धीरे धीरे खत्म होती लोककलायें

नौटंकी का बदला स्वरूप अभी बीबीसी पर यह रिपोर्ट पढी, पढकर काफी दुःख हुआ, कि भारतीय लोककला नौटंकी,अपना स्वरूप खो रही है और अश्लीलता की तरफ बहुत तेजी से बढ रही है. और तो और इसके वजूद पर ही अब सवालिया निशान है. ना जाने कितने अच्छे नौटंकी कलाकारो ने अपने बच्चों को इस काम मे डालने से मना कर दिया है.

मुझे याद है, पुराने जमाने मे गुलाब बाई की नौटंकी बहुत मशहूर थी, ना जाने कितनी गाथाये हमने नौटंकी के जरिये देखी….पृथ्वीराज चौहान,आल्हा उदल,रामायण,हातिमताई के किस्से, सामाजिक कुरीतियो पर कटाक्ष करती नौटंकिया….क्या क्या नही था.

बहुत समय पहले मुझे याद है गुलाब बाई ने एक इन्टव्यू मे आगाह किया था कि नौटंकी की कला, आने वाले समय मे जीवित नही रह पायेगी, आज वही हो रहा है.

लेकिन कभी कभी मै सोचता हूँ कि

क्या इन सबके जिम्मेदार हम लोग नही है?
क्या हम लोगो ने नौटंकी से मुंह नही मोड़ लिया है?
क्या हम अब फटाफट मनोरंजन नही चाहते है?
अब हम नौटंकी को सिर्फ अश्लीलता के गाने सुनने का माध्यम मानते है?

इन सब सवालों के जवाब हम मे से किसी के पास भी नही है, क्योंकि हम तो बस फिल्मो,टीवी और इन्टरनेट मे ही मनोरंजन तलाशते है.

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4 Responses to “धीरे धीरे खत्म होती लोककलायें”

  1. Haal hi main nuatanki main yeh etihasik gaana sunne main aaya.
    Jubna pahaad karke atariya main sona kabootar re gutar gutar gutar gutar

    nautanki is a dead art bhai TV / computer ka jamaana hai. there is nothing constant in life but change. Adaptation is the key to survival be it us Computer shamputer type people or artsy fartsy types.

    hum aaye , hum padhe, hajaari maari aur nikal pade !

  2. कालीचरण जी की बात में दम है। हम हमेंशा अतीत तो संभाल कर रखना चाहते हैं। नौटंकी और बाकी लोककलाओं का विकास मनोरंजन के लिए बाकी साधनों का अभाव होने की वजह से हुआ होगा। सोचता हूँ कि अगर उस समय पर दुरदर्शन होता तो क्या ये कलाएं पनपती।

  3. एक बात जोडना चाहता हूं, कला मे दम होना चहिये और कला के कलाकारों मे! पिताजी के जमने मे वो मेहंदी हसन कि एल-पी सुनते थे उन्हे प्यार से तवा बोलते थे, मेरे पास वही गज़लें मोनो केसेट्स मे थीं , फिर वही चीज़ स्टीरीयो मे खरीदी, फिर सीडी पे, कुछ कलाकार तो अब डीवीडी पे हैं डोल्बी मे, रीवाईवल मे. कला काल-जयी होनी चाहिए और प्रासंगिक होनी चाहिये – आज कल की तेज़ रफ्तार जिन्दगी मे अभिजात्य वर्ग की सदापसन्द गज़ल भी प्रासंगिक नही है फिर नौटन्की जैसी लोक कला की क्या बिसात. मगर फिर भी दोष नई तकनीक का नही है – प्रासंगिकता का है. अभी मुगल-ए-आज़म देखी नई वाली – मज़ा आ गया. पुरानी चीज़ को नई तकनीक से संवार के देखा और वो बिकी क्योंकी अपन जैसे कदरदान हैं मारकिट मे!

    नई पौध को ये सब झिलाऊ लगता है – उनका क्या दोष! हम अच्छे बच्चे थे जो घर पे बडे सुनते थे हम भी सुनते थे जो उनका मनोरंजन वो हमारा – अब बात फरक है. यहां तो पत्नी और मैं ७०% गाने अलग सुनते हैं, फिल्मे अलग देखते हैं, टीवी अलग पीसी अलग, चेनल अलग साईट्स अलग, किताबें अलग पढते हैं दोनो के लिए मनोरंजन कि परिभाषा ही अलग अलग है. फिर भी नौटंकी चली जाये आश्चर्य नही – रंगमन्च नही जायेगा – वो अब भी प्रासंगिक है – मुम्बई, पेरिस, न्यु-यार्क या वेगस – क्योंकी वो समय के साथ बदला है.

  4. I IOVE YOU