विदेशो मे कई जगह इन्टरनैट के ऐसे स्थान है, जहाँ पर आप फ्री मे इन्टरनैट सर्फ़िंग कर सकते है। इसके लिए आपको कुछ भी नही देना होता, बस उनके (कस्टमाइज्ड) ब्राउजर पर आपकी पसन्द के अनुसार विज्ञापन देखने होते है। सर्फ़िंग के लिए अक्सर वर्चुअल कीबोर्ड होता है, जो कम्प्यूटर स्क्रीन मे ही लगा हुआ होता है। आपकी इन्टरनैट सर्फ़िंग की पूरी लागत ये लोग विज्ञापनों से वसूल कर लेते है। ये कान्सेप्ट थोड़ा देखने मे नया है, लेकिन है कारगर। अब भारत मे भी इसकी शुरुवात हो रही है। एक कम्पनी है ओहो… ये लोग भारत मे ओहो स्टेशन के नाम से ढेर सारे इन्टरनैट बूथ लगाने जा रहे है। ये तो एक शुरुवात है, देखते जाइए, कितने लोग इसमे कूदते है। ये सचमुच काफी फायदेमंद सौदा होगा।
इन इन्टरनैट बूथ से आप अपनी इमेल चैक कर सकते है, चैट कर सकते है, टिकटे बुक कर सकते है, बैक के ट्रांसैक्शन (भूल कर भी मत करना) कर सकते है और हाँ ब्लॉग भी पढ सकते है। तो भैया देर किस बात की, बस इन्तज़ार कीजिए इनके ओहो स्टेशन के खुलने का। सचमुच इंडिया बदल रहा है…..
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on मंगलवार, फरवरी 19th, 2008 at 8:20 am and is filed under Uncategorized.
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Author: Jitendra Chaudhary (508 Articles)

जन्म से कानपुरी, लेकिन रोटी के लिये मिट्टी से दूर, साफ़्टवेयर बनाते बनाते कब ब्लॉग लिखने लगे, पता ही नही चला। फिर कुछ शरारती तत्वों ने लेखन की तारीफ़ दी, अब झेलो, कानपुरी हूँ, इत्ती जल्दी तो नही रुकने वाला। इंटरनैट के लती। लेखन शैली में श्री के पी सक्सेना जी से प्रेरित। भारतीय राजनेताओ से खासी चिढ,वैसे भी तारीफ़ के लायक तो कोई काम किए नही ये लोग। भारत की सामाजिक एवम राजनैतिक दुर्दशा से व्यथित। इसी व्यथा का ही नतीजा है कि हम ब्लॉगिंग मे कूदे। आजकल कुवैत मे डेरा है, यही पर बसेरा है। अब देखते है कब तक हम इस खूंटे डेरे से बंधे रहते है।
सपनाः हिन्दी इन्टरनेट की आधिकारिक भाषा बने।
पसन्दः राजनीतिक चर्चा, बचपन की यादें।
नापसन्दःनहाने के बाद,पत्नी द्वारा,बाथरूम मे वाइपर लगाने को बाध्य किया जाना
मेरे बारे मे बाकी जानकारी इधर है:
मेरा पन्ना पर टिप्पणी करने वालों के लिए एक तोहफा। आप टिप्पणी करिए और अपने ब्लॉग का पता सही सही भरिए, हम आपके ब्लॉग की आखिरी पोस्ट का लिंक यहाँ दिखा देंगे। इससे आपके ब्लॉग को कुछ और पाठक मिलेंगे। है ना सही चीज? तो फिर देर किस बात की है, शुरु हो जाइए।
यहाँ हमने लिखा था:
http://www.tarakash.com/sanjay-bengani/free-net-surfing.html
इसलिए मैं नहीं समझता कि यह मॉडल कुछ खास सफ़लता पाएगा, अपने लोगों को विज्ञापनों से चिढ़ है, फोकट के टीवी चैनलों में भी लोग विज्ञापन देखना पसंद नहीं करते और झट से चैनल बदल देते हैं।