वर्जीनिया यूनिवर्सिटी के मृतकों के लिए मौन
Author: jitu9968 (498 Articles)
जन्म से कानपुरी, लेकिन रोटी के लिये मिट्टी से दूर, साफ़्टवेयर बनाते बनाते कब ब्लॉग लिखने लगे, पता ही नही चला। फिर कुछ शरारती तत्वों ने लेखन की तारीफ़ दी, अब झेलो, कानपुरी हूँ, इत्ती जल्दी तो नही रुकने वाला। इंटरनैट के लती। लेखन शैली में श्री के पी सक्सेना जी से प्रेरित। भारतीय राजनेताओ से खासी चिढ,भारत की सामाजिक एवम राजनैतिक दुर्दशा से व्यथित। आजकल कुवैत मे डेरा है, यही पर बसेरा है। सपनाः हिन्दी इन्टरनेट की आधिकारिक भाषा बने। पसन्दः राजनीतिक चर्चा, बचपन की यादें। नापसन्दःनहाने के बाद,पत्नी द्वारा,बाथरूम मे वाइपर लगाने को बाध्य किया जाना मेरे बारे मे बाकी जानकारी इधर है:
साथियों,
जैसा कि आपको पता है अमरीकी विश्वविद्यालय : वर्जीनिया टैक यूनिवर्सिटी मे पिछले दिन एक बंदूकधारी छात्र ने अंधाधुंध फायरिंग करक ३३ लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इसका विस्तृत समाचार आप यहाँ पर देखें। हमारे ब्लॉगर भाइयों ने भी इसका कवरेज किया है। इस कांड मे मृतक लोगों की याद मे सम्पूर्ण (अंग्रेजी) ब्लॉग जगत ३० अप्रैल २००७ (दिन सोमवार) को एक दिन का मौन रख रहा है। इस दिन कोई भी ब्लॉग नही लिखा जाएगा।
Silence can say more than a thousand words.
This day shall unite us all about this unbelievable painful & shocking event and show some respect and love to those who lost their loved ones.
इस बारे मे ज्यादा जानकारी यहाँ देखिए।
इन छात्रों को श्रद्दांजिली देने का यह बेहतर तरीका होगा। क्या आप भी इसमे शामिल होना चाहते है। यदि हाँ तो यहाँ पर इस बारे मे ज्यादा जानकारी है। सभी हिन्दी चिट्ठाकारों से निवेदन है कि इस ब्लॉग मौन मे शामिल हो। कन्धे से कंधा मिलाए।














































..बाकी जो आम सहमति बने..
वर्ज़ीनिया यूनिवर्सिटी के मृतकों के शोक में सोमवार (३० अप्रैल, २००७) को हिन्द-युग्म पर भी कोई पोस्ट नहीं होगी। इसके अतिरिक्त, फिलहाल चिट्ठाकारों के वश में कुछ नहीं है।
हालाँकि ये सच है कि जो हुआ है उसका कितना भी अफ़सोस किया जाए कम लगता है. और ये भी कि मुझे दो रातों से सपने में यह मंज़र दिख रहा है और परेशान कर रहा है.
पर इस तरह के विरोध प्रदर्शन से मेरी सहमति नहीं है. एक तो इसलिये कि इंटरनेट पर मौन प्रदर्शन मुझे थ्योरी में ही अटपटा लगता है. दूसरे इसलिये भी कि ऐसे मौन रखने पर तो साल भर लिखना ही दूभर हो जाएगा. इराक़ में तो लगभग रोज़ इससे ज़्यादा लोग मर रहे हैं. और अगर भारत में ही देखें तो सूनामी और विदर्भ के किसानों की आत्महत्याओं को ये संवेदना क्यों नहीं मिली.
अगर व्यक्तिगत स्तर पर यह निर्णय हो तो उसमें कुछ गलत नहीं है. बस उम्मीद यही है कि सामूहिक मंचों (नारद आदि) पर ऐसा कुछ नहीं किया जाएगा.
ईराक में हर दिन ५०-१०० के बीच मर रहे हैं उनके लिये मौन का क्या?
भई मेरे को जो दिखा, सही समझ मे आया आपके सामने रखा, कोई जरुरी नही है कि आप मेरे विचारों से सहमत हो। आप अपने ब्लॉग पर लिखने ना लिखने के लिए स्वतंत्र है।
बस एक बात ही कहना चाहता था कि मृतकों को श्रद्दांजिली मौन रहकर ही दी जाती है। मेरा पन्ना ३० तारीख को नही लिखा जाएगा, बाकी लोग अपने स्तर पर स्वयंविवेक से निर्णय लें।