
आप सभी पाठकों के प्यार और विश्वास के साथ इसी हफ़्तें “मेरा पन्ना” ने एक वर्ष पूरा किया है. मैने अपना ब्लागिंग का सफ़र यूं तो अगस्त २००४ मे शुरू किया था लेकिन मेरा पन्ना सितम्बर २००४ मे ही अवतरित हुआ था. ये आप लोगों का स्नेह और प्यार है कि मेरा पन्ना के पेज हिट्स की संख्या १४,००० के आंकड़े को भी पार कर गयी है. जो मैने कभी भी नही सोचा था.
मैने अपने ब्लागिंग से सम्बंधित अनुभव आपके साथ शेयर किये थे, इसलिये दोबारा सुनाकर बोर नही करना चाहूँगा.
नये वर्ष मे मेरा पन्ना मे एक और नया स्तम्भ भी शुरु हो रहा है, “इसी हफ़्तें पिछ्ले वर्ष” , इसमे आप पिछ्ले वर्ष की इसी हफ़्ते की प्रविष्ठियों का अवलोकन कर सकेंगे, आशा है आप इसे पसन्द करेंगे. ( ये स्तम्भ आप साइडबार मे या कमेन्ट बाक्स के नीचे देख सकेंगे)
मै आपके प्यार और सहयोग का ह्र्दय से आभारी हूँ, और आशा करता हूँ आप मेरा पन्ना को यूँ ही चाहते और सराहते रहेंगे.आपके प्रोत्साहन,स्नेह और सहयोग का आकांक्षी.
आपका भाई
जीतेन्द्र चौधरी
आप इन्हे भी पसंद करेंगे
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- मई 31, 2008 -- धन्यवाद गूगल एडसेंस (23)
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on रविवार, सितम्बर 4th, 2005 at 2:32 pm and is filed under Uncategorized.
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Author: Jitendra Chaudhary (508 Articles)

जन्म से कानपुरी, लेकिन रोटी के लिये मिट्टी से दूर, साफ़्टवेयर बनाते बनाते कब ब्लॉग लिखने लगे, पता ही नही चला। फिर कुछ शरारती तत्वों ने लेखन की तारीफ़ दी, अब झेलो, कानपुरी हूँ, इत्ती जल्दी तो नही रुकने वाला। इंटरनैट के लती। लेखन शैली में श्री के पी सक्सेना जी से प्रेरित। भारतीय राजनेताओ से खासी चिढ,वैसे भी तारीफ़ के लायक तो कोई काम किए नही ये लोग। भारत की सामाजिक एवम राजनैतिक दुर्दशा से व्यथित। इसी व्यथा का ही नतीजा है कि हम ब्लॉगिंग मे कूदे। आजकल कुवैत मे डेरा है, यही पर बसेरा है। अब देखते है कब तक हम इस खूंटे डेरे से बंधे रहते है।
सपनाः हिन्दी इन्टरनेट की आधिकारिक भाषा बने।
पसन्दः राजनीतिक चर्चा, बचपन की यादें।
नापसन्दःनहाने के बाद,पत्नी द्वारा,बाथरूम मे वाइपर लगाने को बाध्य किया जाना
मेरे बारे मे बाकी जानकारी इधर है:
मेरा पन्ना पर टिप्पणी करने वालों के लिए एक तोहफा। आप टिप्पणी करिए और अपने ब्लॉग का पता सही सही भरिए, हम आपके ब्लॉग की आखिरी पोस्ट का लिंक यहाँ दिखा देंगे। इससे आपके ब्लॉग को कुछ और पाठक मिलेंगे। है ना सही चीज? तो फिर देर किस बात की है, शुरु हो जाइए।
मस्त रहो व्यस्त रहो की बोर्ड पर उंगलियाँ थिरकाते रहो।
पंकज
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