठी रहे और मै उसे देखता रहूँ.हमेशा उसका ख्याल, हमेशा उसकी याद. खाना पीना लगभग छूट गया था. बिना उसको देखे दिन शुरु नही होता था, बिना उसको बाय किये रात खत्म नही होती थी, वो भी जब मौका मिलता अपनी छत पर आ जाती और मै अपनी छत पर, हमने इशारो मे बात करने की कला विकसित कर ली थी, आंखो ही आँखो मे एक दूसरे के दिल की बात समझ लेते थे.कुल मिलाकर एक अच्छे खासे पढाकू बन्दे का काम लग गया था.हम दोनो के धर्म तो हिन्दू थे लेकिन काफी विरोधाभास थे, सो हमने भी जैन धर्म को जानने के लिये काफी किताबे पढ डाली और खान पान मे भी परिवर्तन कर डाला, उधर हमारी प्रेयसी ने भी अपने खानपान यानि कि पूर्ण शाकाहारी से मांसाहारी बनने का प्रयास किया, जो असफल साबित हुआ, बस जज्बा सिर्फ यह था, एक दूसरे के लिये कुछ भी करने को तैयार थे.

लेकिन बैरी जमाना, जब उसको पता चला तो हमारे ऊपर बन्दिशे लगनी शुरु हो गयी, मेल मुलाकात तो दूर की बात है दर्शन दुर्लभ हो गये, फिर हमने चिट्ठी पत्री का सहारा लिया, काफी लैटरबाजी हुई, किसी तरह से मुलाकात हुई, रिश्ते के बारे मे गम्भीरता से सोचा गया, और हर तरह के नतीजो पर विचार विमर्श किया गया.मन मे एक साथ आत्महत्या का भी ख्याल आया, परेशानी यह थी वो अपने घर मे सबसे बड़ी थी और मै अपने घर मे सबसे छोटा था.उनको अपने भविष्य की कम और अपनी बहनो के भविष्य की चिन्ता ज्यादा थी. फिर उन्होने एकतरफा हिटलरी डिसीजन लिया कि अब हम नही मिलेंगे.हम बहुत कहते रहे फिर सोच लो….अब वैसे भी मेरी उनके सामने कुछ चलती तो थी नही. वो मेरी पूरी बात सुने बिना चली गयी……किसी तरह से हमारी एक आखिरी मुलाकात तय हुई.

इस आखिरी मुलाकात मे उन्होने मेरे को पहली बार अपना हाथ पकड़ने की इजाजत दी, रोते रोते अपनी बात कही और अपनी मजबूरी बतायी. और हम दोनो लगभग आधा घन्टा रोते रहे और जाते जाते ये वादा किया गया कि अगर कभी जिन्दगी मे दुबारा मुलाकात होगी तो अच्छे दोस्तो की तरह मिलेंगे.कोई गिला शिकवा नही करेंगे. और जाते जाते वो कुछ ऐसा कह गयी कि आज तक नही भूल पायाःवो बोली “अगर कभी मैने प्यार किया है तो वो तुमसे है, मै तुमको कभी भूल नही पाउंगी, और मेरी बस एक ही ख्वाहिश है कि मै तुम्हे सफलता की नित नयी ऊँचाइयो पर देखना चाहती हूँ.”

साथ ही निशानी के तौर पर एक आखिरी पत्र पकड़ाया,जिसका सिर्फ दो एक शेर ही बता पाऊँगा, नोश फरमाये.

पत्र की शुरूवात इस शेर से हुई थी

मेरे दिल मे तू ही तू है, दिल की दवा क्या करू
दिल भी तू है, जाँ भी तू है तुझपे फिदा क्या करूँ

और पत्र का आखिरी शेर ये था………………

अबकी बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबो मे मिले,
जैसे सूखे हुए फूल किताबो मे मिले.
आज हम दार पे खेंचे गये जिन बातो पर,
क्या अजब कल वो जमाने को निसाबों मे मिले

काफी सालो बाद पता चला कि उनकी शादी रतलाम मे कंही हो गयी है, इधर हम भी अपनी जिन्दगी मे वापस हो लिये. पहले प्यार का दर्दनाक अन्त.मै अपनी सफलता का श्रेय उसके प्रोत्साहन को देता हूँ.अगर वो प्रोत्साहित ना करती तो शायद मै आज इस मकाम पर नही पहुँच पाता.मैने उसको भुलाने की बहुत कोशिश की लेकिन कमबख्त दिल है कि मानता नही,जब कभी पहले प्यार की बात निकलती है तो उसकी शक्ल सामने आ ही जाती है,आँखो को झूठ बोलना नही आता और आंसू………वो तो शायद उसके जिक्र होने का ही इन्तजार करते है.

फिर सावन रुत की पवन चली,तुम याद आये, तुम याद आये.
फिर पत्तो की पाजेब बजी, तुम याद आये, तुम याद आये.

मेरा यह लेख समर्पित है, उस अनाम प्यार को, एक पवित्र रिश्ते को, जो अधूरा रह गया.

मैने तो ईमानदारी से अपने पहले प्यार की कहानी कह दी है…., अब जूते पड़ते है तो पड़े.

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Author: Jitendra Chaudhary (507 Articles)

जन्म से कानपुरी, लेकिन रोटी के लिये मिट्टी से दूर, साफ़्टवेयर बनाते बनाते कब ब्लॉग लिखने लगे, पता ही नही चला। फिर कुछ शरारती तत्वों ने लेखन की तारीफ़ दी, अब झेलो, कानपुरी हूँ, इत्ती जल्दी तो नही रुकने वाला। इंटरनैट के लती। लेखन शैली में श्री के पी सक्सेना जी से प्रेरित। भारतीय राजनेताओ से खासी चिढ,वैसे भी तारीफ़ के लायक तो कोई काम किए नही ये लोग। भारत की सामाजिक एवम राजनैतिक दुर्दशा से व्यथित। इसी व्यथा का ही नतीजा है कि हम ब्लॉगिंग मे कूदे। आजकल कुवैत मे डेरा है, यही पर बसेरा है। अब देखते है कब तक हम इस खूंटे डेरे से बंधे रहते है। सपनाः हिन्दी इन्टरनेट की आधिकारिक भाषा बने। पसन्दः राजनीतिक चर्चा, बचपन की यादें। नापसन्दःनहाने के बाद,पत्नी द्वारा,बाथरूम मे वाइपर लगाने को बाध्य किया जाना मेरे बारे मे बाकी जानकारी इधर है:

52 Responses to “पहला प्यार”

  1. आपकी मासूम कहानी पड़ कर पुराने दोस्त याद आ गये| पर एक बात कहना चाहता हूँ,कहे बिना दिल नही मानता, जीतू भाई पुरानी माशूका रतलाम मे है यह बता कर आप रवि भैया को तो ईशारों ईशारों में कोई ईशारा तो नही कर रहे?

  2. कुछ वजहो से जगहों के नामों मे जानबूझकर कुछ परिवर्तन कर दिया गया है, आपबीती के पात्रो को किसी भी स्थान अथवा किसी व्यक्ति विशेष से मिलाने की कोई कोशिश ना करें. बताये गये शहर कुछ भी हो सकते है, दिल्ली,जालन्धर,इटावा या कुछ भी.

  3. पहले जब पढ़ता था :-
    “नापसन्दःनहाने के बाद,पत्नी द्वारा,बाथरूम मे वाइपर लगाने को बाध्य किया जाना”

    तो अटपटा लगता था.अब जब पढ़ा :-

    “कमबख्त दिल है कि मानता नही,जब कभी पहले प्यार की बात निकलती है तो उसकी शक्ल सामने आ ही जाती है,आँखो को झूठ बोलना नही आता और आंसू………वो तो शायद उसके जिक्र होने का ही इन्तजार करते है.”

    तो बात साफ हो रही है.जितना पानी लेके जाते होगे बाथरूम बहता उससे ज्यादा होगा.पत्नी जब मोती(पानी) सहेजने की जगह पोंछने को कहती होगी तो नापसंद लगना स्वाभाविक है.

  4. पहले जब पढ़ता था :-
    “नापसन्दःनहाने के बाद,पत्नी द्वारा,बाथरूम मे वाइपर लगाने को बाध्य किया जाना”

    तो अटपटा लगता था.अब जब पढ़ा :-

    “कमबख्त दिल है कि मानता नही,जब कभी पहले प्यार की बात निकलती है तो उसकी शक्ल सामने आ ही जाती है,आँखो को झूठ बोलना नही आता और आंसू………वो तो शायद उसके जिक्र होने का ही इन्तजार करते है.”

    तो बात साफ हो रही है.जितना पानी लेके जाते होगे बाथरूम बहता उससे ज्यादा होगा.पत्नी जब मोती(पानी) सहेजने की जगह पोंछने को कहती होगी तो नापसंद लगना स्वाभाविक है.

  5. पहले जब पढ़ता था :-
    “नापसन्दःनहाने के बाद,पत्नी द्वारा,बाथरूम मे वाइपर लगाने को बाध्य किया जाना”

    तो अटपटा लगता था.अब जब पढ़ा :-

    “कमबख्त दिल है कि मानता नही,जब कभी पहले प्यार की बात निकलती है तो उसकी शक्ल सामने आ ही जाती है,आँखो को झूठ बोलना नही आता और आंसू………वो तो शायद उसके जिक्र होने का ही इन्तजार करते है.”

    तो बात साफ हो रही है.जितना पानी लेके जाते होगे बाथरूम बहता उससे ज्यादा होगा.पत्नी जब मोती(पानी) सहेजने की जगह पोंछने को कहती होगी तो नापसंद लगना स्वाभाविक है.

  6. जीतू भाई,

    आपका पहले प्यार का किस्सा पढ़ के बहुत अच्छा लगा. काफ़ी भावुक और निर्दोष था.

    वैसे माहौल हल्का करने के लिये आपको एक बात बताता हूँ, पढ़ाई में तो मैं भी किसी टापर से कम नहीं था.. लेकिन आपकी तरह हमें कोई कदरदान नहीं मिला;) इसीलिये तो मुझे ऐसा कहना पड़ा

    हम तो हैं चाँद और तारे, जहां के ये रंगीं नज़ारे
    पर हाय रे हाय ये दुनिया, हम तेरी नज़र मे आवारे

  7. जीतू भाई,
    मजमून ब्लॉग कमेंट पर चस्पा कर दिया है.

    मुझे रतलाम देख कर खुशी हुई थी कि आप हमारे प्रेयसी-बहनोई तो हो गए पर बाद में गुड़ गोबर कर दिया कि नाम बदल दिया…

    खैर कोई बात नहीं..

    रवि
    पुनश्च: आपका ई-मेल पता आपके ब्लॉग में कहीं नहीं दिखा.

  8. मे नही पड़ना चाहता. और अन्त मे हमारी पहले प्यार की कथा….आपबीती तो आप पढ चुके [...]

  9. Respected sir jitendra Ji ,

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    and I still compose – Ghazal , Shayary. and writing stories .If I send you my ghazalen .what can you print in your web page .and I still love everybody bethout any it’s hope that any one love me . I am 23 year old man. many beautifull girls have come in my life . But now I have lost any one .
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    your indian friend jitendra pratap singh

  10. Respected jitendra bhai ji ,how are you you know our business -www.indiacon.com, who is the business promoter IT company is growing up very succesefully. I want you all blesses with god bless. and brother
    i am sending you a shayari whom i was write for my friend who live in allahabad .

    MAYUSH HOKE MUJHKO MAT DHUDH AAINA ,

    TERE JIGAR ME HAI KAHI SURAT KAHI CHHIPI ,,

    JITENDRA PRATAP SINGH ” RAHI “

  11. aaderniya jitu bhai .

    aap kaise hai . kai din se aap ka koi mail nahi aaya . kya aap mujhe bhul gaye hai. aap ne mery ghazalo ko chhapa ki nahi .khai aap pareshan mat hoiyega, jab samay mile tab kijiyega ok.aapka kam kaisa chal raha hai ;

    aapka chhota bhai jitu : jitendra pratap singh

  12. aadarniya jitu bhai ji.

    yah ghazal sadar aap ko samarpit hai ,,

    MERI AAPNI SUNTE RAHIYE ,
    AAP BHI AAPNI KAHTA RAHIYE ,,
    WAKT GUJAR JAYEGA YU HI ,
    SATH MERE BAS CHALTE RAHIYE ,,
    GAM NE KISKO BAKSA HAI ,
    HASTE-HASTE MILTE RAHIYE ,,
    KOI TO GAM BAAT HI LEGA ,,
    ES UMMID PE JITE RAHIYE ,,

    JITENDRA PRATAP SINGH ” RAHI ”

    UTTAR PRADESH ( PRATAPGARH )

  13. [...] बचपन का यह शरारती बालक वानरसेना का लीडर रहा.ये बताते हैं- मेरी सबसे अच्छी दोस्त लड़कियाँ ही हैं, जाने क्यो?पर यहां कानपुर में ऐसी कोई कन्या नहीं मिली जो बता सके किकन्या राशीजीतू भइया के बारे में उनका क्या ख्याल है!जिसको निभा न सके वह पहला प्यार भुलाये नहीं भूलता. [...]

  14. अपने प्यार का चिट्ठा लिखना इतना आसान नहीं होता लेकिन आपने बहुत ईमांदारी से लिखा है |

  15. [...] बाद में अपने कुछ सुबुक-सुबुक वादी प्रेम कथाओं का यदा-कदा पारायण करते रहे। लालू यादव के बारे में लिखा ।वैसे क्या-क्या लिखा ये बताने के बजाय ये पूछना ज्यादा बेहतर होगा कि पट्ठे ने क्या नहीं लिखा। [...]

  16. अहा.. मन को छू लेने वाली यादें हैं. वेलेन्टाइन डे पर यह पढ़ने के बाद हमें अपना अतीत याद आ गया. आंखें नम हो आईं.. वो ग़ज़ल याद आ गई….

    आज हम बिछड़े हैं तो कितने रंगीले हो गए.
    मेरी आंखें सुर्ख़ तेरे हाथ पीले हो गए.

  17. apki es kahani ne mere bite dino ki yaad taja kar di…per bhai jan pyar ka sukhad ehsas to jindagi hi badel dita hai…ji tarah usne meri jindagi ko badal dia..es ehsas ko bade kismat wake hi pate hai.

  18. बस यही मेरी भी कहानी है… फ़र्क सिर्फ़ इतना है की मे हमेशा उसे लाइन मारता रहा और बह हमेशा इनकार करती रही…. बस आज भी बह मेरे पडौस मे है… पैर बात नही होती … मुलाक़ात होती है… नज़रे मिलती है… हमेशा की तरह अरमान जागते है ….और …ठंडे हो जाते है…. काश …..

  19. Hello Sir,

    What a Beautiful Blog. Really Heart touching story.
    Basically I am from kanpur and working in Gurgaon for the last two year.

    u r also from kanpur???

    “Hindi mein itna aacha Article aaj tak nahi pada maine”

    Great Skills

    Thanking You
    Gaurav Trivedi
    trivedi_gaurav2000@yahoo.com
    http://gauravtrivedi.com

  20. realy it is very dardnak real story.you believe it or not subke bus ki bat nahi hain.jhelana

    actualy i have no any knowledge about cumputer software and this is my fist email

  21. बेहतरीन क्या बात है जीतू भैय्या मैं आपके ब्लोग को २-३ दिन से देख रहा हूँ आज पता चला की आप कानपूर के हैं मतलब उत्तर प्रदेश के हम भी अलाहाबाद के हैं आपकी पोस्ट पड़कर बहुत अच्छा लगा बहुत ही फ्रेश और सीधे दिल से लिखी हुई बात है ! आपके लिखने का तरीका हमे बहुत पसंद है कुछ टिप्स हमे भी दे .

    प्रशांत

  22. namaste

    maine aapki ye story padhi
    main bhi kisi ko dil se chahti hun
    par dar lagta hai ki kahin humari is choti si love story ki esi ending na ho

    acchja laga aapka article padhkar………..

    all the best
    keep it up

    bye

  23. Hello Jitu Bhai mai bhi kuchh likhana chahta hoon kya likhane ka mauka milega agar milega to jaroor batana . Mai achchhi baat likhana chahta hoon. God ke bare mai aur pyar ke bare mai. aap ka dost, mera Email – jeetendra_pratap2002@yahoo.com

    Jeetendra Pratap Singh
    Thanks,

  24. likhun bi kia ab ise padne ke bad jinki bat nahi ki kisi se ae han mujko yaaaaaaaaaaaaad

  25. maan tawhanji kahani padi ain dado sutho lago ta tawhan dadi samajh san waqt rahande sutho step warto.tawhanjo jazbo kabile tareef aahe.

  26. दौड़ते हुए स्टेशन मास्टर के पास आए, और बोले ” साहब! वहाँ प्लेटफ़ार्म नम्बर १ की पटरी पर लगभग १०० सरदार ट्रेन के नीचे आ गए है।चलिए” स्टेशन मास्टर का माथा ठनक गया।तो दौड़े दौड़े प्लेटफ़ार्म पर पहुँचे तो देखा लगभग १०० सरदार ट्रेन से कटकर मर चुके थे।स्टेशन मास्टर ने दौडकर आने वाले सरदार से मामला पूछा:
    स्टेशन मास्टर :क्या हुआ था?
    सरदार : साहब! एक मिनिस्टर आने थे, ट्रेन से। सारे सरदार उस मिनिस्टर के स्वागत के लिये प्लेटफ़ार्म पर खड़े थे।अचानक एनाउन्समेन्ट हुई, कि ट्रेन प्लेटफ़ार्म नम्बर एक पर आ रही है। बस फिर क्या था,सारे सरदार पटरी पर उतर पड़े, अपने नेता के स्वागत के लिये और कट कर मर गए।
    स्टेशन मास्टर : अच्छा तो ये बात है, लेकिन तुम कैसे बच गए तुम भी तो सरदार हो।
    सरदार : साहब मै तो स्टेशन पर आत्महत्या करने आया था, इत्ते सारो के ऊपर कैसे कूदता?

    2

    एक छोटा सा जोक है:
    एक सरदार कान पर मोबाइल लगाए, बात करते हुए जा रहे थे, अचानक उनके मोबाइल की घन्टी बज उठी।

    3

    एक जनाब अक्सर अपनी बीबी को छेड़ा करते थे। जब भी वे काम पर जाते तो बोलते:
    “गुड बाय! चार बच्चों की अम्मा। ”
    बीबी बहुत परेशान, एक दिन उसने भी जवाबी हमला बोल दिया। जैसे ही पति बोला,
    “गुड बाय! चार बच्चों की अम्मा।
    बीबी बोलो : “बाय बाय, दो बच्चो के बापू।”

    4

    मानो या ना मानो, सन्ता सिंह और बन्ता सिंह एक दिन शतरन्ज खेलते हुए पाए गए।

    5

    एक शेर मुलाहिजा फरमाए :
    जिसके दिल मे दर्द है वो दिलदार है
    जिसके दिल मे दर्द है वो दिलदार है
    जिसके दिल मे दर्द है वो दिलदार है
    जिसके सर मे दर्द है वो सरदार है।

    अब कुछ निरन्तर के पुराने अंक से :

    6

    समाचार वाचक सुक्खी ने समाचार चैनल पर एक ब्रेकिंग न्यूज़ कुछ यों दी

    एक दो सीटर जहाज आज पंजाब के एक कब्रिस्तान में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। स्थानीय सरदारों को पाँच सौ लाशें मिली है और वे अभी बाकी यात्रियों को खोद खोद कर ढूँढ रहे हैं।

    7

    सुक्खी एक बीमार चीनी दोस्त कि मिजाजपुरसी करने देखने अस्पताल गये। जब वे बस जा ही रहे थे कि उसी पल उनका दोस्त उनके सामने ही तीन शब्द “चिन यू यान” कह कर खुदा को प्यारा हो गया। सुक्खी बड़े परेशान हुये। पुस्तकालय जाकर तुरंत एक चीनी शब्दकोश देखा उस वाक्य का मतलब पता करने के लिये। मतलब पता चला, “नामुराद! तू मेरी आक्सीजन ट्यूब पर पाँव रक्खे खड़ा है।”

    8

    अध्यापक: सुक्खी, तुम्हारा कुत्ते पर लिखा निबंध तुम्हारे भाई के निबंध जैसा क्यो हैं? क्या तुमने नकल की?
    सुक्खी:ओ नइ जी नइ, बात यह है कि हम दोनों ने एक ही कुत्ते पर निबंध लिखे हैं।

    9

    टीचर : राजू अपने पिताजी का नाम अंग्रेजी मे लिखो
    राजू : ब्यूटीफुल रेड मेल अन्डरवियर
    टीचर : ये क्या बदतमीजी है
    राजू मासूमियत से बोला : “मास्साब मेरे पिताजी का नाम सुन्दर लाल चड्ढा है।”

    10

    एक बार एक सरदार जी, हिन्दू,मुस्लिम और अंग्रेज हनुमान के मन्दिर के बाहर बैठे थे।सभी हनुमान को अपने अपने धर्म का बता रहे थे।
    हिन्दू बोला: “हनुमान जी हमारे ईष्ट देव है। रामायण मे इसका उल्लेख है।
    मुसलमान : “हनुमान शब्द, सुलेमान से बना है, इसलिए हनुमान मुसलमान हुए”
    अंग्रेज बोला: “हनुमान, हैनीमैन, सुपरमैन शब्द से बना है, इसलिए हनुमान अंग्रेज हुए।”
    सरदार बहुत देर तक बकझक सुनता रहा, आखिर मे बोला : “हनुमान सरदार थे”
    सभी : “कैसे?”
    सरदार : देखो, बीबी किसकी गयी थी? राम की। लेकर कौन गया था? रावण। लंका मे जाकर कौन पिला था? हनुमान। सिर्फ़ एक सरदार ही बिलावजह कंही भी पिल सकता है। इसलिए हनुमान सरदार थे।

    अगली खेप भी यहीं पर टिकायी जाएगी थोड़ा इन्तजार करें।

  27. [...] विषय दिया- पहला प्यार। असल में उनको अपना किस्सा सुनाना था [...]

  28. MERI JAAN HO TUM

    *1) BAAT AATH SAAL POORANI HAI MAIN 5TH CLASS ME THA

    EK DIN MAI SCHOOL SE AAYA TO MENE WINDO KHOOL KAR BAHAR

    DEKHA THO MERE SAAMNE WAALE MAKAN ME NAYE PADOSI AAYE THE

    ACANAK MERI NAZAR EK LADKE PAR PADI LADKA ACHHA THA USE MUJSE DOSTI

    KARNI THI DEKTE DEKTE EK SAAL BIIT GAYA EK DIN MAIN CAPDE DHOO KAR

    UPAR DAALNE JA RAHA THA ACCNAK MERA PARR SIIDI SE PIISAL GAYA

    US DIN MERE HAATH ME MOUCH AAGYI AB MERE HAATH ME BAHUTH DARD

    HO RAHA THA USKE AGLE DIN NA ME SCHOOL GAYA NA HI DUKAAN PAR

    MENE SOCHA KI ME BAHAR JAOU FIR MERE BHATIJA MIL GAYA USNE MUJSE

    POOCHA KI CHCHA TUMAHARE HAATH ME KYA HO GAYA MAINE KAHA KI MERA

    PARR PIISAL GAYA USN KAHA MERE SAATH AAO ME TUMARHA HAATH SAHI KARATA

    HU WO MUJHE LEKAR UNHI KE GHAR PAR LE GAYA USNE DO DIN MERE HAATH KI

    MALISH KI TIISRE DIN MERA HAATH THEEKH HO GAYA PHIR HAMARI DOSTI HO GAYI

    ME UNKE BINA KHANA NAHI KHAATA WO MERE BINA NAHI KHAAKE JAB ME SCHOOL

    SE AATA TAB WO KHAANA KAATE KABHI-KABHI TO HUM EK SAATH KAATHE KUCH HI

    DINO ME HAMARI DOSTI KO SABKI NAJAR LAGGAI KI ME UNSE CHIDNE LAGA WO

    MUJSE KUCH BHI KAHETE ME ULTA JABAB DETA BAHUT DIN HO GAYE PHIR WO YAHA

    SE CHALE GAYE NA UNKA PHONE AAYA NAHI WO AAYE MERE BHATIJE KI SAADI HUI

    HUM LOOG BARAAT ME JANE KE LIYE TYAAR HO JESE HI BARAAT LADKI KE DHAR SE

    KAFI DOOR THI ITNE ME UNKA PHONE AA GAYA KI BABU TUM KAHA HO ME AA GAYA

    MUJHE AABHI BHI YAKIIN NAHI HUA JAB WO MERE SAMNE AAYE TO MUJSE RAHA NAHI

    GAYA UNNE MUJSE HAATH MILAYA AUR GAALE LAG GAYE MAI SAARM KE MAARE PAANI

    – PAANI HO GAYA PHIR MAINE GUSE ME KAHA KI MUJHE CHOOD KAR KAHA CHALE GAYE

    PHIR UNNHONE MUSKURAATE HUE KAHA (MERI JAAN HO TUM) TUMHE CHOOD KAR MAI

    KAHA JA SAKTA HU US DIN SE ME UNSE BAHUT HI PYAAR SE BOOLTU AUR WO BHI

    HAMARI DOSTI KO 9 SAAL HONE KO JA RAHE HAI (BABLU AND BABU)

    CO.NO.9319623829

  29. [...] वो तु्म्हारी सहेली जिसके हाथ में हाथ रख के छत पर से विदा [...]

  30. sentimental & best result.

  31. BAAT AATH SAAL POORANI HAI MAIN 5TH CLASS ME THA

    EK DIN MAI SCHOOL SE AAYA TO MENE WINDO KHOOL KAR BAHAR

    DEKHA THO MERE SAAMNE WAALE MAKAN ME NAYE PADOSI AAYE THE

    ACANAK MERI NAZAR EK LADKE PAR PADI LADKA ACHHA THA USE MUJSE DOSTI

    KARNI THI DEKTE DEKTE EK SAAL BIIT GAYA EK DIN MAIN CAPDE DHOO KAR

    UPAR DAALNE JA RAHA THA ACCNAK MERA PARR SIIDI SE PIISAL GAYA

  32. rajan ji ko mile

  33. hi this realy very good love story
    i also love a beautiful girl.

  34. hi i am raman

  35. jitu bhai
    hai kitna dard is dil mai batoon kaise
    kaha nahee jata hale dil sunaoo kaise
    aur kitnee asanee se keh diya hameain bhola do
    jo is dil mai basee hai dhadkanoo ki tarah use bholaoo kaise

  36. saccha pyanr ek bhoot ki tarah hota hai jiske baare me sunte to sabhi hai magar iska ehsaass bahut kam logon ko hota hai.

  37. tanhaiyon ke sahar me ek ghar bana liya
    ruswaiyon ko apna mukadar bana liya
    dekha hai yahan pathar ko pujte hai log
    bus isliye dil ko pathar bana liya

  38. hum deno ache dost the Per ab Nahi hai Ham Dono ke Beach me EGO aa gaya hai hum dono kay fir se phale jase dost hoge kay ? ? ? ? ? Kavi Kishangarh ? ? ? ? ?/ ? / /

  39. प्यार को कभी भी किया नहीं जा सकता। प्यार तो अपने आप हो जाता है। दिन और रात… धरती और आसमान, एक दूसरे के बिना सब अधूरे हैं। सन -सन करती हवाएं, सुन्दर नजारे, फूलों की खुशबू … सभी में छिपा होता है प्यार… कुछ तो प्यार में हारकर भी जीत जाते हैं, तो कुछ जीतकर भी अपना प्यार हार जाते हैं। प्यार एक ऐसा नशा है जिसमें जो डूबता है वो ही पार होता है। प्यार पर किसी का वश नहीं होता…. अगर आप भी प्यार महसूस करना चाहते हैं तो डूबिये किसी के प्यार में … दुनिया की सबसे बड़ी नेमत है ढाई आखर का प्यार… जब आप भी किसी को चाहने लगते हैं तो उसके दूर होने पर भी आपको नजदीक होने का अहसास होने लगता है , हर चेहरे में आप उसका चेहरा ढूंढने की असफल कोशिश करते हैं, कोई पल ऐसा न गुजरता होगा जब उसका नाम आपके होठों पर न रहता हो … यही तो होता है प्यार… सुन्दर, सुखद , निश्छल और पवित्र अहसास। पूरी दुनिया के सुख इस प्रेम में समाए हुए हैं। यह शब्द छोटा होते हुए भी सभी शब्दों में बड़ा महसूस होता है। केवल इतना सा अहसास मात्र ही आपको तरंगित कर देगा कि मैं उससे प्यार करता या करती हूं .. LUV IS ALWAYS: फूलो से कह दो महकना बंद कर दे, की उनकी महक की कोई जरूरत नही….
    सितारो से कह दो चमकना बंद कर दे, की उनकी चमक की कोई जरूरत नही….
    भवरो से कह दो अब ना गुनगुनाये, की उनकी गुंजन की कोई जरुरत नही….
    सागर की लहरे चाहे तो थम जाये, की उनकी भी कोई जरुरत नही….
    सुरज चाहे तो ना आये बाहर्, की उसकी किरणो की भी जरुरत नही….
    चाँद चाहे तो ना चमके रात भर, की उसके आने की भी जरुरत नही….
    वो जो आ गये हैं इस जहाँ में, तो दुनिया मे और किसी खूबसूरती की जरुरत ही नही .. *******______*******
    ___***_____***__***____***
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    __***_______Friends______***
    ___***______Forever_____***
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    __________***___*
    ______________* **
    ____________***** LUV IS ALWAYS: hi doston se hai….. Mr.India786*: कल मैने खुदा से पूछा कि खूबसूरती क्या है?
    तो वो बोले

    खूबसूरत है वो लब जिन पर दूसरों के लिए एक दुआ है

    खूबसूरत है वो मुस्कान जो दूसरों की खुशी देख कर खिल जाए

    खूबसूरत है वो दिल जो किसी के दुख मे शामिल हो जाए और किसी के प्यार के रंग मे रंग जाए

    खूबसूरत है वो जज़बात जो दूसरो की भावनाओं को समझे

    खूबसूरत है वो एहसास जिस मे प्यार की मिठास हो

    खूबसूरत है वो बातें जिनमे शामिल हों दोस्ती और प्यार की किस्से कहानियाँ

    खूबसूरत है वो आँखे जिनमे कितने खूबसूरत ख्वाब समा जाएँ

    खूबसूरत है वो आसूँ जो किसी के ग़म मे बह जाएँ

    खूबसूरत है वो हाथ जो किसी के लिए मुश्किल के वक्त सहारा बन जाए

    खूबसूरत है वो कदम जो अमन और शान्ति का रास्ता तय कर जाएँ

    खूबसूरत है वो सोच जिस मे पूरी दुनिया की भलाई का ख्याल……………

  40. maiy bhi kisi ko bhahut pyaar karti hu,
    magar usake ghar wale nahi chahate ki hamari shadi ho
    to muze bhi use bulana chaiye.aar aap ki tarha uska intajar karna chahiy.

  41. surender banwala on मई 8th, 2009 at 3:24 pm

    aap ke kahani dil ko choo gai aap ko apanaa payear nahi mila jankar dhuk hua par aap ka payar sacha thaa is leya god aap ko agly janam me jarur mila dahga ///// Y R FRINED surender banwala from HARYANA

  42. लड़का: चलो किसी वीरान जगह चलते हैं!
    लडकी: तुम ऐसी-वैसी हरकत तो नही करोगे?
    लड़का: बिल्कुल नही!
    लडकी: तो फिर रहने दो…

  43. बहुत बढ़िया कहानी है मेरे दोस्त ऐसे ही लिखना गुड luck

  44. बहुत बढ़िया कहानी है मेरे दोस्त ऐसे ही लिखना बाय

  45. सभी दोस्तों को मेरा नमस्कार ,
    यारो मुझे सिर्फ इस बात का दुःख है की जब भगवान ने प्यार बनाया तो क्यों बनाया अगर बना भी दिया तो प्यार करने वालो को मिलाया क्यों नहीं ? और एक बात प्यार हमेसा उन में ही क्यों होता है जिनकी शादी नहीं हो सकती या फिर वो अपनी मर्जी से जी नहीं सकते. मैं कभी कभी ये सौचता हूँ की अगर ये साडी दुनिया प्यार करती तो क्या होता ? फिर कोई भी प्यार का दुश्मन नहीं होता? मैं सिर्फ इतना ही कहूँगा उस भगवान से की अगर दुनिया में प्यार करने वाला बनाता है प्यार के दुश्मन मत बना जो प्यार करने वाले बन्दे है उनको उनकी मंजिल तक पंहुचा……………… दोस्तों मुझे प्यार के बारे में ज्यादा नहीं पता लेकिन आप मुझे प्यार के बारे में प्यार क्या है? क्यों होता है ? इसका कोई इलाज़ क्यों नहीं है ? भूख प्यास , नींद , चैन सब कुछ क्यों लूट जाता है मुझे इन सब के बारे में बता दो मैं आपका बहुत आभारी रहूँगा …… सभी प्यार करने वालो को मेरा हार्दिक सलाम ….

  46. मेरा भे पियर आदुरा रह गया
    यार

  47. hello दोस्तों.. एक kahani मेरी तरफ से

    एक बहुत पुरानी बात है और बहुत नई भी। एक काले रंग का शहर था, जो रात को जल्दी सो जाता था और सुबह मुँहअंधेरे उठ जाता था। उसमें एक लड़का रहता था और एक लड़की भी।

    लड़की साँवली सी थी और चंचल भी। बचपन में अक्सर सभी चंचल होते हैं, मगर लड़का नहीं था। लड़का बहुत सोचता था, बहुत गंभीर रहता था। उसे पता नहीं चला कि उसके स्कूल में पढ़ने वाली उसकी हमउम्र एक लड़की उसे देखने के लिए दिनभर बहाने ढूंढ़ती है और उसी के बारे में सोचती रहती है। लड़का पढ़ने में बहुत होशियार था और बोलने में भी। लड़की चंचल थी, लेकिन बोलती कम थी।

    लड़के के मन में स्त्री जाति के प्रति दुराग्रह सा था। और भी कम उम्र में दो-तीन बार लड़कियों के साथ खेल-खेल में हुए झगड़े ही इसके लिए उत्तरदायी थे या कोई जन्मजात भावना इसके पीछे थी, यह कोई नहीं जानता था। दुराग्रह कम न होने का एक कारण यह भी था कि उसने होश संभालते ही स्वयं को लड़कियों से दूर रखना शुरु कर दिया था। तो लड़की को उसका दुराग्रह, कटा-कटा रहना और गंभीर रहना ही अच्छा लगने लगा। लड़का तो अनभिज्ञ था, सो एक दिन लड़की ने ही बात का आरंभ करना चाहा। वह लड़के की तरह बोलने में चतुर नहीं थी, इसलिए कई दिन तक तय नहीं कर पाई कि क्या बोले? उसने दूसरा रास्ता चुना।

    वे दोनों छठी कक्षा में पढ़ते थे। स्कूल की छुट्टी के बाद लड़का जब अपने दोस्त के साथ घर के लिए निकलता था तो लड़की उसके पीछे रहती थी। दो-तीन सौ बच्चों की भीड़ में लड़की का काम और भी आसान हो जाता था। लड़की का घर पहले आता था- स्कूल से करीब सौ मीटर दूर। उस बीच में लड़की, लड़के की पीठ पर टँगे बस्ते पर चॉक से टेढ़ी-मेढ़ी आकृतियाँ बना दिया करती थी और फिर मुस्कुराकर अपनी गली की ओर मुड़ जाती थी।

    लड़का रोज शाम को घर पहुँचकर अपने बस्ते पर बनी सफेद रेखाएँ देखता और उन्हें साफ करते हुए अपराधी का अनुमान लगाने का प्रयास करता। उसके शक की उंगली कई लड़कों पर जाती, लेकिन किसी लड़की पर कभी नहीं।

    एक सप्ताह तक लड़की भीड़ का फायदा उठाती रही और लड़का अपराधी को नहीं पहचान सका। सोमवार को उसे एक तरीका सूझा। उसने अपने दोस्त को पीछे कुछ दूरी पर रहने और अपनी तरफ देखते रहने को कहा। लड़की चंचल थी, मगर चतुर नहीं। उसके दोस्त ने उसे पहचान लिया।

    पता चलते ही लड़के के मन का दुराग्रह और मजबूत हो गया और उसने बदला लेने की ठानी। अब छुट्टी के समय वह और उसका दोस्त सबसे अंत में स्कूल से निकलते और लड़की के पीछे रहते। मौका देखकर लड़का, लड़की के बस्ते पर आड़ी-तिरछी रेखाएँ खींच देता।

    लड़की द्वारा बनाई गई रेखाएँ और आकृतियाँ मधुरता लिए होती थीं, जबकि लड़के द्वारा खींची रेखाएँ बहुत कठोर थीं।

    लेकिन लड़का प्रतिशोध नहीं ले पाया। अब लड़की जानबूझकर उससे आगे रहती थी और अपनी गली आने पर मुस्कुराकर मुड़ जाती थी। अगली सुबह जब वह कक्षा में आती तो बस्ते पर वे आड़ी-तिरछी रेखाएँ बनी रहती थीं। उसने उन्हें एक दिन भी साफ नहीं किया। घर जाकर सबसे पहले अपना बस्ता उतारती और उसे दौड़कर छत पर ले जाती। वहाँ कोई नहीं होता था। फिर बस्ते को सामने रखती और उसे तब तक देखती रहती, जब तक कि कोई उसे बुलाने न आ जाता।

    पाँच दिन तक जब लड़की के बस्ते पर बनी रेखाएँ और गली में मुड़ते समय की उसकी मुस्कुराहट बढ़ती ही गई तो लड़के ने रेखाएँ खींचना बन्द कर दिया। उसका प्रतिशोध का भाव खो गया था और अब उसके मन में लड़की की मुस्कान का राज जानने की जिज्ञासा पनपने लगी। शनिवार की शाम को वह इसी उलझन में घर लौटा और लड़की मुस्कुराती हुई लौटी, इस बात से अनजान कि आज उसके बस्ते पर लड़के की उंगलियाँ नहीं थिरकी हैं।

    लड़की पीठ से बस्ता उतारकर दौड़ी दौड़ी छत पर गई और एक कोने में आराम से बैठकर बस्ता सामने रखा। उसे देखते ही उसका चेहरा उतर गया। उसने घुमा-फिरा कर पूरा बस्ता देखा। चॉक का एक भी नया निशान नहीं था। वह मुँह लटकाए बैठी रही और सोचती रही। वह लड़के जितनी गंभीर हो गई थी।

    थोड़ी देर बाद माँ ने आवाज दी- दूध पी ले।
    वह वहीं बैठी रही।
    पाँच मिनट बाद फिर से आवाज आई- आजा, दूध पी ले।
    वह नहीं हिली।
    अब उसकी माँ ऊपर आई और उसका हाथ पकड़कर नीचे ले गई।
    उस रात को लड़की सबसे अंत में सोई। बिस्तर पर अपनी माँ की बगल में लेटी-लेटी जाने क्या-क्या सोचती रही।
    लड़का भी अपने घर में सबसे अंत में सोया। वह सोचता रहा कि लड़की की खुशी और चंचलता रोज बढ़ती ही क्यों जा रही थी? स्त्री जाति के लिए जो भाव उसके मन में पहले से थे, वे इसका उत्तर नहीं दे पाए। जब वह सोया तो उसके मन में लड़की के लिए एक मधुर कोना बनने लगा था, जो सुबह तक और बड़ा हो गया था।
    लड़का अगले दिन किसी कारण से स्कूल नहीं जा पाया। उदास लड़की की नज़रें पूरा दिन उसे ही खोजती रहीं। आधी छुट्टी में उसका टिफ़िन नहीं खुला और वह सब लड़कियों से दूर एकांत में बैठी रही। शाम को स्कूल से लौटते हुए जब वह अपनी गली में मुड़ी तो उसके चेहरे पर हर दिन वाली मुस्कान नहीं थी।
    - आज खाना क्यों नहीं खाया?
    उसकी माँ ने पूछा।
    वह उस दिन दौड़कर छत पर भी नहीं गई थी। माँ के प्रश्न का उसने कोई उत्तर नहीं दिया।
    - तेरी तबियत तो ठीक है? माँ ने लाड़ से उसकी कलाई पकड़ते हुए कहा।
    वह चुप रही। उसका मन किया कि जोर से रोने लगे, मगर वह रोई नहीं। वह रोई तब, जब माँ के लाख मनाने पर भी उसने रात का खाना नहीं खाया और माँ ने गुस्से में उसे थप्पड़ मारा।
    - शायद मैं रोने का बहाना ढूंढ़ रही थी।
    लड़की अपनी माँ की बगल में लेटी-लेटी सोचती रही।

    उस एक दिन में लड़के के मन की जिज्ञासा भी बढ़ गई और उस मधुर कोने का आकार भी। वह अगले दिन स्कूल गया तो रास्ते भर लड़की के बारे में ही सोचता रहा। लड़की गुमसुम हुई अपनी सीट पर बैठी थी। लड़के ने पीछे से जाकर उसका कंधा थपथपाया।
    - तू उदास क्यों है?
    वह बातें बनाने में वाकई होशियार था। लड़की ने पलटकर उसे अपने पीछे खड़ा देखा तो एकदम से उसकी आँखें मुस्कुराने लगीं। वह बोली नहीं।
    - मैं तेरे बस्ते पर चॉक चलाता था।
    उसने लड़की के बस्ते पर बनी हुई सफेद रेखाओं की ओर इशारा करते हुए कहा।
    - क्यों?
    लड़की भी वाकई चंचल थी, हालांकि बोलती कम थी। अब उसकी आँखों की मुस्कान चेहरे पर भी आ गई थी।
    - क्योंकि पहले तू चलाती थी।
    उसकी बात सुनकर लड़की खिलखिलाकर हँस दी। लड़के को भी उसका हँसना अच्छा लगा। उसके चेहरे पर भी एक गर्वीली मुस्कान आ गई।
    -आज आधी छुट्टी में मेरे साथ खाना खाएगी?
    लड़की ने तुरंत स्वीकृति में गर्दन हिला दी। खाना खाते हुए लड़की को लगा कि लड़का उतना भी गंभीर नहीं है, जितना दिखता है। लड़की उसकी हर बात पर मुस्कुराती रही।

    दस दिन बाद लड़के ने रात में एक सपना देखा। वह एक पेड़ के पास लड़की के साथ बैठा था और बाकी सपना वह समझ नहीं पाया। सुबह उठा तो उसे लगा कि इतना प्यारा सपना उसने पहले कभी नहीं देखा था।
    - कल रात मैंने सपने में तुझे देखा।
    अगले दिन वह आधी छुट्टी में लड़की को बता रहा था।
    लड़की फिर मुस्कुराने लगी।
    - मेरा मन करता है कि मैं सारा दिन तेरे साथ ही बैठी रहूँ।
    - मेरा भी…
    आधी छुट्टी ख़त्म होने से पहले ही वे दोनों स्कूल के पीछे के मैदान में आकर एक पेड़ के पीछे छिप गए। दोनों के चेहरों पर मुस्कान थी।
    - तू फ़िल्म देखती है?
    थोड़ी देर बाद लड़के ने पूछा। तब तक कक्षाएँ शुरु हो चुकी थीं।
    - हाँ…
    लड़की के चेहरे की मुस्कान बढ़ गई थी।
    - उसमें जैसे होता है ना…
    लड़का कुछ सोचकर रुक गया।
    - क्या होता है?
    लड़की के स्वर में आत्मीयता और जिज्ञासा थी।
    लड़का कुछ क्षण वैसे ही खड़ा रहा, फिर अप्रत्याशित ढंग से उसने लड़की का गाल चूम लिया। बिल्कुल बालसुलभ चुम्बन था वह, जो केवल बच्चों के कोष में ही होता है- बहुत निर्मल और प्यारा।
    लड़की इससे घबराकर एकदम से दो कदम पीछे हट गई और स्तब्ध सी होकर लड़के को देखती रही। इस प्रतिक्रिया से लड़के के मन में अपराधबोध सा आ गया और उसके चेहरे की मुस्कान चली गई। लड़की ठिठककर वहीं खड़ी रही और उसे एक अपरिचित की तरह देखती रही।
    - तू बहुत गन्दा है।
    लड़का नहीं समझ पाया कि उसके शब्दों में घृणा ही थी या कुछ और था?
    लड़की की आँखें भर आई थीं। लड़का कुछ न कह सका, उसे देखता रहा।
    - तू सच में बहुत गन्दा है।
    लड़की ने फिर कहा और दौड़ती हुई क्लास की तरफ चली गई। लड़के ने दूर से देखा कि वह दौड़ते-दौड़ते एक हाथ से अपने आँसू भी पोंछ रही थी।
    दोपहर भर लड़का उसी पेड़ के नीचे बैठकर अपने आप को अपराधी की तरह कोसता रहा।
    रात को अपनी माँ के साथ बिस्तर पर लेटी हुई लड़की ने माँ से पूछा- मम्मी, गन्दे बच्चे अच्छे नहीं होते?
    उसकी माँ हँस दी।
    - बेटा, जो गन्दा होता है, वह अच्छा नहीं हो सकता।
    - कोई गन्दा क्यों होता है?
    - तू सो जा अब।
    माँ ने करवट बदल ली थी। लड़की फिर देर से सो पाई।

    अगले पूरे दिन बरसात होती रही। लड़की स्कूल नहीं गई। लड़का गया, लेकिन वह और दिनों की अपेक्षा अधिक गंभीर था। उसकी आँखें दिनभर लड़की को खोजती रहीं, लेकिन अमावस की रात में चाँद ढूंढ़ना संभव नहीं था।
    शाम तक उसका अपराधबोध चरम पर पहुँच गया। उसके बाद का छुट्टियों का एक हफ़्ता उसके लिए एक साल की तरह बीता और उसके बाद का एक-एक साल, जन्मों की तरह….
    और लड़की?
    लड़की के पिता का तबादला हो गया था। छुट्टियों के दौरान एक सुबह वह उदास लड़की अपने परिवार के साथ उस काले शहर को छोड़कर चली गई।
    कोई उम्मीद नहीं छोड़ी गई, कोई संदेश नहीं छोड़ा गया। लेकिन बेशर्म काला शहर उसके बाद भी जल्दी सो जाता था और मुँहअंधेरे जग जाता था। केवल वह एक लड़का देर से सोने और जल्दी जगने लगा था।
    - तू बहुत गन्दा है।
    लड़का इस वाक्य को सुनने के लिए और लड़की इस वाक्य को दोहराने के लिए वर्षों तड़पती रही। लड़का काले रंग के शहर में और लड़की सफेद रंग के शहर में…
    पेड़, स्कूल, बस्ते और गली, सबका रंग खून सा लाल हो गया था।

    ——————————————————————————–

    सात साल गुजर गए।
    लड़का काले शहर को छोड़कर होस्टल जा रहा था। ट्रेन के उस डिब्बे में कम ही लोग थे। लड़का चुप बैठा उस ट्रेन से बहुत दूर कुछ सोच रहा था। उसकी आँखें अब धुंधली सी हो गई थीं। ऐसा लगता था, जैसे हर समय आँसू तैरते रहते हों। अचानक उसे कुछ याद आया। अपनी सीट के नीचे रखा अपना बैग उसने बाहर निकाला और उसे खोलकर एक छोटा सा स्कूल बैग बाहर निकाल लिया।

    बैग पुराना पड़ चुका था और उस पर सफेद रेखाओं के कुछ फीके से निशान थे। लड़का उसे हाथ में लेकर देखता रहा। कोई भाव उसके गंभीर चेहरे से बाहर नहीं आ पाया। आँखें कुछ ज्यादा धुंधली लगने लगी थीं।
    कुछ क्षण बाद जैसे ही वह उस स्कूल बैग को फिर से बैग में रखने लगा, एक मीठी सी आवाज़ कानों में पड़ी।
    - तुम बहुत गन्दे हो।
    काले शहर में एकदम से बादल छा गए थे और तेज बारिश शुरु हो गई थी। एक स्कूल के मैदान में खड़ा एक पेड़ तेज हवा में उड़ने को तैयार था। एक गली का मोड़ तेजी से दौड़ने लगा था। रद्दी की दुकान पर पड़ा हुआ एक टिफ़िन बॉक्स लुढ़कता हुआ दूसरे से जा टकराया था। एक मकान की छत अपने आसमान से कुछ कह रही थी।
    लड़के ने चेहरा उठाकर देखा। सामने एक लड़की बैठी थी। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें उसके होठों के साथ मुस्कुरा रही थीं।
    - क्या?
    - तुम बहुत गन्दे हो।
    उसकी मुस्कान बढ़ गई थी। लड़का कुछ पल चुप रहा। उसे लगा कि यदि वह बोला तो अपनी बात कहने के लिए उसे हज़ारों शब्द एक साथ बोलने पड़ेंगे।
    उसका चेहरा अब उतना गंभीर नहीं लग रहा था, न ही आँखें उतनी धुंधली लग रही थीं।
    - तुम अब भी उतना ही कम बोलते हो?
    लड़के की आँखों से अश्रुधार बह निकली। लड़की के पास बैठा एक आठ-नौ साल का बच्चा लड़के को घूर-घूरकर देखता रहा। फिर उसने प्रश्नात्मक दृष्टि लड़की पर डाली। लड़की की बड़ी-बड़ी आँखें अपनी जगह पर नहीं थीं। वे अपने चेहरे से छूटकर आसमान में कुछ ढूंढ़ रही थीं।
    - कहाँ थी तुम?
    लड़का बहुत कोशिश करके बोल पाया।
    लड़की अपने पास बैठे बच्चे को लक्ष्य करके बोली- अभी एक बहुत बड़ा मन्दिर आएगा। तू डिब्बे के दरवाजे पर जाकर खड़ा हो जा। उसके आगे हाथ जोड़कर जो भी माँगो, मिल जाता है।
    बच्चा कुछ न समझ पाने की मुद्रा में उसे देखता रहा और फिर धीरे से उठकर चल दिया। जाते-जाते उसने आँसुओं से भीगे चेहरे वाले लड़के की ओर भी देखा।
    - कहाँ थी तुम?
    लड़का अब बेचैनी से बोला
    - इसी दुनिया में थी।
    वह बाहर देखने लगी थी।
    - कोई ऐसे चला जाता है क्या? बिना कोई आस छोड़े….
    - हाँ…
    - जानती हो…. लड़का कहता-कहता रुक गया।
    काले शहर में बारिश थमने लगी थी। पेड़ ने अनिश्चित भविष्य के डर से अपने पंख सिकोड़ लिए थे। गली के मोड़ के कदम पीछे हटने लगे थे। रद्दी की दुकान का शटर अपने आप ही बन्द होने लगा था। आसमान से एक बूँद मकान की छत पर टपकी।
    लड़की अपनी खुली हुई हथेली और उसमें खारे आँसू की बूँद को देखती रही और फिर हथेली होठों से लगाकर पी गई। उसकी आँखें उसके चेहरे पर लौट आई थीं और उस दृश्य को कैद कर लेने के लिए बन्द हो गई थीं।
    - जानती हो, मैं कितने महीनों तक शाम को लौटते समय पीछे मुड़कर नहीं देखता था कि तुम आओ और बेफ़िक्र होकर चॉक चला सको…
    - जानते हो, मैंने अपने घर में वैसा ही एक नीम का पेड़ लगाया था। सोचती थी कि किसी दिन जब मैं घर लौटूँगी, तुम उसके नीचे वैसे ही खड़े मिलोगे…
    अंत तक आते-आते लड़की ने जोर से आँखें मींच लीं।
    - कहाँ जा रही हो अब?
    लड़की ने धीरे से आँखें खोलीं और मुस्कुराने का असफल प्रयास किया।
    - तुम कहाँ जा रहे हो?
    - होस्टल… लड़की चुप होकर बाहर की ओर देखती रही।
    - कहाँ जा रही हो तुम?
    इस बार लड़के के स्वर में बेबसी आ गई थी।
    - क्या फ़र्क पड़ता है कि मैं कहीं भी जाऊँ?
    लड़की अब उसकी ओर देखती हुई बोली। पेड़ पर बैठी एक चिड़िया बारिश थमने पर उड़ी और गीले पंखों के कारण वहीं गिर पड़ी।
    - उसे फ़र्क पड़ता है, जो सात साल तक इस आग में जलता रहा कि तुम उसकी एक छोटी सी गलती के कारण बिना कुछ कहे चली गई थी।
    - तुम्हें अब तक याद है?
    - भूल जाता तो अब रो रहा होता? आँसुओं भरा चेहरा हँसकर बोला।
    - मैं नादान था तब।
    - मैं भी…. कहकर लड़की उसके पास आकर बैठ गई।
    - वह मेरा छोटा भाई है।
    लड़की ने डिब्बे के दरवाजे पर खड़े बच्चे की ओर इशारा करते हुए कहा। बच्चा उस मन्दिर की राह देख रहा था, जो कभी बना ही नहीं था।
    - तुम अब और भी सुन्दर हो गई हो।
    - तुम्हारी आँखें अब और भी उदास लगने लगी हैं। ऐसा लगता है, जैसे सालों से जाग रहे हो।
    दो आँखें, दो आँखों से जा मिली थीं।
    - इतना पढ़ने लगे हो क्या?
    कहकर खिड़की की तरफ वाली दो आँखें, दूसरी दो आँखों से छूट गईं और उत्तर की प्रतीक्षा में बाहर के भागते मैदानों में भटकने लगीं।
    - नहीं…पढ़ाई में फिर मन नहीं लगा। अब सबने कहा कि किसी और शहर में चला जा। घरवालों ने होस्टल में भेज दिया।
    कहते-कहते लड़के को काला शहर याद आ गया।
    - बारिश के दिनों में वहाँ की गलियों में अब भी घुटनों तक पानी भर जाता है?
    उस प्रश्न के लिए लड़की की आँखों में वही पुरानी चंचलता लौट आई थी।
    - कई बरसों से बारिश ही नहीं हुई।
    - ऐसा लगता है कि तुम बहुत दिनों से बहुत अकेले हो।
    लड़की की आवाज में बेचैनी आ गई थी।
    - मुझे भी लगता है….
    - घर पर सब कैसे हैं?
    - घर पर सब अच्छे हैं…..और मैं अकेला!
    …..मैं अकेला क्यों हूँ?
    खिड़की से दूर वाली दो आँखों में बच्चों सी मासूम जिज्ञासा थी। लड़की ने कुछ नहीं कहा। उसके हाथ पर अपना एक हाथ धीरे से रख दिया और उसकी बेचैनी को पढ़ने की कोशिश करती रही।
    - कहाँ जा रही हो तुम?
    बेचैनी पढ़े जाने की सीमा में नहीं थी।
    - तुम किसी को ढूंढ़ लो, अपना साथ देने के लिए…
    - कहाँ जा रही हो?
    - तुम आओगे?
    लड़का कुछ नहीं बोला। लड़की की हथेली थोड़ा दूर होने लगी तो लड़के ने उसे फिर थाम लिया।
    - हमें मिलना होगा तो इसी तरह फिर मिल जाएँगे….और नहीं मिलना होगा तो….
    - मैं उस मन्दिर से कोई उम्मीद नहीं रखता।
    लड़के ने दरवाजे की ओर देखते हुए कहा।
    - मेरा विश्वास है भगवान में।
    लड़की की हथेली का दबाव विश्वास से बढ़ गया था। ट्रेन रुक गई। बच्चा दौड़ा-दौड़ा आया।
    - चलो दीदी, उतरना है।
    लड़की ने हाथ अलग किया, एक गहरी साँस ली और विश्वास की डोर थामकर अपने भाई के साथ उतर गई। ट्रेन चलने को थी। लड़के ने बैग उठाया और सफेद शहर के उस भीड़-भाड़ वाले स्टेशन पर उतर गया। लड़की ने पीछे मुड़कर देखा। पूरा आसमान एक घर की छत पर उतर आया था।

    ——————————————————————————–

    - तुम फिर इस तरह बैठे हो….
    लड़की ने कमरे में घुसते ही उसे देखकर कहा। लड़का उस छोटे से कमरे के एक कोने में दीवार से पीठ टिकाकर जमीन पर बैठा था। लड़की की आवाज सुनकर, उसने सिर उठाकर देखा और हल्का सा मुस्कुरा दिया।
    - मैं बहुत देर से उस मकड़ी को देख रहा हूँ। उसने इतना बड़ा जाल बुन दिया और…और मैं यहाँ खाली बैठा हूँ- उसे देखता हुआ….
    वह छत की ओर देखते हुए बोला।
    - मुझे डर लगता है कि तुम पागल न हो जाओ।
    लड़की उसके बिल्कुल सामने आकर खड़ी हो गई थी।
    - मुझे भी लगता है…
    उसकी आवाज़ में चिंता नहीं थी, केवल खालीपन था। लड़की ने उसे उठाने के लिए अपना हाथ आगे किया। लड़के ने हाथ थाम लिया।
    - कोई देख तो नहीं लेगा?
    लड़के ने उसकी आँखों में उसी खालीपन से देखते हुए कहा।
    - सब बाहर गए हैं।
    लड़का उसके हाथ का सहारा लेकर खड़ा हो गया।
    - भूख लगी है।
    लड़के ने इस तरह से कहा, जैसे बच्चा माँ से कहता है।
    - मैं लाती हूँ कुछ।
    लड़के का दर्द, जाती हुई लड़की की आँखों में प्रतिबिम्बित हो रहा था। जब लड़की थाली लेकर लौटी तो लड़का वहीं खड़ा हुआ छत की ओर देख रहा था। उसे देखकर लड़का कुर्सी पर बैठ गया। लड़की ने एक स्टूल सरकाकर थाली उस पर रख दी।
    - जल्दी खा लो…
    इससे पहले कि कोई आ जाए। लड़के ने रोटी का एक टुकड़ा तोड़ा था। उसका हाथ कुछ क्षण तक हवा में रहा और फिर उसने टुकड़ा वापस थाली में रख दिया।
    - हम चोरी कर रहे हैं क्या?
    उसके स्वर में कुछ था कि छत पर दौड़ती हुई मकड़ी रुक गई।
    - हाँ, छिपकर कोई भी काम करना चोरी ही होता है।
    लड़की ने भी उसी तरह कहा, जैसे माँ बच्चे को समझा रही हो।
    - फिर मैं नहीं खाऊँगा।
    - कब तक भूखे रहोगे?
    लड़की ने निवेदन के स्वर में कहा। उसकी चंचलता तो वर्षों पहले ही समाप्त हो गई थी।
    - जब बिना चोरी का खाने को मिले।
    - अच्छा, यह चोरी का नहीं है। अब खा लो प्लीज़।
    लड़का आज्ञा मानकर खाने लगा। लड़की उसके पास खड़ी होकर उसका चेहरा निहारती रही। एक रोटी खाकर वह रुक गया।
    फिर कुछ सोचकर बोला- कब तक खिलाती रहोगी मुझे? कब तक चोरी करके पैसे लाती रहोगी मेरे लिए?
    - जब तक मैं रहूंगी….
    लड़की दूसरी ओर देखने लगी थी।
    - मैंने तो कुछ भी नहीं किया तुम्हारे लिए। बोझ बनकर यहाँ पड़ा रहता हूँ दिनभर…
    लड़की ने उसके होठों पर हाथ रख दिया और अगले ही क्षण रोने लगी।
    - प्लीज़, तुम मत रुलाया करो मुझे। कुछ मत बोला करो।
    वह रोते हुए बोली। लड़का उसे देखता रहा। उसे देखकर लगता था कि वह कमज़ोर काठ हो गया है।
    कुछ पल बाद लड़की अपने आप ही चुप हो गई।
    - अच्छा ये बताओ कि कल कौनसी कविता लिखी?
    लड़की दुपट्टे से अपने आँसू पोंछते हुए बोली।
    - कल कुछ नहीं लिखा और….
    वह कहता-कहता रुक गया।
    - और क्या?
    रोने से लड़की का चेहरा लाल हो गया था। लड़के ने कमरे में ही एक तरफ इशारा किया। राख का एक बड़ा सा ढेर था और कुछ अधजले कागज़ के टुकड़े हवा में इधर-उधर उड़ रहे थे।
    लड़की एक गहरी साँस लेकर धम्म से खाट पर बैठ गई और उस ढेर की ओर देखती रही।
    - ये क्यों किया तुमने?
    - माँ की याद आ रही थी। कुछ और तो था नहीं मेरे वश में, केवल ये कविताएँ थीं। अपनी कविताएँ जला देने का दर्द वह माँ ही समझ सकती थी, जिसे अपने बच्चे की हत्या करनी पड़ी हो। बाकी कोई कहता कि वह उस दर्द को महसूस कर सकता है, तो झूठ कहता।
    - तुम घर क्यों नहीं चले जाते? चार साल से घरवालों को कोई ख़बर भी नहीं दी। वह उसके दोनों हाथ, अपने हाथों के बीच में पकड़कर प्यार से बोली।
    - तब जाता तो वे तुमसे दूर किसी होस्टल में भेज देते और तब नहीं गया तो अब कैसे जाऊँ? उन्होंने सोचा होगा कि कहीं मर गया हूँ।
    काले शहर ने एक ठण्डी साँस भरी।
    - इतना प्यार क्यों करते हो कि जीना मुश्किल हो जाए?
    - तुम रोज़ खाना क्यों लाती हो कि जीना पड़े?
    - क्योंकि तुम्हें खिलाए बिना नहीं खा सकती।
    - जब मैं नहीं रहूँगा तो क्या करोगी?
    लड़के की धुंधली आँखों का रंग मटमैला हो गया था। इस बार ऐसा बोलने पर लड़की ने उसके होठों पर हाथ नहीं रखा।
    - मेरे कारण तुम्हारी ज़िन्दगी बर्बाद हो गई है….
    - बर्बाद कहाँ हुई? अभी तो तुम हो। जब नहीं रहोगी, तब पूछना….
    लड़के के चेहरे पर बहुत वेदना से भरी हुई मुस्कुराहट दौड़ गई।
    - तुम घर लौट जाओ प्लीज़।
    - तुम रह पाओगी?
    - न भी रह पाऊँ तो क्या रहूंगी नहीं?
    - मैं तो जी भी नहीं पाऊँगा।
    - हम साथ न रह सकें तो भी मेरे लिए जीते रहना।
    लड़की ने उसके हाथों को और कसकर पकड़ लिया था।
    - मैं चलती हूँ अब।
    वह हाथ छोड़कर खड़ी हो गई। लड़का कुछ नहीं बोला, सिर झुकाए कुर्सी पर बैठा रहा।
    लग रहा था कि कमजोर काठ भीतर से जल रहा है। लड़की चल दी। दरवाजे पर पहुँचकर कुछ क्षण रुकी।
    - पापा मेरे लिए लड़का ढूंढ़ रहे हैं। और चली गई। ……………
    कोई जाए, मगर यूँ सारी उम्मीदें साथ लेकर न चला जाए। थाली की दाल-रोटी, कमरे की दीवारों और फ़र्श के गले जा लगीं। अधजले कागज़ के टुकड़े पूरे जला दिए गए। भरी दुपहरी में कमरा अँधेरा हो गया और उम्मीद के आखिरी जुगनू को ‘पापा’ नाम को कोई जीव निगल गया।
    ……………कोई जाए, मगर यूँ किसी का जीवन साथ लेकर न जाए।

    ——————————————————————————–

    कमरे के एक दरवाजे पर खड़ी एक लड़की ने एक बार भीतर झाँका और फिर बाहर धीमे-धीमे टहलने लगी।
    - भगवान के लिए कुछ बोलो। तुम्हारी चुप्पी नहीं सही जाती। वह बड़े से आईने के सामने कुर्सी पर बैठी थी। बदन पर भारी-भरकम चमचमाते कपड़ों और गहनों का बोझ था और दिल पर उससे ज्यादा….
    वह उसके कदमों के पास चुपचाप बैठा रहा। उसके आँसू लड़की के पैरों पर बार-बार गिरते थे। लड़की के आँसू दुल्हन के कपड़ों में बीच में ही कहीं खो जाते थे, जैसे दुल्हन के सपने…
    - और मत रोओ…सारा मेकअप खराब हो जाएगा।
    पास खड़ी छोटे बालों वाली मोटी औरत ने रुमाल से उसका चेहरा हल्के से पोंछ दिया और फिर एक ब्रश उठाकर चेहरे पर रंग पोतने लगी। लड़का बोला नहीं, लड़की के पैरों पर गिरते उसके आँसुओं की गति बढ़ गई। लड़की का मन किया कि आँसुओं से सारा मेकअप धो डाले, ऐसे कि वो फिर कभी न चढ़ पाए और सब कपड़े इस तरह फाड़कर कहीं फेंक दे कि वैसे कपड़े फिर कभी न सिल पाएँ।
    लड़के ने झुककर लड़की के पैरों को चूम लिया और उन्हें चूमता हुआ भी रोता रहा। छोटे बालों वाली औरत आश्चर्य से उसे देखने लगी थी। लड़की सामने आईने में अपने आप को देखती रही। आँसुओं से फिर मेकअप बिगड़ने लगा।
    तभी लड़के की धुंधली होती आँखों में उसके पैरों पर लगी मेंहदी चुभी और वह चौंककर इस तरह दूर हट गया, जैसे कुछ याद आ गया हो।
    मोटी औरत फिर उसी निर्लिप्त भाव से अपने काम में लग गई, जैसे उसे कुछ सुनता न हो, कुछ दिखता न हो।
    - मैं आज कुछ नहीं कहूँगा। मैं अब कभी कुछ नहीं कहूँगा।
    बिलखते हुए वह बोला। कमरे में आने के बाद यह उसके मुँह से निकली हुई पहली बात थी।
    लड़की अपने आप को रोक नहीं पाई और अपने चेहरे पर से मोटी औरत का हाथ झटककर कुर्सी से उठकर लड़के के सामने बैठ गई और उसके माथे और आँसुओं से भरे चेहरे को बेतहाशा चूमने लगी।
    लड़का बिलखता रहा, जैसे आसमान से आग बरसकर उसे चूमती हो।
    एक बड़े से हॉल के बीचोंबीच फव्वारा था। मेहमान आने लगे थे। एक सजी-धजी सुन्दर औरत एकटक उस फव्वारे को ही देख रही थी। उसकी आँखों में हल्का सा पानी तैर गया।
    - क्या हुआ?
    एक आदमी ने उसके कन्धे पर प्यार से हाथ रखते हुए कहा।
    - कुछ नहीं….
    वह उसकी ओर देखकर मुस्कुराई। आँखों में तैरते पानी ने मुस्कुराने से साफ मना कर दिया।
    - हमारी शादी को याद कर रही हो?
    - हाँ….
    लेकिन आँखों ने झूठ बोलने से भी मना कर दिया। भीतर कहीं पीड़ा के फव्वारे फूट पड़े थे।
    कुछ क्षण बाद लड़की संभल गई और उसके चेहरे से दूर हट गई। फिर उसे देखकर कुछ पल तक रोती रही और रोती-रोती ही अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गई।
    लड़के का रोना बहुत कम हो गया था। मोटी औरत फिर अपना काम करने लगी।
    - जब आखिरी बार सोया था तो सपने में एक गली दिखी थी, जिसके सब घर जल गए थे। एक नीम का पेड़ दिखा….कह रहा था कि वो मर रहा है….
    लड़के की आवाज़ बहुत दूर से आती लग रही थी। अब वह रो नहीं रहा था।
    - मुझे याद मत करना, मेरी कसम है तुम्हें।
    लड़की काँपते हुए स्वर में बोली और कसम अगले ही क्षण टूटकर खनखनाती हुई बिखर गई।
    हॉल में तेज आवाज़ में संगीत बज रहा था। फव्वारे के पास खड़ी उस औरत ने संगीत और रंग-बिरंगे चेहरों में स्वयं को खोने का प्रयास किया, लेकिन नाकाम रही। उसका पति किसी परिचित को देखकर उससे मिलने चला गया।

    उसके दिल में गूंज रहा था- हमारी शादी को याद कर रही हो? और उसके मन में आया कि ये फव्वारे समन्दर बन जाएँ और वह डूब मरे।
    - रोओ मत, टाइम नहीं है बार-बार मेकअप करने का।
    मोटी औरत ने कड़े शब्दों में कहा तो लड़की कुछ धीमी आवाज़ में रोने लगी। हालांकि आँसुओं की गति कम नहीं हुई।
    - यह भी दिखा कि आकाश से दर्द बरस रहा है और उस शहर की सब गलियाँ घुटनों तक भर गई हैं….
    लड़के की आवाज़ भर्रा गई थी। वह बहुत कमज़ोर हो गया था और रोने से और भी कमज़ोर लगने लगा था।
    - मैं उसके साथ रह लूँगी, जी लूँगी, सो भी लूँगी, लेकिन तुम्हारे सिवा कभी किसी से प्यार नहीं करूँगी….
    यदि देवियाँ वरदान देती होंगी तो बिल्कुल उसी तरह देती होंगी, जिस तरह लड़की बोल रही थी।
    इस कथन पर मोटी औरत ने रुककर उसके चेहरे को ध्यान से देखा, फिर लिपस्टिक उठाई और उसके काँपते हुए होठों पर लगाने लगी।
    - याद है, हमारी शादी में तुम्हारी वज़ह से कितनी देर हो गई थी? तुम्हारे मेकअप के चक्कर में सब फेरों के लिए एक घण्टा इंतज़ार करते रहे थे।
    उसका पति फिर उसके पास आकर खड़ा हो गया था। इस बार वह मुस्कुरा भी नहीं पाई। उसे लगा कि चारों ओर मातम के गीत गाए जा रहे हैं। फव्वारों के गिरने की आवाज़, लहरों की गर्जना बनकर उसके दिमाग से टकरा रही थी। ऐसे में वह क्यों मुस्कुराती और कैसे मुस्कुरा पाती?
    - दीदी, बारात आ गई है। सब कह रहे हैं कि जल्दी करो।
    दरवाजे पर खड़ी लड़की चिल्लाकर बोली। छोटे बालों वाली औरत ने उसी क्षण अपना काम ख़त्म किया और संतोष की साँस ली। दरवाजे वाली लड़की भी भीतर आ गई और मंत्रमुग्ध सी होकर दुल्हन को देखती रही।
    मोटी औरत और दरवाज़े वाली लड़की ने सहारा देकर उसे कुर्सी से उठाया और लेकर बाहर की और चल दीं।
    - कब मिलोगी? पास बैठी लाश ने जैसे अंतिम शब्द कहे थे। इस पर दोनों ने घूमकर उसे देखा और रुक गईं। लड़की अब रो नहीं रही थी, न ही उसने लड़के की ओर देखा।
    - कभी नहीं।
    और चल दी।
    फव्वारे के सामने खड़ी औरत को दिखने लगा कि कोई समन्दर की ओर बढ़ा ही जा रहा है। उसका शरीर लहरों से नहीं डरता, बढ़ा ही जा रहा है….और वह धीरे-धीरे डूबता जाता है, बचने के लिए कोई प्रयास नहीं करता।
    कमरे की लाश एक ओर को लुढ़क गई। फव्वारे के पास खड़ी औरत गश खाकर गिर पड़ी। संगीत बजता रहा। ……………..

    ——————————————————————————–

    - तुम बहुत गन्दे हो मामा।
    मेरा दस साल का भांजा मुझसे कहता है।
    - क्यों?
    - पूरी कहानी क्यों नहीं सुनाते? हमेशा अधूरी छोड़ देते हो।
    - ………….
    - और न ही ये बताया है कि लड़के-लड़की का नाम क्या था? कौन थे वे?
    मेरे पास कोई उत्तर नहीं होता। मैं मुस्कुराने की कोशिश करता हूँ, शायद नहीं मुस्कुरा पाता। वह जिज्ञासा से मेरी ओर देखता रहता है और मैं डायरी बन्द करके रख देता हूँ।
    ‘तुम बहुत गन्दे हो…’ बहुत देर तक वातावरण में गूँजता रहता है।

  48. [...] हुआ है। तीसरे नंबर पर जीतू भैया के पहले प्यार को कॉपी किया है ६ अक्टूबर [...]

  49. वह सरजी आपकी ये प्यार कि दास्तान सुन के दिल बोला नही मुन्ना तेरे जैसे और भी हैं . सलाम है आपको !!
    Manish Kutaula´s last blog ..[Fail] Facebook & Google [/Fail]

  50. पहला प्यार अक्सर काफी मजबूत होता है पर बहुत कम सफल रहता है | जीतू भाई ऐसा क्यों होता है? हूँ ..हूँ ..हूँ.. :-)
    Gouri´s last blog ..I Do Not Smoke Till Day

  51. This is the nice blogs

    Jindgi me kabi aisa b nzara ho,
    Dil ko mere kisi ne hsrat se pukara ho.
    Chandni rat ho
    nadi ka kinara ho,
    Aur kya
    Bs Namkeen Hamari ho or QUARTER Tumhara ho.

  52. good

जरुरी सूचना

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