अनूगूँज:मेरा चमत्कारी अनुभव

अक्षरग्राम अनूगूँजः छठा आयोजन
मेरा चमत्कारी अनुभव

Akshargram Anugunj
वैसे तो मै पूरी तरह से नास्तिक की श्रेणी मे आता था. और पूजा पाठ वगैरहा से दूर ही रहता था. लेकिन जीवन मे एक ऐसी घटना घटी जिसके बाद से मै आस्तिक तो नही लेकिन ईश्वर मे कुछ कुछ आस्था रखने लगा था.मै आपको एक सच्चा किस्सा सुनाता हूँ, जो मेरे साथ घटित हुआ था, इसमे कोई भी नमक मिर्च और मसाला नही लगा हुआ है.अब मेरे को एक्जैक्टली नही पता कि ये किस्सा इस अनुगूँज के टापिक पर पूरी तरह से खरा बैठता है कि नही.

बात उन दिनो की है जब मै हाईस्कूल मे पढता था, हमारे चाचाजी का बहराइच जिले मे ईट का भट्ठा (Brickfield) था, अब अपना गाँव तो पाकिस्तान मे छूट गया लेकिन जब भी दोस्तो से उनके गाँव की बात सुनते और दिल मचलता तो हम भाई लोग लद लेते थे, बहराइच जाने वाली ट्रेन पर. दो चार दिन वहाँ रहकर हम लौट आते,हमारे लिये तो वही हमारा गाँव था.अब चाचाजी तो मानसून आने के पहले घर लौटते नही थे, सो हर महीने घर का बना कुछ सामान देने के लिये और घरखर्च के पैसे लेने किसी ना किसी को तो बहराइच जाना ही होता था, पहले पहल तो कोई बड़ा बन्दा जाता था, और मै भी साथ लद लिया करता था, बाद मे बाकायदा हर महीने ये मेरी ड्यूटी मे शामिल हो गया था.अब तो हर महीने बहराइच जाना एक रूटीन हो गया था.हमारा भट्ठा बहराइच से सात किलोमीटर की दूरी पर था, और रोड से कुछ हटकर था.रोड तक टाँगा वगैरहा छोड़ देता था, बाद मे दो ढाई किलोमीटर का पगडन्डी का रास्ता था. रास्ता जाना पहचाना था सो कभी तकलीफ नही होती थी, पगडन्डी वाले रास्ते पर गाँव के लोगो ने किसी भूत प्रेतात्मा को देखा था, गाँव मे तरह तरह की अफवाहें फैली हुई थी.लेकिन मै इन सबमे विश्वास नही करता था.

पगडन्डी वाले रास्ते पर गाँव के लोगो ने किसी भूत प्रेतात्मा को देखा था, गाँव मे तरह तरह की अफवाहें फैली हुई थी.लेकिन मै इन सबमे विश्वास नही करता था.

ट्रेन बहराइच मे लगभग पाँच साढे पाँच बजे शाम को पहुँचती थी और मै भट्ठे तक सात बजे पहुँच जाया करता था. लेकिन एक बार ट्रेन बहुत लेट हो गयी और ट्रेन बहराइज साढे दस बजे पहुँची, बड़ी मुश्किल से एक खड़खड़ा मिला जिसने मेरे को रोड पर छोड़ा रात बहुत गहरी हो गयी थी. चाँद भी बादलो के पीछे था, सो रोशनी ना के बराबर थी. ठन्ड भी ठीक ठाक थी, मै पगडन्डी के रास्ते पर चल पड़ा, हाथ मे टार्च लिये और सनसनाती हवा से डर को भगाने के लिये गाना गाते हुए. अभी मै पगडन्डी पर चला जा रहा था,थोड़ा आगे जाने पर मेरे को एक पेड़ के नीचे एक बूढा बन्दा खाँसता हुआ मिला, काफी उम्र् थी उसकी, यही कोई पैसठ सत्तर ,कुबड़ा था बेचारा, उसने मेरे से पूछा कि कहाँ से आ रहे हो और कहाँ जाओगे, मैने उसको बता दिया कि हमारा ईट का भट्ठा है, वंही जाऊंगा, उसने मेरे चाचाजी का हालचाल भी पूछा, और बोला कि मै उनको जानता हूँ. अब तो मेरा भी उसपर कुछ कुछ विश्वास जमता नजर आ रहा था.उसने मेरे को निवदेन किया कि क्या मै उसे उसके झोपड़ी तक छोड़ सकता हूँ, मैरे को क्या परेशानी हो सकती थी, मैने उसकी बात मान ली और उसने मेरा हाथ पकड़कर चलने लगा, मेरा हाथ जैसे ही उससे स्पर्श हुआ तो मेरा दिमाग ठनका कि इतना ठन्डा हाथ, जैसे बर्फ, फिर भी मैने सोचा कि बूढा है बेचारा ठन्ड मे बैठे बैठे हाथ अकड़ गया होगा.

उसने मेरे को निवदेन किया कि क्या मै उसे उसके झोपड़ी तक छोड़ सकता हूँ, मैने उसकी बात मान ली और वो मेरा हाथ पकड़कर चलने लगा, मेरा हाथ जैसे ही उससे स्पर्श हुआ तो मेरा दिमाग ठनका कि इतना ठन्डा हाथ, जैसे बर्फ, फिर भी मैने सोचा कि बूढा है बेचारा ठन्ड मे बैठे बैठे हाथ अकड़ गया होगा.

मै उसको साथ लेकर चलने लगा, उसने अपना हाथ मेरे कन्धे पर रखा और हम लोग आपस मे बाते हुए चलने लगे, उसकी आधी बाते तो मेरे ऊपर से निकल रही थी क्योंकि वो ठेठ अवधी बोल रहा था, फिर भी मै उसके बताये रास्ते पर चलता हुआ उसको उसके झोपड़े पर ले गया, झोपड़े के आसपार का इलाका काफी साफ सुथरा था, फूलों की क्यारियो को अच्छी तरह से देखभाल की गयी लगता था.उसने मेरे को झोपड़े के अन्दर बुलाया और गुड़ खिलाकर पानी पिलाया, तख्त पर बिठाया और मेरे को अपनी बातें बताने लगा, मै सम्मोहित होकर बिना समय की परवाह करते हुए उसकी बाते सुनने लगा. उसने बताया कि कैसे उसके बच्चे उसको और उसकी बीबी को छोड़कर पैसा कमाने शहर चले गये और कभी लौटे नही.कुछ सालों बाद उसकी बीबी ने भी दम तोड़ दिया और वो अब यहाँ जंगल मे रहकर अपनी मौत का इन्तजार कर रहा है, मैने उससे पूछा तो फिर गाँव मे क्यों नही रहते हो, बीच जंगल मे क्यों झोपड़ा डाला है, उसका उसने कोई माकूल जवाब नही दिया, काफी देर तक हम बात करते रहे, समय का कुछ पता ही नही चला, फिर मेरे को लगा कि बहुत देर हो गयी है, अब निकलना चाहिये तो मेरे को उसने आगे का रास्ता समझाया और बाकायदा पगडन्डी तक छोड़ने भी आया, जाते जाते उसने मेरे को एक पत्थर दिया और बोला इसको हमेशा अपने पास रखना, ये तुम्हारी रक्षा करेगा. मेरे को समझ मे नही आया, फिर भी मैने वो पत्थर उससे लिया, और अपनी जेब के हवाले किया. और मै अपने भटठे पर रात को लगभग एक बजे पहुँचा, घड़ी देखकर मैने अन्दाजा लगाया कि मैने बूढे के साथ लगभग दो घन्टे बिताये थे.रात को तो मै भी जाकर सो गया.

सुबह सुबह मैने चाचाजी को पूरी बात विस्तार से बताई. चाचाजी ने सारी बात सुनी और गाँव के किसी बुजुर्ग को बुलाकर सारी बात बतायी, सारे लोग मेरे को जिन्दा देखकर अचरज कर रहे थे.चाचाजी ने तीन चार लोगो को साथ लिया और मेरे को बोले चल मेरे साथ और रोड से लेकर मेरे को उसके झोपड़े तक का रास्ता बताओ.हम लोग बाकायदा रोड से पगडन्डी पर चले और मैने उनको बताया कि इस पेड़ की नीचे बूढा मिला था, और मै उसके झोपड़े की तरफ का रास्ता बताने लगा,लेकिन वहाँ पहुँचकर देखा कि वहाँ ना तो कोई झोपड़ा ना कुछ, बस बन्जर सी जमीन थी, ऊबड़ खाबड़, जिस जगह उसने अपना झोपड़ा दिखाया था, वहाँ पर एक पुरानी सी कब्र थी. मै जहाँ बैठा था, वहाँ एक तख्त होना चाहिये था, फूलों की क्यारिया होनी चाहिये थी, दूर दूर तक ना झोपड़ी ना झोपड़ी के निशान, हमने आसपास का सारा जंगल छान मारा, कंही कुछ नही मिला. गाँव के लोगो ने बताया कि जिस बूढे के साथ मैने दो घन्टे बिताये थे वो इन्सान ना होकर प्रेतात्मा थी.

चाचाजी ने तीन चार लोगो को साथ लिया और मेरे को बोले चल मेरे साथ हम लोग बाकायदा रोड से पगडन्डी पर चले,लेकिन वहाँ पहुँचकर देखा कि वहाँ ना तो कोई झोपड़ा ना कुछ, बस बन्जर सी जमीन थी, ऊबड़ खाबड़, मै जहाँ बैठा था, वहाँ एक तख्त होना चाहिये था,वहाँ पर एक पुरानी सी कब्र थी. हमने आसपास का सारा जंगल छान मारा, कंही कुछ नही मिला. गाँव के लोगो ने बताया कि जिस बूढे के साथ मैने दो घन्टे बिताये थे वो इन्सान ना होकर प्रेतात्मा थी.

बाद मे गाँव के एक बुजुर्ग ने मेरे को बूढे की वही स्टोरी सुनायी जो बूढे ने सुनायी थी, बस फर्क इतना था कि उनके अनुसार काफी समय बीमार रहने के बाद, बूढा मर चुका था, मरने से काफी समय पहले ही गाँव वालों ने किसी वजह से उसको गाँव से बाहर निकाल दिया था, बूढे के मरने के बाद उसकी लाश कई दिनो बाद मिली थी, जिसे वंही दफना दिया गया था, लेकिन उसकी आत्मा को शायद शान्ति नही मिली थी और रात को वो प्रेतात्मा बनकर फिर आ जाता और गाँववालो को परेशान करता था.इसी डर से लोग रात को उस तरफ नही जाते थे.लोग बताते थे कि एक दो लोगो की मौत भी इसी तरह के हादसे मे हो चुकी थी, लेकिन मेरे को समझ मे नही आ रहा था कि उस प्रेतात्मा ने मेरा कोई नुकसान क्यों नही किया.मेरी स्टोरी पर किसी को विश्वास नही हो रहा था, लेकिन मेरे पास सबूत था, वो था एक पत्थर जो मेरी जेब मे था. मैने चाचाजी को दिखाया, वो पत्थर किसी चमकदार पत्थर का छोटा टुकड़ा था, जैसे स्टोन वगैरहा होते है, चाचाजी ने तुरन्त मेरे से पत्थर लेकर उसे नदी मे फिकवा दिया और मेरे को हिदायत की कि आगे से मै कभी भी शाम के बाद उस रास्ते पर ना आऊँ. और मेरी हालत तो ये थी कि क्या बताऊँ,मेरे सामने सारा सीन दुबारा घूम रहा था, वो ठन्डे हाथ, वो खांसना, वो बाते करना, वो मेरे कन्धे पर हाथ रखना. काफी दिनो तक तो मै बुखार मे तपता रहा. मै आज तक अपने दिमाग को समझा नही पाया हूँ कि वो सचमुच मे प्रेतात्मा थी.आज भी जब कभी मै वो हादसा याद करता हूँ तो सिहर उठता हूँ.

शायद ये कोई दैवीय शक्ति ही थी जिसने मेरे को उस दिन बचाया था.उस दिन के बाद से मेरे को ईश्वर पर कुछ कुछ यकीन होने लगा. अब ये आपके ऊपर है आप इसको कितना सच समझे या झूठ, मैने तो अपनी बात बिना लाग लपेट के आपके सामने कह दी है.

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10 Responses to “अनूगूँज:मेरा चमत्कारी अनुभव”

  1. जीतू भाई, आप का अनुभव रौंगटे ख़ड़े करने वाला है, यानी “फ्रीकी”। यदि यह अनुगूँज के इस टापिक पर पूरी तरह से खरा नहीं बैठेगा तो फिर क्या बैठेगा? सच पूछिए तो मन मानता नहीं है, लगता है कहीं न कहीं कोई न कोई “कैच” ज़रूर होगा, पर एक तरह से मैं प्रतीक्षा में भी था किसी की ऐसी आपबीती सुनने के लिए।

  2. विश्वास नहीं होता है कि ऐसा हो सकता है. लेकिन जरूर इस तरह के वास्तविक अनुभव कुछ लोगों को प्राप्त हुये हैं ..

  3. e36 bmw

    e36 bmw

  4. […] “मेरा चमत्कारी अनुभव” – मैंने अनुगूंज का यह विषय चुन कर स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है। स्वयं का कोई ढ़ंग का अनुभव है नहीं, लिखूँ तो क्या लिखूँ? यही होता है जब नौसिखियों को कोई ज़िम्मेवारी का काम दिया जाता है। समस्या यह है कि जब तक मैं स्वयं न लिखूँ तब तक न तो जीतेन्द्र और आशीष को “राजा बेटा वाली शाबासी” दे सकता हूँ, न औरों को अनुगूँज के एक नए आयोजक की लाज रखने की गुहार कर सकता हूँ। इसलिए, चलिए कोशिश करता हूँ थोड़ा कुछ कहने की। पते की बात कुछ छोटी है इसलिए घुमा फिरा कर कहूँगा। […]

  5. बहुत जबर्दस्त अनुभव रहा ।
    घुघूती बासूती

  6. मै समझ सकती हूँ, तब आप क्या महसुस कर रहे होंगे…

    वैसे आपको वो पत्थर ऐसे नही फेंकना चाहिये था… उसको आजमा लेते कि कैसा था… जरूरी नही कि वो प्रेतात्मा आपके लिये खतरनाक ही होता…

  7. papa i like it . i wish i could see that place anyways but i promise myself i shall definitely go that place . keep writing and have fun

  8. […] है कि जब तक मैं स्वयं न लिखूँ तब तक न तो जीतेन्द्र और आशीष को “राजा बेटा वाली शाबासी” […]

  9. आपके साथ उस का प्रेम से बाते करना येही बतलाता है की उससे अब्ब मुक्ति की जरुरत है .उस की कबर पर जाकर उस की आत्मा की शांति के लिए कुछ करो वो पत्थर भी तुम्हे एक न एक दिन दुबारा मिल जायेगा

  10. आपके साथ उस का प्रेम से बाते करना येही बतलाता है की उससे अब्ब मुक्ति की जरुरत है .उस की कबर पर जाकर उस की आत्मा की शांति के लिए कुछ करो वो पत्थर भी तुम्हे एक न एक दिन दुबारा मिल जायेगा fff