साबुन की कहानी, मायावती की जुबानी

आप कहेंगे कि ऐसा टिंची का टाइटिल काहे दिया, अपनी बहिन(?) मायावती को साबुनबाजी का ठेकेदार बना दिया। ठेका हमने थोड़े ही दिया है, इन्होने खुद ही लिया है। आप खुद ही देखिए, बोलती है राहुल बाबा फलां साबुन से नहाते है, जब वे दलितों के घर से लौटते है। मिर्जा बीच मे टपक पड़े, पूछते है, इन्होने किस साबुन का नाम लिया? सिंथाल या लक्स या फिर डव…बताओ तो सीबीआई को खबर कर दें……खामोश मिर्जा, अभी ताज कॉरीडोर का मसला सलटा नही, तुम फिर से पचड़े कराना चाहते हो। इस बार बहिन जी सजग है, उन्होने किसी भी साबुन कम्पनी का नाम नही लिया। बस इत्ता बोली कि राहुल बाबा साबुन से नहाते है। अभी कांग्रेस की तरफ़ से कोई स्पष्टीकरण/खंडन नही आया, अगर आया भी तो कुछ ऐसा होगा। कांग्रेस प्रवक्ता(पचौरी) (ओह! वो तो अब प्रवक्ता रहे नही, खैर बहुत सारे और है) टीवी पर प्रकट होंगे और बोलेंगे कि ये राहुल बाबा पर सरासर इल्जाम है, उनको बदनाम करने की साजिश है, सच तो ये है कि राहुल बाबा, नहाते ही नही। पिछले चुनावों के दौरों में बिजी थे, जैसे ही लौटे, फिर कॉंग्रेस की खोज सॉरी भारत-खोज यात्रा पर निकल लिए, नहाने के लिए टाइम कहाँ से जुटाएं।

वैसे यार! अगर मुझसे पूछा जाए तो हम तो बस इत्ता ही कहेंगे कि नहाने वहाने की बातें करना बेमानी है। पता नही कैसे लोग महीना महीना भर नही नहाते, यहाँ तो 28वे/29वें दिन ही खुजली होना शुरु हो जाती है। यदि आप नहाने के बारे मे हमारे विचारों को विस्तार से जानना चाहते है तो हमारे स्नान महत्ता वाले लेख को पढा जाए। खैर नहाना या ना नहाना राहुल बाबा की प्रोबलम है, हमे क्या। वैसे बहिन जी, राहुल बाबा को यदि नहाना भी होगा तो किसी ऐरे गैरे साबुन से थोड़े ही नहाएंगे, वो तो इम्पोर्टेड शॉवर जैल से नहाएंगे। हम तो कहेंगे कि हमारे ताऊ की फलां कम्पनी का डेओडेअरेंट लगाओ और निकल लो, अगली खोज-यात्रा पर (यहाँ पर नोट किया जाए कि हमने ताऊ से विज्ञापन देने के पैसे मांगे थे, उन्होने हड़काते/जुतियाते हुए, मना कर दिया, इसलिए हम नाम की जीम गए, और फलां लिख दिया। हमने पहले ही बता दिया, ताकि सनद रहे और वक्त जरुरत काम आए)

बहन मायावती सिर्फ़ साबुन-तेल की ही बाते नही कर रही, उन्होने दारु पर भी पाबंदी लगा दी है। बोल रही है कि दलित बहुल के क्षेत्रों मे दारु नही बिकेगी। ना बिके हमारी बला से, वैसे भी सस्ता दारु पिला पिला कर, मुलायम सरकार ने सबको पंगु कर दिया था। लेकिन इनके इस फैसले से कुछ दलित भी नाराज है, बोलते है, दारु नही पिएंगे तो काम कैसे करेंगे। अब बहिन जी बहुत टेंशनिया गयी है, अब देखो, एक अच्छे फैसले पर भी लोग अंगुलियां उठा रहे है। क्या जमाना आ गया है।

जमाना तो बहुत ही खराब आ गया है, ये हम नही मियां मुशर्रफ़ कह रहे है। जहाँ पिछले कुछ महीनो तक पूरे पाकिस्तान मे इनकी ही तूती बोलती थी, अब नयी सरकार ने इनको पूरी तरह से खामोश करा दिया है। इनके सहयोगियों की एक एक करके छुट्टी की जा रही और इनके पर कतरने की पूरी तैयारी की जा रही है। परेशानी यहाँ तक बढ गयी है कि मुशर्रफ़ के तरफ़दारी करने वाले की भी जूतो से पिटाई कर दी गयी। पिछले दिनो की ही बात है कि सिंध प्रांत की असैंबली मे मुशर्रफ़ के एक सहयोगी (पूर्व मुख्यमंत्री अबरार गुलाम रहीम) की जूतों से पिटाई की गयी। ऊपर से तुर्रा ये कि इसको टीवी पर पूरी दुनिया को दिखाया गया। लेकिन पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने इससे पल्ला झाड़ते हुए कहा कि इस हादसे(?) मे हमारा कोई हाथ नही। सही कह रहे है, गलती तो पैरों की थी, पैर ही जूतियों पर कंट्रोल नही रख पाए और जूतियां पैरो से निकलकर बेचारे अबरार रहीम पर बरस पड़ी। बाद मे रहीम मियां प्रेस के सामने दुखड़ा रोते-गाते पाए गए। लेकिन भाई अब क्या हो सकता है, जो हो गया सो हो गया, अब आगे से हैलमेट के साथ असैंबली मे आइए।

अकेले मुशर्रफ़ ही परेशान नही है, चीन भी परेशान है। काहे? अरे यार! वही ओलम्पिक मशाल को लेकर। ब्रिटेन और फ्रांस मे बवाल हो गया, धरने प्रदर्शन हो रहे है। यूरोपीय यूनियन तो ओलम्पिक के उदघाटन समारोह का बहिष्कार करने तक के बारे मे सोच रही है। इधर दलाई लामा भी परेशान है, इनके अनुयायी उनकी बात ही नही मानते। कित्ता भी दलाई लामा बोले कि विरोध मत करो, शांति बनाए रखो, लेकिन कोई नही सुनता। बताओ, बेचारे बुजुर्ग आदमी, ये कहाँ जाएं?

खैर दलाई लामा तो बुजुर्ग ठहरे, अपने अमर सिंह तो माशा-अल्लाह अभी जवान है। अच्छे खासे हैंडसम है, हिरोइनो के साथ पार्टियों मे जाते है, सारे इन्सानो वाले गुण है। लेकिन नही राज ठाकरे की मनसे (महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना) इनको इंसान नही मानती, बोलती है कि ये राक्षस है। अब आप ही बताओं कि अमर सिंह कंही से राक्षस दिखते है का? बेचारे अमर सिंह कहाँ जाए, यूपी मे मायावती, महाराष्ट्र मे मनसे, दिल्ली मे कांग्रेस, बेचारे जाए जो जाएं कहाँ।

आप ही कुछ सुझाइए, इत्ते परेशान लोगों को कोई रास्ता।

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8 Responses to “साबुन की कहानी, मायावती की जुबानी”

  1. Quite Interesting !

  2. सारे परेशान लोग नेट पर आये और ब्लॉग लिखें…सहायता के लिए जितेन्द्र चौधरी को मेल करें.

  3. अरे दफ़ा करो दोनो को कया कोई ओर काम नही इन नेता के बारे बात करने के ्सिवा, कोई किसी से भी नहाये या मत नहाये हमे कया,भाड मे जाये

  4. राहुल बाबा नहाते हैं? वो भी दलितों से मिलने के बाद? हमाम में नहाते हैं? लेकिन वहाँ तो सब……फिर ‘उन्हें’ पता कैसे चला? अच्छा, ताज कॉरिडोर के सामने जमुना में नहा रहे थे? लेकिन नहाने से धुल जायेगा? …अरे रे रे, ग़लत मत समझिए, मैं पापों की बात कर रहा हूँ.

    अमर सिंह ‘मन से’ बच रहे हैं? डरते होंगे..नहीं? वो कहते हैं न कि ‘जग से चाहे भाग ले प्राणी, ‘मन से’ भाग न पाये…तोरा मन दर्पण…हाँ वही..इसी टाइप है कुछ.

    बताईये, ये चीन वाले भी परेशान होते हैं. वो भी ‘मशाल’ से…परेशान रहेंगे ही. ये मशाल जो है वो आज़ादी का परिचायक टाइप है कुछ. ..लेकिन इन्हें तो मशाल बुझाने की आदत है. फिर उसके बुझने के डर से क्यों परेशान हैं? इसी को कहते हैं बदलता समय.

  5. हम तो पूरी पोस्ट पढ़ गये कि आप कोई पोलिटिकली करेक्ट साबुन का ब्राण्ड बतायेंगे; जिसे हम लगायें चाहे न लगायें, उसके आठ दस शेयर खरीदलें। पर यहां तो मायावती और मायूसी ही रही!

  6. पता नही कैसे लोग महीना महीना भर नही नहाते, यहाँ तो 28वे/29वें दिन ही खुजली होना शुरु हो जाती है।
    हमारा भी लगभग यही हाल है, हम आपसे ज्यादा सहनशील हैं, तीसवें दिन तक हमें कोई खास तकलीफ नहीं होती। 🙂

  7. बहुत हे majidar लिख hai

  8. बढ़िया गप्पबाजी 🙂
    मजा आ गया..