हाय! हाय! जे कैसा कलजुग! भरी दोपहरिया, बीच बजरिया, लुट गयी गगरिया। दिन दहाड़े डकैती। वो भी हिन्दी चिट्ठाकारों पर।
आजकल बहुत लूटपाट होने लगी है, लोग दूसरे के लेख उठा उठा कर चैंप देते है, पत्रिका के रुप मे छाप देते है। अब इन हिन्दी कैफ़े वाले साहबान को ही लें, सारे हिन्दी चिट्ठाकारों के लेख, बिना पूर्वानुमति के चैंप दिए है। हाँ ईमानदारी तो इतनी दिखायी है कि लेखकों के नाम वही रखे है, अब बदलने का समय नही था, ये इनको ईमानदारी चोरी ही पसन्द है, ये तो हमे नही मालूम। लेकिन हम इत्ता जरुर कहेंगे कि इनको सम्बंधित लेखकों से पूर्वानुमति जरुर लेनी चाहिए थी, भले ही मौखिक रुप से ही। अभी तो ये सीधा सीधा चोरी चपाटी का मामला बनता है।

हमने दरोगा जी से पूछा कि क्या किया जा सकता है, तो वो बोले कि सबसे पहले तो पता लगाओ कि ये श्रीमान कौन है, हमने पता लगाया कि कोई मैथली गुप्ता ( अरे वो महान कवि मैथिली शरण गुप्त नही, वो तो अब नही रहे) दिल्ली मे ईस्ट आफ कैलाश मे पाए जाते है। अब चिट्ठाकारों को इस पर क्या एक्शन लेना है वे सम्बंधित चिट्ठाकार डिसाइड करें, हमारी रचनाएं तो इन्होने छापने लायक समझी नही। खैर! अपनी अपनी लूट की रिपोर्ट यहाँ टिप्पणी मे दर्ज कराएं।
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on बुधवार, जनवरी 31st, 2007 at 5:56 am and is filed under Uncategorized.
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Author: Jitendra Chaudhary (507 Articles)

जन्म से कानपुरी, लेकिन रोटी के लिये मिट्टी से दूर, साफ़्टवेयर बनाते बनाते कब ब्लॉग लिखने लगे, पता ही नही चला। फिर कुछ शरारती तत्वों ने लेखन की तारीफ़ दी, अब झेलो, कानपुरी हूँ, इत्ती जल्दी तो नही रुकने वाला। इंटरनैट के लती। लेखन शैली में श्री के पी सक्सेना जी से प्रेरित। भारतीय राजनेताओ से खासी चिढ,वैसे भी तारीफ़ के लायक तो कोई काम किए नही ये लोग। भारत की सामाजिक एवम राजनैतिक दुर्दशा से व्यथित। इसी व्यथा का ही नतीजा है कि हम ब्लॉगिंग मे कूदे। आजकल कुवैत मे डेरा है, यही पर बसेरा है। अब देखते है कब तक हम इस खूंटे डेरे से बंधे रहते है।
सपनाः हिन्दी इन्टरनेट की आधिकारिक भाषा बने।
पसन्दः राजनीतिक चर्चा, बचपन की यादें।
नापसन्दःनहाने के बाद,पत्नी द्वारा,बाथरूम मे वाइपर लगाने को बाध्य किया जाना
मेरे बारे मे बाकी जानकारी इधर है:
मेरा पन्ना पर टिप्पणी करने वालों के लिए एक तोहफा। आप टिप्पणी करिए और अपने ब्लॉग का पता सही सही भरिए, हम आपके ब्लॉग की आखिरी पोस्ट का लिंक यहाँ दिखा देंगे। इससे आपके ब्लॉग को कुछ और पाठक मिलेंगे। है ना सही चीज? तो फिर देर किस बात की है, शुरु हो जाइए।
लो ब्रेकिंग न्यूज़: एक और डकैती
http://www.lyspick.com
इन लोगों ने चिट्ठाकारों की मेहनत को बड़ी आसानी से भुना लेने का तरीका अपनाया है, किसी से अनुमति लेने की जहमत भी नहीं उठाई। कुछ करना पड़ेगा, भाई।
http://www.lyspick.com/ ke karta dharta hein:
Maithily Saran Gupta HUF (cyril@maithily.com)
Address: A-22 Sector 34, NOIDA – 201301. (UP)
Tel No. 011 – 26486289
http://www.cafehindi.com/ ke karta dharta hein:
Maithily S Gupta
Indian CompuTrade News (psl@nde.vsnl.net.in)
AddressL 263, Sant Nagar, East of Kailash, New Delhi 110065.
Tel No. 11- 26486289
Bachav ka ek tarika to yeh hei ki inko email likhein agar aapko apna content inki site per nahi dikhana hai aur doosra apni Feed mein “Full” ki jagah “Summary” posts publish karein, halanki isse aapke anya pathakon ko asuvidha hogi.
In dodno sites mein ek antar yeh hai ki ek mein summary post kar post ki kadi di gayi hai aur doosre mein puri post “sabhar” ke nam per chaapi gayi hai. Bina anumati liye ye karna galat hai. Aflatoon ji ka kehna hai ki unko mail likh kar permission maangi gayi hai per weh izazat nahi dene waale.
सभी लोगों से निवेदन है कि अपनी पोस्ट की शेयरिंग की पालिसी अपने चिट्ठे पर प्रदर्शित करें। ताकि बाद मे कोई एक्शन लेते समय काम आए।
दूसरा, इस तरह की स्थिति आने पर, सभी लोग सामूहिक रुप से विरोध दर्ज कराएं। सभी अपनी आँखे खुली रखें, और ध्यान दें।
आपलोगों की क्या राय है?
हमलोग पहले से ही महाब्लॉग जैसी परियोजना पर काम कर रहे थे जिसमें चिट्ठाकारों की चुनिंदा पोस्टों को पत्रिका के रूप में प्रकाशित करने की योजना थी। इस संबंध में चिट्ठाकारों के बीच कई दौर की बैठक भी हुई थी। फिर ये लोग कहाँ से टपक पड़े?
ये अनधिकार चेष्टा है, इसकी इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।
लिंक यह रहा – http://prashantmalik.wordpress.com/
मगर मैने सोचा कि कोई हल तो है नहीं तो क्यों हाय-तौबा मचाई जाये, इसलिए चुप रहा।
जीतू जी, मैनें हर लेख में साईट का लिंक एव आभार प्रगट किया है. आपके लेख के लिये भी आभारी हूं.
मुझे आप सबके उत्तर का इन्तजार है.
मैथिली
वैसे भी रचनाओं को वे साभार, कड़ी सहित तथा रचनाकारों के नाम समेत पुनर्प्रकाशित कर रहे हैं – जो संभवतः चोरी की श्रेणी में नहीं आता है. चोरी तब होती है जब हमारे माल को वे अपने फ़ायदे के लिए अपने नाम से इस्तेमाल करें जैसा कि डस्क डायरी में मेरे अंग्रेज़ी चिट्ठे का हो रहा था और अभी भी अन्य दूसरे अंग्रेज़ी चिट्ठों का हो रहा है.
फिर भी, मैथिली गुप्त जी से आग्रह है कि वे किसी भी रचना के पुनः प्रकाशन से पूर्व अनुमति तो ले ही लें. और यदि बगैर अनुमति प्रकाशित करना ही है तो सार छापें, आगे की पूरी रचना पढ़ने हेतु लिंक मूल चिट्ठे का दें.
……………
“सर्वप्रथम नमस्कार एवं अभिनन्दन. मैंने अधिकांश चिट्ठाकारों को ई-मेल पर अनुमति मांगी है. कई बन्धुओं की अनुमति मुझे मिल चुकी है. अनेकों ने मेरे इस प्रयास को सराहा है. मै इस वेबसाईट को बिना किसी व्यावसायिक उद्देश्य के चलाना चाहता हूं. मैंने ढेरों ई-मेल अनुमति के लिये भेजी थीं तब तक मैने इसकी रूप रेखा बना रहा हूं. मेरा उद्देश्य यही है कि यह लेख आम पाठक तक पहुचें.
मुझे आप सबके उत्तर का इन्तजार है”.
मैथिली
…………
अब चिट्ठाकार साथीगण, बताएँ कि क्या करना है, आपलोगों की क्या सलाह है? क्या इन्हें अपना कारोबार करने दें या इन्हें बगैर अनुमति वाले लेख हटाने के लिए कहें?
आपकी उनसे हुई बातचित और मेल से लगता है कि कार्य अनुचित था मगर विचार उचित
उनसे कहें कि वो मूल लेख की बजाय सार छापें और पूरा लेख पढ़ने के लिए पाठक को चिट्ठे पर भेजे
इससे पाठक जो रूचिकर आलेख होगा उसे पढ़ने चिट्ठे पर आएगा और अरूचिकर लगेगा उसे सार पढ़कर ही चल देगा…
http://www.akshargram.com/2007/01/31/586