सातवीं अनुगूंज – बचपन के मीत
सातवीं अनुगूंज – बचपन के मीत

अब सबसे पहले तो ठलुवानरेश इन्द्र भाई का धन्यवाद, जो अतीत की यादों के पन्नों को फिर से खोलने का मौका दिया.वैसे तो मै समय समय पर आपको अपने बचपन की मोहल्ला पुराण सुनाता ही रहता हूँ, फिर भी अब जब छेड़ ही दिया गया है तो हम भी चुप क्यों बैठे. चलिये आज आपको अपने बचपन के साथियों की बाते सुनाते है.
बचपन के कई साथी थे, कुछ याद रहे कुछ भूल गये, कुछ कभी कभी दिखते है और कुछ दुनिया की भीड़ मे गुम हो गये. ऐसे ही एक मित्र थे देवीप्रसाद. हाँ तो देवीप्रसाद जो थे……. माफ कीजियेगा, थे नही हैं, एक नम्बर के महाकन्जूस इन्सान. बचपन मे स्कूल मे कभी भी अपना टिफिन नही लाये, हमारा सारा खाना खा जाते थे, और हड़काते थे सो अलग से, कि खबरदार जो टीचर को शिकायत लगाई.अब उनका डीलडौल देखकर किसी की हिम्मत नही होती थी कि पंगा ले, सो चुपचाप इन्टरवल होते है सारा ग्रुप खाने का टिफिन उनके हवाले कर देता था. और देवीप्रसाद इन्टरवल के शुरू होने से लेकर खत्म होने तक सबके टिफिन खाता रहता था.देवीप्रसाद की मुफ्त की खाने की आदत कभी भी नही बदली. हम लोग थोड़े बड़े हुए तो रविवार के दिन सिनेमा वगैरहा देखने भी जाया करते, अब सबको लिमिटेड जेबखर्च मिलता था, कहाँ तक देवीप्रसाद को फीड करते रहे. देवीप्रसाद की जेब हमेशा से ही खाली रहती,हमेशा मंगताराम बना रहता था. जेब मे धेला नही होता था, लेकिन हर प्रोग्राम मे चलने के लिये शामिल रहता था. हर जगह हमारे साथ लद लिया करते था.हम लोग भी दोस्ती धर्म का निर्वाह करते हुए उसके जुल्मो सितम को झेले जा रहे थे.ऐसा नही था कि उसे जेबखर्च नही मिलता था, उसके पिताजी का अच्छा खासा बिजनेस था, और देवी को भरपूर जेबखर्च मिलता था. लेकिन देवी जैसा कांचू इन्सान कभी भी पैसे नही खर्च करता था.हम लोग भी किसी खास मौके का इन्तजार कर रहे थे.एक दिन किसी दोस्त ने देवी की जेब मे कुछ रूपये देख लिये, आंखो ही आंखो मे प्लान बन गया, सारे दोस्तों और उनके भी दोस्तों को इकट्ठा किया गया और हम लोग शहर के सबसे अच्छे रेस्टोरेन्ट मे खाना खाने के लिये चले गये. खाने के आर्डर मे कोई कमी नही की गयी.अच्छे खासे बिल का जुगाड़ कर दिया गया था.सबने पेट भरके खाना खाया, आदत के मुताबिक देवीप्रसाद आखिरी तक खाता रहा. हम लोगो ने पहले ही प्लान बनाया हुआ था,उसके मुताबिक एक एक करके बाथरूम का बहाना करके हम लोगो होटल से बाहर निकल आये. बचा रह गया देवीप्रसाद. आखिरी मे उसी को बिल चुकाना पड़ गया और उस दिन देवीप्रसाद को अच्छा खासा चूना लगा था, उस दिन के बाद से देवीप्रसाद ने कभी भी हम लोगो के साथ मुफ्त लदने की कोशिश नही की. लेकिन दोस्ती बरकरार रही.
अब ये दूसरा किस्सा है मै शायद सुना चुका हूँ फिर भी सुनिये…हमारे एक और मित्र थे, सुखबीर उर्फ सुक्खी, सुखबीर पढने मे ठीकठाक था, लेकिन अंग्रेजी का नाम सुनते ही उसके हाथ पाँव फूल जाते थे. कोई अगल बगल मे अंग्रेजी बोलता दिखता था, तो सुक्खी की नजर मे देवता समान होता था.सुक्खी ने कभी भी अंग्रेजी से दोस्ती नही रखी, उसको अंग्रेजी मे पास करवाने की जिम्मेदारी सारे ग्रुप की थी, हम लोग उसको अंग्रेजी मे नकल करवाते और किसी तरह से उसको पास करवाते. लेकिन कभी कभी उसमे भी पंगा हो जाता था, क्योंकि सुक्खी सवाल नम्बर दो का जवाब, सवाल नम्बर तीन के सामने लिख आता था. कहने का मतलब ये है कि अंग्रेजी मे पूरी तरह से पैदल था. स्कूल तक तो मामला ठीक था, लेकिन बोर्ड के इम्तहान मे नकल करवाने का रिस्क कोई नही ले सकता था, तो जनाब हुआ यों कि हम लोगो ने सुक्खी को COW पर निबन्ध तैयार करवाया, सुबह शाम रट्टा लगवाया, लेकिन मार पड़े एक्जाम पेपर सैट करने वालो पर, उन्होने POSTMAN पर निबन्ध लिखा. अब सुक्खी तो सुक्खी निबन्ध तो उसने काऊ पर ही लिखा लेकिन जहाँ जहाँ काऊ थी, वहाँ वहाँ पोस्टमैन लिख मारा. आप भी निबन्ध की कुछ पंक्तिया पढिये.
POSTMAN is a Pet Animal.POSTMAN has four lags and one tail.POSTMAN gives us milk.POSTMAN eats Grass. वगैरहा वगैरहा. निबन्ध पढकर एक्जामिनर भी बहुत हँसा था. आजकल सुक्खी अपने पिताजी की दुकान को सम्भाल रहे है. लेकिन आज भी वो अंग्रेजी मे पैदल है, लोग उसकी कमजोरी जानते है और अंग्रेजी मे बोलकर सामान सस्ते मे ले जाते है.
एक और मित्र थे, धीरेन्द्र जी उर्फ धीरू, इनको क्रिकेट खेलने से ज्यादा,अम्पायरिंग करने का बड़ा शौंक था.अब शौंक ऐसा था कि कई बार पिटे, लेकिन अपने शौंक को नही बदल सकें.सब लोग इनको अम्पायरिंग के लिये पकड़ के ले जाते थे, क्योंकि एक फुलटाइम अम्पायर मिल जाता था,जिसको बैटिंग नही करानी पड़ती थी.एक बार तो सीनियर्स के मैच मे इनको अम्पायर बनाया गया, कुछ डिसीजन गलत हो गये, तो पहले इनको टीम ए ने मारा, तो टीम बी ने बचाया, फिर जब टीम बी ने मारा तो टीम ए बचाया, लेकिन मैच के आखिरी ओवर मे एक आउट डिसीजन को देकर वापस लेने पर दोनो टीमों ने इनको मारा. बेचारे काफी दिनों तक तो क्रिकेट के मैदान पर ही नही लौटे. आजकल ये जनाब भारतीय जीवनबीमा निगम मे कार्यरत है, लेकिन जब भी हम लोग पुराने दिन याद करते है,बहुत हंसी आती है.
अब दोस्त तो कई थे, सबके अलग अलग किस्से, अब कहाँ तक बताया जाय, इस पर विस्तार से फिर कभी लिखेंगे.
अपडेट:भाइयों मेरा ब्लाग पढकर, मेरे पुराने मित्रो की कुछ प्रतिक्रिया आयी है तो मै ज्यों का त्यों छाप रहा हूँ.
देवीप्रसाद की प्रतिक्रियाः अबे XX!%$! फिर से शुरु हो गये, बचपन की कुटाई भूल गये क्या? आओ बेटा इस बार ठीक से समझाते है तुमको. और रही बात उस दिन के रेस्टोरेन्ट की, तो वो तुम्हारा प्लान था, ठीक है गुरू, कभी ना कभी तो आयेगा ऊँट पहाड़ के नीचे. वैसे मै तुम्हारे ब्लाग पढने वालों को बताना चाहूँगा कि ये जीतू महाराज, हमारे समय मे पप्पू सिन्धी के नाम से मशहूर थे, और बहुत ही एक्टिव प्राणी थे, जब कभी स्कूल का होमवर्क नही करके लाते थे तो पूरी पूरी क्लास ही गोल कर जाते थे. खुद तो करते ही थे, दूसरों को भी उकसाते थे और सारा समय लेनिन पार्क मे गिली डन्डा खेलते थे. एक बार किसी ने टीचर को शिकायत लगायी तो टीचर इनको और दूसरे छात्रों को लेनिन पार्क से स्कूल तक मारते मारते ले कर आये थे, वो दिन तो पप्पू यानि जीतू को हमेशा याद रहेगा.
धीरू की प्रतिक्रियाः भाईसाहब, हमारी बातें तो सबको बताते फिरते हो, अपनी बातें छुपा जाते हो. ये बात ठीक नही है, भाइयों आप लोग पप्पू(जीतू) की बातों का विश्वास ना करियेगा, ये एक नम्बर के गोलीबाज है, बात होगी दस बीस परसेन्ट ये बना देंगे सौ परसेन्ट, बस अन्दाजे बया मे लोग गच्चा खा जाते है, जो इनकी खासियत है. खुराफाती तो खैर पहले भी थे, अब भी होंगे, इन्सान की फितरत थोड़े ही बदलती है. अब इनके बारे मे भी सुन लीजिये हुआ यों कि एक बार मोहल्ले का कोई दादा टाइप का लड़का इनको जबरिया अपना लव लैटर, दूसरे मोहल्ले मे अपनी प्रेयसी को देने के लिये दे गया, प्रेम पत्र के साथ साथ कुछ सामान भी था, इन्होने प्रेमपत्र मोहल्ले के सभी लड़को को बुला बुलाकर पढवाया था, ऊपर से तुर्रा ये कि इन्होने प्रेम पत्र तो डिलीवर किया, सामान गायब कर दिया, पहले तो दूसरे मोहल्ले के लड़को ने इनको प्रेमपत्र देते हुए देख लिया, तो पहले ये वहाँ पिटे फिर जब दादा टाइप के लड़के को मालूम पड़ा कि अमानत मे खयानत हुई है तो उसने भी इनको जमकर पीटा. बेचारे दोनो जगह से पिटे.इनकी तो लाइफ ही टनाटन हो गयी थी. क्यों पप्पू याद है ना?




















































I am currently doing a translation of a RSS aggregator RSSBandit (RssBandit.org) in Hindi. I need atleast one proof reader for my translation. Would you be interested in helping me out with this?
Thanks,
Munish
आप मुझे मैटर भेजे, मै यथासम्भव मदद करूंगा.
यदि आपको अनुवाद मे भी कोई मदद चाहिये तो बन्दा हाजिर है.
एक दूसरे के सहयोग से ही हम वैब पर हिन्दी का विकास कर सकेंगे.
आजकल सारा कमेन्ट वगैरहा का ठेका, ठलुआ नरेश को बेच खाये हो का?
पिछली कमेन्टवा का उधार भी अभी धूल खा रहा है.इत्ती उधारी मत चलाओ.
और रही प्रूफरीडिंग की बात, अरे भई, काम आने तो दो, सब मिल बाँट कर कर लेंगे यार.
और तुम्हरी सुरीली आवाज मे रिकार्ड की गयी प्रविष्टि अभी पहुँची नही, हम इन्तजार कर रहे है.
तुमको पता ही है, अगर तारीफ कर दोगे ,तो एक हफ्ता नही लिखेंगे, पूरा हफ्ता सोचने मे लगा देंगे कैसे और अच्छा लिखें कि शुक्लाजी इस बार ज्यादा तारीफ करें. तो भइया, हम तारीफ वगैरहा से तो काफी ऊपर उठ चुके है, हाँ गलतिया बताओ, आगे का रास्ता सुझाओ, बुजुर्गों से ये सब ही तो चाहिये होता है, है कि नही?
बचपन जो कि शायद 20 – 30 साल पहले का था , हमलोग चटकारे लेकर कितनी खुबसूरती से मजे ले रहे हैं । लेकिन सोचता हूँ , क्या आज से इतने ही सालों के बाद क्या यह वर्तमान बचपना जैसा लगेगा ।
आपके सुझावों पर सोच विचार शुरु कर दिया है,
जल्द ही आप पिछले दस ब्लाग्स और हाल आफ फेम देखेंगे.
धन्यवाद
Ashvani Kumar
B. Tech IV (CSE)
IIT Roorkee.
[...] इनके ब्लागलेखन की सबसे बडी़ विशेषता इनकी किस्सा गोई है.जो कि शायद इनके शुरुआती पेशे के कारण भी हो.मोहल्ला पुराण , बचपन के किस्से तथा मिर्जापुराण के किस्से खासे लोकप्रिय रहे. अपने पढ़ने के लिये ये समसामयिक घटनाओं पर तथा तकनीकी लेख लिखने से भी नहीं चूके.जीतेन्द्र के लिखने का मूल स्वर हास्य व्यंग्य का रहता है जिसको पढ़ने के बाद हंसी रोकना मुश्किल होता है.इसी कैटेगरी के तमाम लेख ऐसे भी हैं जिनको पढ़ने के बाद हंसने के लिये गुदगुदी करनी पडती है. [...]
[...] अब दोस्त तो कई थे, सबके अलग अलग किस्से, अब कहाँ तक बताया जाय, इस पर विस्तार से फिर कभी लिखेंगे. [...]
[...] तो जनाब बात कुछ यूं है कि बचपन मे हमारे प्रेम कंचे खेलने से शुरु हुआ, फिर गिल्ली डंडा से होते हुए, क्रिकेट पर जाकर समाप्त हुआ। जब क्रिकेट को पाया तो यूं लगा जैसे मीरा को राम मिल गए। दिन रात क्रिकेट की बातें, कमेन्ट्री ना समझ मे आते हुए भी कान से ट्रांजिस्टर लगाए रखना, सारे क्रिकेट हीरों के (लाइब्रेरी की मैगजीन से फाड़े हुए चित्र) अपने कमरे की दीवारों मे यहाँ वहाँ चिपकाए गए। यानि क्रिकेट की सारी दीवानगी का प्रदर्शन किया गया। अब दीवानगी अकेले के बस की बात नही, इसलिए मोहल्ले की बाकी वानर सेना को तैयार किया गया। धीरु इसमे सबसे आगे था। नए पाठक धीरु के लिंक को क्लिक करके मिल सकते है। अब पंगा ये था कि क्रिकेट की किट बहुत महंगी होती थी, उसका जुगाड़ कैसे किया जाए, हमारे पास माडल प्लान तैयार था, वही चन्दे वाला, लेकिन उससे भी काम नही बनना था। क्योंकि किट के पैसों का जुगाड़ तब भी नही हो पाता। घरवालों ने और पैसे देने से मना कर दिया था। अब हम कोई सचिन,सहवाग,धोनी तो थे नही कि कम्पनियां हमे प्रायोजित करती। फिर भी हमने हार नही मानी। एक प्लान तैयार हुआ कि हम लोग पहले सड़क पर खेलेंगे। उसमे बस एक क्रिकेट बैट और एक बॉल चाहिए थी। विकेट तो किसी भी तीवार पर लाइनें खींचकर बना ली जाती। हाइजीन का पूरा पूरा ख्याल था, बॉल नाली मे जाएगी उसको उठाने के लिए हमने पिछली गली की बस्ती के दो चार बन्दो को टीम मे शामिल कर लिया। उनका काम इतना ही था कि वे सिर्फ़ नाली से बॉल उठाकर, नल के पानी से धोकर हमे दे देंगे, बदले मे उनको बैटिंग मिलेगी। बीच का कौआ टाइप की। क्या कहा..बीच का कौआ नही जानते? अमां ये सब फुरसतिया से पूछो, वो बताएंगे। खैर जनाब प्लान इस प्रकार था कि पहले हम गली मोहल्ले मे खेलेंगे, लोगो के घरो/दुकानों की खिड़कियां तोड़ेंगे, तंग आकर लोग हमे पार्क जाने को कहेंगे, हम लोग तड़ाक से चंदा मांग लेंगे। इस प्लान के सफ़ल होने की उम्मीद बहुत कम थी, लेकिन फिर भी हिम्मते मर्दा मददे खुदा। [...]
[...] बस यंही फ़ड्डा हो गया। वंही से अपने शुकुल जी नहा धोकर हमारे पीछे पड़ गये बोले अब तो लिखना ही पड़ेगा। हम भी सोचे, जिन्न और जिन्नात से पीछा छुड़ाया जा सकता है, लेकिन शुकुल से नही। अब जब शुकुल कन्धे पर चढ गये है बिल्कुल बेताल की तरह है, कहानी सुनकर ही उतरेंगे। इसलिये हमने अपने कन्धे पर लदे, शुकुल को थपथपाया और मन ही मन सोचा कि लिखकर निकाल देते है दिल के गुबार। तो जनाब पेश है हमारी दीवाली की यादें। यूं तो त्योहारों की मस्ती अगस्त से शुरु होती थी, जिसमे दशहरा आने तक एक ठहराव आता था। और दीवाली आने तक इस मस्ती को और हवा मिलती थी।बड़ों के लिये दीवाली का चाहे जो मतलब हो, हमारे लिये तो दीवाली का मतलब नये कपड़ें, मिठाई, पटाखे और बड़ों से मिलने वाली दीवाली का आशीर्वाद(मनी) हुआ करता था।दीवाली आने से पहले ही दुकाने सजने लगती थी।हम और धीरू, निकल पड़ते थे, अपनी अपनी विश-लिस्ट बनाने। ये ध्यान जरुर रखा जाता था, कि विश-लिस्ट मे ज्यादा से ज्यादा आइटम हो(वैसे भी लिखने मे अपना क्या जाता था), ताकि धीरू नरवसिया जाय। अब नरवसियाने का मतलब हमसे ना पूछा जाय, पूछताछ कार्यालय, फ़ुरसतिया जी के अहाते मे है। हाँ तो हम कह रहे थे, कि जहाँ धीरू नरवसियाया नही वहाँ उसकी चोक लेनी शुरु हो जाती थी।बेचारा धीरु, साल भर अपना जेब-खर्च बचा बचा कर पटाखों को खरीदने का प्लान बनाता, हम लोग दीवाली के आसपास उसके सामने अपनी लिस्ट द्वारा इतने आपशन रखते कि वो फ़ुल्ली कन्फ़्यूजिया जाता। खैर, हम लोग दुकान दुकान जाते, हर चीज के रेट पूछते, पूछते…………. इतना पूछते कि, दुकानदार झल्ला जाता। वो हमारी शक्ल देखकर ही, दूसरे ग्राहकों की तरफ़ देखने लगता, फ़िर भी हम तो फ़ुल्ली फ़ालतू, टंगे रहते उसकी दुकान पर। सभी चीजों के भाव पता करते, लेना देना तो कुछ होता नही था, बस घर मे अपनी डिमान्ड बतानी होती थी, इसलिये मार्केट सर्वे तो करना ही पड़ता है ना। है कि नही। [...]