दु:ख की घड़ी
Author: jitu9968 (498 Articles)
जन्म से कानपुरी, लेकिन रोटी के लिये मिट्टी से दूर, साफ़्टवेयर बनाते बनाते कब ब्लॉग लिखने लगे, पता ही नही चला। फिर कुछ शरारती तत्वों ने लेखन की तारीफ़ दी, अब झेलो, कानपुरी हूँ, इत्ती जल्दी तो नही रुकने वाला। इंटरनैट के लती। लेखन शैली में श्री के पी सक्सेना जी से प्रेरित। भारतीय राजनेताओ से खासी चिढ,भारत की सामाजिक एवम राजनैतिक दुर्दशा से व्यथित। आजकल कुवैत मे डेरा है, यही पर बसेरा है। सपनाः हिन्दी इन्टरनेट की आधिकारिक भाषा बने। पसन्दः राजनीतिक चर्चा, बचपन की यादें। नापसन्दःनहाने के बाद,पत्नी द्वारा,बाथरूम मे वाइपर लगाने को बाध्य किया जाना मेरे बारे मे बाकी जानकारी इधर है:
इस वर्ष की शुरुवात या कहें २००५ का अन्त मेरे लिये अच्छा साबित नही हुआ।विगत २४ दिसम्बर को मेरे पिताजी का कानपुर(उ.प्र.) मे देहान्त हो गया, वे ७५ वर्ष के थे। मै तुरन्त कुवैत से कानपुर के लिये रवाना हो गया था, लेकिन २५ दिसम्बर की रात तक ही कानपुर पहुँच सका। घर मे सबसे छोटा होने के कारण मै सबका लाडला हूँ। पिताजी का मुझसे विशेष स्नेह था। किसी भी व्यक्ति के जीवन का यह सबसे गम्भीर क्षण होता है जब उसके सर से मां बाप का साया उठता है। मै ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि भगवान उनकी पुण्य आत्मा को शान्ति प्रदान करें।आप सभी साथियों के शोक सांत्वना सन्देशों के लिये बहुत बहुत धन्यवाद।
पिताजी के देहान्त से मै अत्यन्त ही दु:खी हूँ, अभी तक मै इस सदमे से उबर नही पाया हूँ, इसलिये लेखन का कार्य कुछ दिन स्थगित रह सकता है।आशा है आप सभी इस बात को समझेंगे और पूरा पूरा सहयोग करेंगे।














































काश, आपका दुःख अगर शब्दों में बाँट सकता ।
जानते हैं, अभी मेरे माता -पिताजी मेरे साथ ही रहते हैं । कभी मेरे दूर स्थानांतरण की बात आती है न, उनके चेहरे पर चिंता की कुछ लकीरें तुरंत आ जाती है । उनकी लकीरें कुछ पुछती है हमसे । मैं मुक-बघिर हो जाता हूँ । नियति की रीति क्या है , किस स्थान – काल में कौन कहाँ होगा, पता नहीं ।
परम पिता का वह पवित्र अंश, जो कि अजर-अमर है, हमें हर परिस्थिति में मार्गदर्शन रहें, हम सब उनके कुछ सपनों को साकार करें , बस यही प्रार्थना है हमारी । पुरे परिवार को हमारी संवेदनाएँ ।
सद्पुरुष सदैव सद्गति को प्राप्त होते हैं, उनके हमारे बीच से जाने का दु:ख भी उतना ही अधिक होता है. प्रार्थना है प्रभु से, आपको और शोक संतप्त परिवार को इस दु:ख की धडी में धैर्य प्रदान करें.
मृत्यु नासमझों के लिए दुःख है,समझदारों के लिए चुनौती।और एक सन्देश स्वयं के प्रति जागने का
कुछ़ भी न यहॉ पर मिटता है, बस रूप बदलता जाता है।
फिर नया जन्म,फिर नई देह, बनता नव रिश्ता-नाता है।
भूलो मत भूल-भुलैया में, चढ जा सद्गुरू की नैया में।
अथ सद्गुरु शरणम् गच्छामि, भज ओशो शरणम् गच्छामि ।
धन्यवाद।
ओशो जागरण, कानपुर।
शशि
आशीष
इस दुखद समाचार के बारे में मुझे तभी ज्ञात हो गया था जब आप भारत में थे, परंतु मैं लिखने में असमर्थ था.
दु:खद क्षणो में ईश्वर आपको शक्ति और पुण्यात्मा को शांति प्रदान करे.
आपका
संजय बेंगाणी
Pita ghar ki chat ki tarah hote hen, unaka na rahana ek vichitra asurksha ki Bhavana deta he, mujhe is dad ka anubhava he. isase nikalane ka yahi upay he ki aap apane baccho ke samane pita ko upasthit rakhe, usi sneh me, jo apake pita ne diya
samvedanao sahit
Rati saxena