आओ ढूंढे बिछड़े लोग

कभी आपने सोचा है कि आपने नामाराशी कितने लोग है आपके शहर में, या आपके प्रदेश मे, या आपके देश मे या फिर पूरी दुनिया में। है ना मजेदार विचार। लेकिन भई ऐसे लोगों को कैसे ढूंढे। है तो बहुत बड़ी उलझन। लेकिन जनाब आपकी इस उलझन को सुलझाया है एक साइट पीप्ल डाट काम ने । इसमे आप दुनिया के किसी भी शहर/देश मे रहने वाले बन्दों के बारे मे जान सकते है, बशर्ते वो डाटा पब्लिक डोमेन मे हो, मतलब कि सार्वजनिक हो। अक्सर होता है जी, टेलीफोन डायरेक्टरी का मसाला, याहू पीपल का प्रोफ़ाइल और भी बहुत कुछ। तो शुरु करिए और ढूंढिए अपने बिछड़े लोगों को।

pipl

लेकिन भई सवाल ये उठता है कि ये सब तो आप गूगल मे भी ढूंढ सकते है। जवाब है नही जी, आप ट्राई करके देखिए, फर्क साफ़ दिख जाएगा। इस्तेमाल तो कई हो सकते है जैसे पुराना दोस्त, पुराना प्यार, बिछड़े रिश्तेदार (कौन ढूंढता है?) या पुराने कर्मचारी या फिर और भी कोई। मै तो इसमे अपने पुराने ब्लॉगर्स, हिन्दी चिट्ठाकारी से नदारद लोगों को ढूंढने की कोशिश करता हूँ, तो पहला नाम डालते है “Atul Arora” का । क्या कहा? अरे यार गायब लोगों को ही तो ढूंढेंगे है ना?

आप इन्हे भी पसंद करेंगे

Line Break

Author: Jitendra Chaudhary (507 Articles)

जन्म से कानपुरी, लेकिन रोटी के लिये मिट्टी से दूर, साफ़्टवेयर बनाते बनाते कब ब्लॉग लिखने लगे, पता ही नही चला। फिर कुछ शरारती तत्वों ने लेखन की तारीफ़ दी, अब झेलो, कानपुरी हूँ, इत्ती जल्दी तो नही रुकने वाला। इंटरनैट के लती। लेखन शैली में श्री के पी सक्सेना जी से प्रेरित। भारतीय राजनेताओ से खासी चिढ,वैसे भी तारीफ़ के लायक तो कोई काम किए नही ये लोग। भारत की सामाजिक एवम राजनैतिक दुर्दशा से व्यथित। इसी व्यथा का ही नतीजा है कि हम ब्लॉगिंग मे कूदे। आजकल कुवैत मे डेरा है, यही पर बसेरा है। अब देखते है कब तक हम इस खूंटे डेरे से बंधे रहते है। सपनाः हिन्दी इन्टरनेट की आधिकारिक भाषा बने। पसन्दः राजनीतिक चर्चा, बचपन की यादें। नापसन्दःनहाने के बाद,पत्नी द्वारा,बाथरूम मे वाइपर लगाने को बाध्य किया जाना मेरे बारे मे बाकी जानकारी इधर है:

12 Responses to “आओ ढूंढे बिछड़े लोग”

  1. तो पहला नाम डालते है “Atul Arora” का । क्या कहा? अरे यार गायब लोगों को ही तो ढूंढेंगे है ना

    ये बात तो खूब कही :)

  2. pankaj बेंगाणी on अप्रैल 14th, 2007 at 4:25 pm

    bahut sahi.

    मैने अपना नाम ढुंढा तो मै भूल गया था वो जानकारी मिल गई, बोलो!! :)

    शानदार.

  3. संजय बेंगाणी on अप्रैल 14th, 2007 at 5:24 pm

    जबरदस्त है…

  4. जीतू जी, आपने पहला ही उदाहरण बहुत उपयुक्त दिया!

  5. अरे भई मजा आ गया । कुंभ मेले में इसका इस्तमाल होना चाहिए । थानों में जहां गुमशुदा लोगों की तलाश के पोस्टर होते हैं वहां भी ।

  6. हमारे नाम का क्या ?

  7. अतुल अरोरा on अप्रैल 14th, 2007 at 8:58 pm

    जीतू भईया आप तो सबसे हमेशा ही एक ईमेल की दूरी पर रहते हो फिर इस नाचीज को ढूँढने की जहमत काहे उठा रहे हो भई।

  8. सही काम की चीज़ है…

  9. ढूंढ लिया सबको….. :)

    छिपने की कोशिश बेकार कर दी!!

  10. good hai ….:)

  11. अरे भईया बोत खतरनाक चीज है। मैंने अपना नाम डाला तो ईमेल पते समेत शहर का नाम तक बता दिया। खैर गूगल ग्रुप्स और ब्लॉग सर्च पर जीतू भईया भी पकड़े गए

  12. bahut badhiya!!!! jitu bhai ab ye bata do ki ye sab jugaad milte kidhar se hain?

जरुरी सूचना

मेरा पन्ना पर टिप्पणी करने वालों के लिए एक तोहफा। आप टिप्पणी करिए और अपने ब्लॉग का पता सही सही भरिए, हम आपके ब्लॉग की आखिरी पोस्ट का लिंक यहाँ दिखा देंगे। इससे आपके ब्लॉग को कुछ और पाठक मिलेंगे। है ना सही चीज? तो फिर देर किस बात की है, शुरु हो जाइए।

Leave a Reply

CommentLuv Enabled