गणतन्त्र दिवस : हमने भारत को क्या दिया

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Author: jitu9968 (498 Articles)

जन्म से कानपुरी, लेकिन रोटी के लिये मिट्टी से दूर, साफ़्टवेयर बनाते बनाते कब ब्लॉग लिखने लगे, पता ही नही चला। फिर कुछ शरारती तत्वों ने लेखन की तारीफ़ दी, अब झेलो, कानपुरी हूँ, इत्ती जल्दी तो नही रुकने वाला। इंटरनैट के लती। लेखन शैली में श्री के पी सक्सेना जी से प्रेरित। भारतीय राजनेताओ से खासी चिढ,भारत की सामाजिक एवम राजनैतिक दुर्दशा से व्यथित। आजकल कुवैत मे डेरा है, यही पर बसेरा है। सपनाः हिन्दी इन्टरनेट की आधिकारिक भाषा बने। पसन्दः राजनीतिक चर्चा, बचपन की यादें। नापसन्दःनहाने के बाद,पत्नी द्वारा,बाथरूम मे वाइपर लगाने को बाध्य किया जाना मेरे बारे मे बाकी जानकारी इधर है:

आप सभी को गणतन्त्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

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आज का दिन यह सोचने का नही है कि भारत ने हमे क्या दिया, आज हमे इस पर विचार करना है कि भारत के लिए हमने क्या किया, हमारा क्या योगदान है। किसी भी देश की पहचान उसके देशवासियों से होती है, उनके विचारों से होती है, उनकी लगन, मेहनत और इच्छा-शक्ति से होती है। आज विश्व हमारी तरफ़ आशा भरी निगाहों से देख रहा है, आइए गणतन्त्र दिवस के पावन पर्व पर शपथ लें कि हम देश के लिए योगदान करेंगे, कुछ ऐसा योगदान जो देश को और आगे ले जा सके।

वीडियो सौजन्य : यू-टयूब

आइए बनाएं एक बेहतर भारत।

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7 Responses to “गणतन्त्र दिवस : हमने भारत को क्या दिया”

  1. आइए बनाएं एक बेहतर भारत।

    हमारा अपना भारत।

  2. बहुत अच्छा विडियो है.. और विचार भी.. मैं क्य योग्दान दे पाउंगी पता नहीं .. पर कोशिश करूंगी

  3. गणतंत्र दिवस पर आपको भी हार्दिक शुभकामनायें.

  4. जीतू भाई आप भारत के विषय में क्या सोंचते है,मैं मात्र यह विडियो देख कर कह सकता हूँ…अभी हमारे देश को निराशा की नहीं आशाओं की पुकार है…स्वर्णपाखी भारत का स्वर्णीम विकास!!!

  5. अच्छा विडियो। हम क्या योगदान दे सकते हैं ये कइयों का सवाल रहता है। मेरा विचार इस पर एक विस्तृत लेख लिखने का है। आशा है जल्दी पूरा करूँगा।

  6. देश के लिये अपनी जानदेने वाले फौजियों के घरवाले आज शायद यही कह रहे होंगे – “हमने भारत को क्या नही दिया”

  7. जीतू भाई, देर से टिप्पणी देने के लिए मुआफ़ी चाहता हुं क्या करुं देर से पहुंचा हूं ना चिठ्ठा जगत पर। जैसा कि आपने लिखा है मै उस से सहमत हूं, दरअसल आज हम ज्यादा से ज्यादा स्वार्थी और व्यवसायिक होते जा रहे है। हम यह भूल जाते हैं कि जिस परिस्थितियों, समाज और देश में रहते हैं उसके प्रति भी हमारी कुछ ज़िम्मेदारियां हैं। बचपन में हमने यह पढ़ा था कि नागरिकता के नियमों के मुताबिक नागरिकों के अधिकार व कर्तव्य एक दुसरे में निहित है। एक नागरिक के अधिकार दुसरे का कर्तव्य है पर आज………आज हम अपने अधिकारों के प्रति तो जागरुक हैं और कर्तव्यों के प्रति उदासीन। हमारा स्वार्थ इतना बढ़ता जा रहा है कि अपने अधिकारों का ज्यादा से ज्यादा दोहन करने व पाने की कामना करते हुए अपने कर्तव्य भूलकर दुसरों के अधिकारों पर अतिक्रमण की कोशिश किए चले जाते हैं, बस यहीं पर आकर अधिकार और कर्तव्य का बना हुआ संतुलन टूटने लगता है, परिस्थितियां बिगड़ने लगती है और नतीजा सामने आता है कानून-व्यवस्था खराब होने के रुप में।

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