विश्व रेडियो दिवस पर विशेष

आज यानि 13 फरवरी 2012 को युनेस्को द्वारा पहली बार विश्व रेडियो दिवस मनाया जा रहा है। रेडियो से हमारी भी ढेर सारी पुरानी यादें जुड़ी है, लीजिये पेश है, मेरी कुछ पुरानी यादें, चलिये इसी बहाने हम रेडियो को याद कर लेते हैं।

पुराने जमाने मे जिन लोगों के पास रेडियो हुआ करता था, वो अपने घर के बाहर एक जाली वाला तार टाँगा करते थे, अब ये बैटर रिसेप्शन के लिये था या फिर दिखावा, मेरे को नही पता. लेकिन जिनके घर की बालकनी या आंगन मे जाली वाला तार टंगा रहता था, उनको लोग बड़ा सम्मान देते थे और उनकी तरफ बहुत इज्जत की निगाह से देखा करते थे. लोग बाग भी अपने रेडियो का दिखावा करने मे पीछे कहाँ रहते थे. मुझे याद है हमारे घर मे भी एक रेडियो हुआ करता था, जिस पर सिर्फ और सिर्फ दादाजी का हक हुआ करता था. मजाल है जो कोई दूसरा हाथ भी लगा दे, दादाजी अपनी छड़ी से कुटाई कर दिया करते थे. अक्सर दादा दादी मे रेडियो को लेकर बवाल हुआ करता था. दादाजी अपने रेडियो का दिखावा करने के लिये अक्सर लोगो को घर बुलाते,पहले चाय नाश्ता और फिर खाना तक खिलवाते थे. लोग बाग भी समाचार सुनने का बहाना बनाकर आते, चाय नाश्ता करते, भले ही रेडियों मे शास्त्रीय गायन या कर्नाटक संगीत सभा चल रही होती, बाकायदा डटे रहते और खाना डकारकर ही जाते….मुफ्त का खाना कौन छोड़ता है भला? खैर जमाना बदला, रेडियो गया, ट्रान्जिस्टर आये. अब लोग बाग अपने साथ ट्रान्जिस्टर लेकर चलने लगे, जिसको देखो कान से लगाकर सुनता था, क्या सुनता था? ये तो उसको भी नही पता. लोगबाग दिशा मैदान को जाते तो ट्रान्जिस्टर ले जाना ना भूलते, लता के गीत हों या रफी के नगमे या फिर इन्दु वाही के समाचार, बाकायदा पूरा पूरा सुनते. घरों मे पंगे बढ गये थे, लोगबाग लैट्रिन मे भी ट्रान्जिस्टर ले जाते और घन्टों वंही बैठे रहते. हमारे यहाँ भी काफी पंगे होते, लेकिन मसला दूसरा था. पिताजी एक ट्रांजिस्टर ले आये थे और उससे दादाजी के रेडियों की पूछ कम हो गयी थी. दादाजी रोज़ाना ट्रांजिस्टर की कमिया गिनाते. अक्सर ट्रांजिस्टर को अकेला पाकर अपनी छड़ी से धुनाई करते. अब उसका क्या बिगड़ने वाला था. खैर वो जमाना भी गया. दादाजी भी जन्नतनशीं हुए और रेडियों भी अपनी कब्रगाह मे चला गया. अब जमाना आया टेलीविजन का.


Radio aur TV

बात उन दिनो की है, जब टेलीविजन भी नही आया था.मै गर्मियों की छुट्टी मे अपनी बुआ के यहाँ उल्हास नगर(मुम्बई के पास) गया था और पहली बार टेलीविजन को देखा. बहुत आश्चर्य चकित हो गया कि कैसे एक बक्से के अन्दर बैठे लोग हमसे बात करते है.हमारे बुआ के लड़कों ने भी हमारी नासमझी का फायदा उठाया और ना जाने क्या क्या गप्पे हाँकी, और डेली डेली हमको गप्पों का नया डोज पिलाते रहे. खैर हम एक अच्छे बच्चे की तरह से सारी गप्पे झेलते रहे और अपने दिमाग मे सहेजते रहे, क्यो? अरे भाई कानपुर जाकर सारी गप्पों मे नमक मिर्च लगाकर अपने दोस्तों को जो सुनाना था. खैर जनाब! हम कानपुर पहुँचे और अपने दोस्तो यारों को कहानी सुनाई, सुक्खी तो बिखर गया, बोला ये तो हो ही नही सकता कि रोजाना कोई छत पर लगे एक डन्डे मे लगे छेदों मे से आपके घर मे घुस आये और एक बक्से मे बैठकर आपसे बाते करने लगे. धीरू और दूसरों ने भी हाँ मे हाँ मिलाई. लेकिन हम देख चुके थे, इसलिये टस से मस ना हुए, काफी झगड़ा हुआ,लड़ाईयाँ हुई, हम लोग गुटों मे बँटे, फिर भी लोग मानने को तैयार ही नही हुए. हमने भी समझाना छोड़ दिया और सबकुछ वक्त पर छोड़ दिया गया. धीरे धीरे समय बदला और टीवी ने पाँव पसारे. लखनऊ दूरदर्शन केन्द्र बना. मोहल्ले मे पहला टीवी हमारे घर पर लगा, मोहल्ले के लड़कों ने टीवी के मसले पर हमारी सारी गप्पों को तवज्जो देनी शुरु कर दी थी.

अब लोगों की बालकनी से जाली वाली तारे हटनी लगी और उनकी जगह ली छतों पर बड़े बड़े टेलीविजन के एन्टीना ने. फिर भी मोहल्ले मे इक्का दुक्का एन्टीना ही दिखते थे. हम लोग छत पर जाकर इन्टिना गिनने का खेल खेलते. लोगो का रूतबा एन्टिना से जाना जाता, जिसका एन्टीना ज्यादा ऊँचा, उसकी उतनी ज्यादा हैंकड़ी. वर्माजी का सारा टाइम तो छत पर ये देखने मे लग जाता था कि उनका एन्टीना बगल वाले शर्मा जी के एन्टीना से नीचा ना रहे. कई बार तो इस चक्कर मे ही वर्माजी एन्टीना समेत छत से टपके थे. हम लोगो को पतंग उड़ाने मे दिक्कतो का सामना करना पड़ता था, अपनी छत से पतंग उड़ सके तो शर्मा जी के एन्टिने से अटकती, वहाँ से बचो तो वर्मा जी के एन्टिने मे पतंग अटक जाती थी, ना जाने कितनी पतंगे शहीद हुई, अब आमिर खान को स्टोरी सुनाये तो वो शायद पिक्चर बना दे, इस पर. कुल मिलाकर वानर सेना को परेशानी आती थी.

अब लोगों का लाइफस्टाइल बदल रहा था. अब लोगो की रविवार की शामें घर के अन्दर ही बीता करती..क्यों? अरे भई सन्डे को फीचर फिल्म जो आती थी. हमारे टीवी की कहानी भी सुन लीजिये…..हमारे घर भी टीवी का पदार्पण हुआ, टीवी का स्थापन किया गया,बाकायदा पूजा पाठ और नारियल तक फोड़ा गया. छोटे बच्चों जिसमे हम भी शामिल थे, को बाकायदा ताकीद की गयी कि टेलीविजन के आसपास भी ना फटकें, वरना टांगे तोड़कर दुछत्ती(जिस सज्जन को दुछ्त्ती का मतलब ना समझ आये वो फुरसतिया जी से सवाल पूछे ) पर रख दी जायेंगी. टेलीविजन और उसमे आने वाले प्रोग्रामों के खिलाफ बोलना, बेअदबी और बदतमीजी समझी जाती थी. मेरा चचेरा भाई काफी एडवेन्चरस था, सो उसने टेलीविजन के बटनो से छेड़छाड़ की, जिससे चैनल का रिसेप्शन खराब हुआ, टीवी वाले इन्जीनियर अंकल को बुलाना पड़ा, क्योंकि टीवी के बटन वगैरहा छेड़कर चाचाजी कोई रिस्क नही लेना चाहते थे, खैर अंकल आये, दो मिनट का काम दो घन्टे मे किया, जिसमे से एक घन्टा अन्ठावन मिनट तो ये समझाने मे लगा दिये कि टीवी कोई मामूली चीज नही है, छेड़छाड़ मत किया करे, इसबीच दो चार बार चाय नाश्ता डकार गये सो अलग.चाचाजी ने टीवी मे छेड़खानी करने वाले की खोज के लिये एक कमेटी बनाई, कमेटी को विश्वस्त सूत्रों(यानि मै)से पता चला कि चचेरे भाई ने ये नामाकूल हरकत की थी और नतीजतन चचेरे भाई की बहुत जबरदस्त धुनाई हुए, सच पूछो तो दिल को बहुत सकुन मिला, क्योंकि हमेशा उसके पंगो की वजह से खांमखा मै ही पिटता रहता था.ये एक सबक था, हम सबके लिये उसके बाद से हम लोग टेलीविजन से कट लिये,ठीक वैसे जैसे स्कूल मे दिये होमवर्क से कटे हुए थे

अब चाचाजी की पूरी की पूरी शामें टेलीविजन के सामने निकलने लगी, चाहे चौपाल हो या कामगार सभा, चाचाजी सब कुछ देखते और टेलीविजन तभी बन्द होता जब रात्रि विचार बिन्दु का वक्त आता. चाचाजी भारी मन से टीवी बन्द करते, टीवी का शटर बन्द करते,उस पर कपड़ा चढाते……और उसके बाद ही डिनर करते और इस बीच चाची भिनभिनाती रहती, लेकिन कुछ कह नही पाती, क्योंकि चाचाजी टेलीविजन के खिलाफ कुछ भी सुनना पसन्द नही करते थे.अब चाचाजी का एक नया शगल शुरु हो गया था, दादाजी की तरह लोगों को पकड़ पकड़ लाना और टेलीविजन के प्रोग्राम दिखाना, आफ कोर्स चाय नाश्ता तो पैकेज डील मे शामिल था. हाँ टेलीविजन की आवाज कम ज्यादा करने की जिम्मेदार अभी भी चाचाजी पर ही थी और रिमोट कन्ट्रोल? ये किस चिड़िया का नाम है? उस जमाने मे रिमोट कन्ट्रोल नही हुआ करता था.लोगबाग भी आते, टीवी की तारीफ करते,चाय नाश्ता डकारते और निकल लेते.

इसबीच बदकिस्मती से लखनऊ दूरदर्शन वालों ने बच्चों के लिये भी एक प्रोग्राम देना शुरु कर दिया, नतीजतन, मोहल्ले के सारे बच्चों को पकड़ा जाता, गिनती होती(प्रोग्राम के शुरु मे और आखिरी मे दोनो बार)और टेलीविजन के आगे बिठा दिया जाता और कहा जाता कि चुपचाप बैठकर टेलीविजन देखो. अब देखे तो क्या देखें कुछ पल्ले पड़ता तब ना? दूरदर्शन वाले भी पता नही कहाँ कहाँ से पकड़ पकड़ कर लोगो से टेलीविजन प्रोग्राम करवाते थे, जो काफी समय तो अपनी तारीफ मे बिताते, कुछ बचता तो बच्चों वही पकी पकाई घिसी पिटी कविताये वगैरहा पढते, हम लोग झेले भी तो कैसे? लेकिन चाचाजी के डन्डे का डर था, हम लोग चुपचाप टेलीविजन देखते, ये बात और थी कि सबसे आगे बैठेने वाले धीरू को चिकोटी काटते रहते, जिससे वो चिल्लाता और चाचाजी के डन्डे का शिकार होता. धीरे धीरे धीरू ने चिकोटी पर रियेक्शन करना बन्द कर दिया, क्यों? अमां यार! चिकोटी का दर्द, डन्डे के दर्द से काफी कम होता है, इसलिये. रविवार की शाम, घर की महिलाओं के लिये खासी परेशानी भरी होती, क्योंकि रविवार को फीचर फिल्म आती और चाचाजी पूरे मोहल्ले पहले से ही निमंत्रण दे आते, लगे हाथो आने वाली फिल्म की तारीफ करके लोगो मे जिज्ञासा भर आते. घर लौटते समय टीवी देखने आने वाले लोगो के लिये लइया,चना चबैला और मुंगफली का इन्तजाम करना ना भूलते.

तय समय पर सभी लोग लइया चना और मुंगफली लेकर फिल्म देखते, फिल्म के दृश्यानुसार हँसते रोते. हँसते समय ज्यादा मुँगफली खाते, और रोते समय चादरों को खराब करते.मुझे याद है बसन्तु की अम्मा अपने बच्चे को सुस्सु और पाटी भी टेलीविजन के सामने कराई थी, अब टेलीविजन के लिये ये दिन भी देखना पड़ेगा, किसने सोचा था…. कुछ लोग फिल्म खत्म होने के बाद भी डिनर खाने के लिये लटके रहते, बहाना होता, समाचार देखने का. घर की महिलायें, मनाती कि हफ्ते मे से रविवार को निकाल दिया जाना चाहिये, क्यों? अरे यार! बाहर के लोग फिल्म देखे और घर की महिलाये चाय नाश्ता बनाती रहें ये कहाँ का इन्साफ है? फिल्म के बाद घर कूड़ाघर बन जाता. कैसे? अमां यार, मुंगफली के छिलके लोग अपने साथ ले जाते क्या? लेकिन दूरदर्शन वालो को इसका कहाँ इल्म था, उन्होने तो हफ्ते मे दो दो फिल्मे देनी शुरु कर दी, वृहस्पतिवार का चित्रहार और सोमवार का मद्रासी और अन्यभाषा के गानों चित्रमाला सो अलग. अब टीवी देखने आने वाले लोगो की डिमान्ड भी बढ रही थी, लोग दुहाई देते, वर्मा जी तो टीवी दिखाने के लिये बुलाते है और नाश्ते मे हलवा भी खिलाते है. चाचाजी की भृकुटि तन जाती थी, नतीजतन भाग भाग कर जलेबी वगैरहा हमे लानी पड़ती थी. अब कब तक झेलते ये सब?

अब पानी सर से ऊपर गुजर रहा था, सो चाचाजी को छोड़कर सारे लोगों ने प्लानिंग बनाई की किसी तरह से टीवी को खराब कर दिया जाय, टीवी वाले अंकल को सैट किया गया, उन्होने झूठी मूठी बताया कि एक स्पेयर पार्ट खराब हो गया है, आने मे एक महीना लगेगा…… तब कंही जाकर एक महीने के लिये टीवी खराब रहा था……सारे परिवार ने, सिवाय चाचाजी को छोड़कर, चैन की सांस ली. इसबीच चाचाजी क्या करते रहे? अरे यार! शहर भर के टेलीविजन की दुकानों मे स्पेयर पार्ट लिये लिये ढूंढते रहे, अब उनको स्पेयर पार्ट तो तब ही मिलता ना जब वो टेलीविजन का होता, हम लोगो ने उनको पुराने खराब रेडियों का स्पेयर पार्ट टिकाया था.

धीरे धीरे वो जमाना भी बीता. अब जमाना आया वीडियो का…………..इसकी कहानी फिर कभी…अभी के लिये सिर्फ इतना ही, आप भी अपने संस्मरण लिखना मत भूलियेगा.

कुन फाया, कुन : एक रूहानी अहसास

मुझे सूफी संगीत वैसे भी बहुत अच्छा लगता है। चाहे हो फिल्मों से हो या फिर गैर फिल्मी। आजकल एक गीत मेरे जहन में लगातार घूम रहा है, इसके बिना दिन अधूरा अधूरा सा लगता है। गीत है, कुन फाया कुन, फिल्म रॉक-स्टार से। इस गीत की खासियत ये है कि इसको सुनते ही आपको एक रूहानी अहसास होता है। आप सुनते सुनते इस गीत में डूब जाते हो और एक दूसरी रूहानी दुनिया में पहुँच जाते हो। मेरे साथ तो ये अक्सर होता है, आप भी कोशिश करिए, हो सकता है आप पर भी ये गीत वैसे ही असर करे। लीजिये पेश है इस गीत के बोल…

या निजाममुद्दीन औलिया, या निजाममुद्दीन सलका
कदम बढ़ा ले, हदों को मिटा ले
आजा खालीपन में पी का घर तेरा,
तेरे बिन खाली आजा, खालीपन में
तेरे बिन खाली आजा, खालीपन में

(आलाप…. ) Oooooo….Oooooo…..

रंगरेजा
रंगरेजा
रंगरेजा
हो रंगरेजा….

कुन फाया, कुन
कुन फाया, कुन
फाया कुन,
फाया कुन, फाया कुन, ,फाया कुन,

कुन फाया, कुन
कुन फाया, कुन
फाया कुन,
फाया कुन, फाया कुन, ,फाया कुन,

जब कंही पे कुछ नहीं
भी नहीं था,
वही था, वही था
वही था, वही था

जब कंही पे कुछ नहीं
भी नहीं था,
वही था, वही था
वही था, वही था

वोह जो मुझ में समाया
वोह जो तुझ में समाया
मौला वही वही माया

वोह जो मुझ में समाया
वोह जो तुझ में समाया
मौला वही वही माया

कुन फाया, कुन
कुन फाया, कुन

सदकउल्लाह अल्लीउम अज़ीम

रंगरेजा रंग मेरा तन मेरा मन,
ले ले रंगाई चाहे तन चाहे मन,
रंगरेजा रंग मेरा तन मेरा मन
ले ले रंगाई चाहे तन चाहे मन,

सजरा सवेरा मेरा तन बरसे
कजरा अंधेरा तेरी जलती लौ

सजरा सवेरा मेरा तन बरसे
कजरा अंधेरा तेरी जलती लौ
कटरा मिले तो तेरे दर पर से।
ओ मौला….
मौला…मौला….

कुन फाया, कुन
कुन फाया, कुन
कुन फाया, कुन
कुन फाया, कुन

कुन फाया, कुन
कुन फाया, कुन
फाया कुन,
फाया कुन, फाया कुन, ,फाया कुन,

कुन फाया, कुन
कुन फाया, कुन
फाया कुन,
फाया कुन, फाया कुन, ,फाया कुन,

जब कंही पे कुछ नहीं
भी नहीं था,
वही था, वही था
वही था, वही था

जब कंही पे कुछ नहीं
भी नहीं था,
वही था, वही था
वही था, वही था

कुन फाया, कुन
कुन फाया, कुन

सदकउल्लाह अल्लीउम अज़ीम
सदक रसुलहम नबी यूनकरीम

सलल्लाहु अलाही वसललम, सलल्लाहु अलाही वसललम,

ओ मुझपे करम सरकार तेरा,
अरज तुझे, करदे मुझे, मुझसे ही रिहा,
अब मुझको भी हो, दीदार मेरा
करदे मुझे, मुझसे ही रिहा
मुझसे ही रिहा……….

मन के मेरे ये भरम,
कुछ मेरे ये करम,
लेके चला है कहाँ,
मैं तो जानू ही ना,

तू ही मुझ में समाया,
कहाँ लेके मुझे आया,
मैं हूँ तुझ में समाया
तेरे पीछे चला आया,
तेरे ही मैं एक साया
तूने मुझको बनाया
मैं तो जग को ना भाया
तूने गले से लगाया
अब तू ही है खुदाया
सच तू ही है, खुदाया

कुन फाया, कुन
कुन फाया, कुन
फाया कुन,
फाया कुन, फाया कुन, ,फाया कुन,

कुन फाया, कुन
कुन फाया, कुन
फाया कुन,
फाया कुन, फाया कुन, ,फाया कुन,

जब कंही पे कुछ नहीं
भी नहीं था,
वही था, वही था
वही था, वही था

जब कंही पे कुछ नहीं
भी नहीं था,
वही था, वही था
वही था, वही था

कुन फाया, कुन
कुन फाया, कुन

सदकउल्लाह अल्लीउम अज़ीम
सदक रसुलहम नबी यूनकरीम
सलल्लाहु अलाही वसललम, सलल्लाहु अलाही वसललम,

Movie :Rockstar
Music Director :A. R. Rahman
Singer(s) :A. R. Rahman, Javed Ali, Mohit Chauhan
Lyricists :Irshad Kamil

इस गीत को आप यहाँ पर सुन सकते है, और यूट्यूब पर इसका वीडियो भी उपलब्ध है।

अपने एण्ड्रोइड फोन पर हिन्दी चलाएं

अभी पिछले दिनो मैंने अपना फोन बदला था, सैमसंग गलक्सी एस से सैमसंग गलक्सी एस2, हिन्दी का सपोर्ट न पिछले एण्ड्रोइड फोन मे था न इसमे। बहुत सारे जतन करके देखे, लेकिन कोई तरीका काम नहीं आया। सारे तरीको में आपको अपने फोन को रूट करना होता था, जिसके कारण आपकी वारंटी खतम होने का डर था, इसलिए सारे तरीके वहाँ पर जाकर रुक जाते थे। आज थोड़ा समय था, इसलिए मैंने सोचा चलो कुछ जुगाड़ ट्राई करते हैं।

सबसे पहले तो आपको आवश्यक एप्लिकेशन के बारे में बता दें।

(ये सारे एप्लिकेशन आपको एंडरोइड मार्केट में फ्री में उपलब्ध हैं।)

 

 

 

From MeraPannaPhoto
  1. सबसे पहले तो आप हिंदीखोज वाला एप्लिकेशन लगा दीजिये, जिसके लगाने से आपके मोबाइल में मंगल फॉन्ट आ जाएगा।
  2. उसके बाद आप गो-कीबोर्ड और गो-कीबोर्ड हिन्दी स्थापित कर दीजिये।
  3. गो-कीबोर्ड की सेटिंग में जकर, हिन्दी को इनेबल कर दीजिये। यह आपके लिए एक शब्दकोश भी डाउन-लोड कर देगा।
  4. अब बारी आती है, fontomizer SP की, इसको स्थापित करिए, ये आपके लिए हिन्दी फॉन्ट अक्षर टीटीएफ़ स्थापित कर देगा।
  5. अब मोबाइल की सेटिंग में जाकर अक्षर फॉन्ट को डिफ़ाल्ट फॉन्ट कर दीजिये। इस से मोबाइल पर हिन्दी दिखने लगेगी।

एसएमएस के लिए आपको Go SMS Pro स्थापित करना होगा, सेटिंग में जाकर Scan Font Package करिए, फिर हिन्दी खोज को सिलैक्ट करके मंगल फॉन्ट को लगा दीजिये। ये आपको दो जगह पर करना होगा, बस फिर अपनी सेटिंग एनेबिल करिए और हिन्दी लिखिए/पढ़िये। बिना किसी दिक्कत के।

समस्या : अभी भी एक समस्या है, वो है, हिन्दी में मात्रा का सही नहीं दिखाना, कुछ शब्दो में हिन्दी की मात्रा सही से नहीं दिखती, जहां भी आधे शब्द है, अथवा ई की मात्रा है, वहाँ पर दिक्कत है, ये दिक्कत गूगल की तरफ से है, उसमे गूगल बाबा ही कुछ कर सकते है, लेकिन फिर भी  ना होने से कुछ होना तो भला है, है कि नहीं?

विस्तृत जानकारी स्क्रीनशॉट के साथ जल्द मेरे जुगाड़ी ब्लॉग पर उपलब्ध है।

दशहरा और अतीत की यादें

आज शुकुल गूगल चैट पर प्रकट हुए और आदेश किया की भई कल दशहरा है, तुमने कुछ लिखा भी है कि नहीं, हम बोले यार नून तेल लकड़ी से फुर्सत मिले तब तो दशहरे का सोचें, फिर विदेश मे ईद दशहरा दिवाली सब एक दिन जैसे ही दिखते हैं। कम से कम कुवैत मे तो ऐसा ही है। यहाँ पर सभी त्योहार अक्सर सप्ताहांत यानि शुक्रवार और शनिवार को ही मनाए जाते जाते है। चाहे वो त्योहार हो या जन्मदिन, अब बंदा पैदा हो मंगलवार को लेकिन नहीं जी, हम तो उसका जन्मदिन शुक्रवार को ही मनाएंगे। अब क्या करें, यहाँ के हिसाब से ही चलना है। खैर ये सब तो चलता ही रहेगा। तो भैया पाठकों कि बेहद मांग पर पेश हैं दशहरे पर विशेष मेरे दो पुराने लेख :

इन दोनों लेखो को लिखकर जितना मजा  हमे आया था उतना ही मजा हमारे पाठकों को पढ़कर आया। विशेषकर हमारे आप्रवासी मित्रो को, जो बेचारे देसी त्योहारों के दिन भी ऑफिस में बैठकर मेरे लेख पढ़कर ही त्योहार मना लेते हैं। ये दोनों पोस्ट मैंने ब्लॉग्स्पॉट पर लिखी थी, इसलिए टिप्पणियाँ आपको यहाँ पर नहीं मिलेंगी, फिर भी अगर आप दोबारा पढ़ रहे हैं तो टिप्पणी करना मत भूलिएगा। जाते जाते आपको नवरात्रि, दुर्गापूजा और दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएँ।

चलते चलते : दुर्गापूजा पर एक चुटकुला याद आ गया, मुलाहिजा फरमाएँ :

हमारे शादीशुदा एक मित्र अक्सर कहा करते हैं “मै शादी के पहले भी शेर था अब भी हूँ।
हमने बोला कि ये तो असंभव है, उन्होने स्पष्ट किया :
“मै शादी के पहले भी शेर था और अब भी हूँ , अलबत्ता अब दुर्गा माता शेर के ऊपर बैठी हुई हैं।”
(उनकी पत्नी का नाम दुर्गा है)

 

 


आपका कैरियर और आपकी पसंद?

आइये कुछ ऐसी चर्चा करते हैं जिनका संबंध हमारे निजी जीवन से है। अक्सर हम अपने बच्चों को शिक्षा देते है की वो अपना कैरियर अपनी पसंद से चुने। पता है क्यों? क्योंकि हम नहीं चाहते की जो परेशानी हमे झेलनी पड़ी, वो उनको भी झेलनी पड़े। आप  चाहे  माने या न माने, हम आज जिस कैरियर में है, वो अपनी पसंद से नहीं है, क्योंकि हमारे जमाने में कैरियर पसंद करने की ज़िम्मेदारी माता पिता निभाते थे, हमे तो सिर्फ फरमान जारी कर दिया जाता था कि ‘मेरा बेटा तो इंजीनियर/डॉक्टर बनेगा‘।

क्या कभी आपने सोचा है, कि यदि आप, वो ना होते जो आप अभी है, तो क्या होते? चलिए सोचते है इसी बारे में, तो इंतज़ार मत करिए, लिख मारिए अपनी आप बीती। जब तक आप अपनी कहानी लिखते है, तब तक हम आपको अपनी कहानी सुना देते हैं।

ये उस समय की बात है, जब मै सातवी कक्षा मे था, एक दिन घर में बात उठी कि मेरे को क्या बनाया जाये, मजेदार बात ये है कि मेरे को इस वार्तालाप में शामिल होने कि मनाही थी, घर के बाकी सभी लोग अपनी अपनी राय रख रहे थे, गोयाकि हम कोई भैंस बकरी हो, कि इसको कैसे सजाया जाये। हम भी चुपचाप सुन रहे थे। ताऊ-जी ने कहा नालायक है, इसको किसी दुकान मे बैठा दो, थोड़े दिनो मे काम सीख लेगा तो फिर उसकी दुकान खुलवा देंगे। बड़ी बहन हमको डॉक्टर बनाने पर उतारू थी, पिताजी बोले, (सिविल) इंजीनियर बना देते है, अच्छी कमाई होती है, सभी लोग अपनी अपनी सुनाये जा रहे थे, सबके अपने अपने कारण थे| किसी ने भी हमसे नहीं पूछा। हम शुरू से ही गायक बनना चाहते थे, इसलिए जब भी मौका मिलता हम शुरू हो जाते। घर वाले भी मेरी सुरीली/बेसुरी आवाज़ से पक चुके थे, उनको ये कैरियर कमाऊ नहीं दिखता था, फिर ध्वनि प्रदूषण का भी खतरा था। फिर मेरे (बेसुरे) गाने से ये पारिवारिक समस्या से बढ़कर, मोहेल्ले की समस्या बन सकती थी। इसलिए घर वाले बोले, ना बेटा गायक न बन पाओगे, अगर बन भी गए, तो क्या गाकर रोजी रोटी कमाओगे? इसलिए गायकी को शौंक की श्रेणी में डाला गया।

अब चूंकि घर में एक चार्टर्ड अकाउंटेंट पहले से मौजूद था, इसलिए ये तो पक्का था, कि असहमति कि दशा में हमको चार्टर्ड अकाउंटेंट ही बनना था। अब सारे लोग अपने अपने कारण गिना-गिना कर थक गए, संसद कि तरह किसी भी एक डिसिजन तक नहीं पहुंचा जा सका। अंततः ताऊ-जी (प्यार से हम सभी लोग उन्हे चाचाजी ही कहा कराते थे) ने फरमान सुना दिया कि साइन्स पढ़ना इसके बूते कि बात नहीं, डॉक्टर तो किसी भी तरह से नहीं बन सकता, लिहाजा लड़का कॉमर्स पढ़ेगा और आगे चलकर अकाउंटेंट बनेगा। इस तरह से हमारे कैरियर के बारे में डिसिजन लिया गया। अब हम अमरीका में होते तो बड़े होकर घरवालों पर केस कर देते, लेकिन क्या करें, भारत में पैदा हुए, इसलिए संस्कृति कहो या फिर लोक-लिहाज का डर,सो हम भी चुपचाप इसको स्वीकार कर लिए।

 

हमने कॉमर्स  की पढ़ाई शुरू करी, बात उस समय की है, जब हम इंटरमीडिएट (12वी कक्षा) मे हुआ करते थे, हम शुरू से ही अलमस्त टाइप के थे, दिन कहाँ गुजरा पता नहीं, अलबत्ता रात को पढ़ाई जरूर करते थे। हमारे कुछ मित्रों के बड़े भाई IIT कानपुर में पढ़ते थे, हम अक्सर साइकल उठाकर उनसे मिलने IIT कानपुर चले जाया करते, उनकी लैब में जकर टाँक झांक करते, उनकी लाइब्ररी मे बैठ जाते, लोग समझते थे, कि हम लाइब्ररी मे पढ़ने जाते थे, ये गलत था, ऐसा ओछा इल्ज़ाम आप हम पर नहीं लगा सकते। दरअसल पूरी आईआईटी में सबसे ठंडी जगह वही थी, इसलिए वहाँ जाकर कोई भी किताब खोलकर पसर जाते। धीरे धीरे लोगों से भी पहचान शुरू हुई, लोगो को गलतफहमी होने लगी कि लड़का काफी पढ़ाकू किस्म का है। अब अक्सर हमारा काफी टाइम आईआईटी में कटने लगा था। जिसका खामियाजा यानि शादी के रूप में  भी हमे भुगतना पड़ा, इस दुखड़े के बारे में किसी और दिन बात करेंगे।

इधर आईआईटी वालों ने अपनी 25वी सालगिरह पर अपनी सारी प्रयोगशालाएँ पब्लिक के लिए खोल दी थी। हम तो वहाँ के रेगुलर आउट-साइडर थे ही, हम भी हर गतिविधि जैसे क्विज़ वगैरह में भाग लिए, और भगवान जाने किसकी गलती से हम एक दो क्विज़ में प्रथम स्थान पर आ गए, एक प्रोफेसर ने ताड़ लिया, बोले आओ बैठो, समझते हैं। उन्होने हमसे पूछा क्या पढ़ते हो, हम बोले कॉमर्स, प्रोफेसूर ने बोला, तुम्हारा लॉजिकल रीज़निंग अच्छा है, तुम कम्प्युटर मे शिफ्ट काहे नहीं हो जाते। अब इनको कौन समझाता कि , ये डिसिजन हमारे हाथ में नहीं था, प्रोफेसर साहब ने हमे रोजाना कम्प्युटर पर काम करने के लिए बुलाया, जिसके लिए हम तुरंत तैयार हो गए। अब शाम हम उनके साथ ही बिताते थे। उस समय के कम्प्युटर आज के तरीके के कम्प्युटर नहीं हुआ करते थे। बड़े बड़े कमरे के बराबर वाले कम्प्युटर हुआ कराते थे। खैर अब कम्प्युटर का कीड़ा तो हमको काट ही चुका था, अब कॉमर्स में किसको इंटरेस्ट होता।

हमने घर पर आकर हिम्मत करके सबको बताया की अब हम कॉमर्स नहीं पढ़ेंगे, कम्प्युटर साइन्स पढ़ेंगे, सभी बोले, इसका दिमाग खराब हो गया है, कम्प्युटर कभी भारत में आएगा नहीं, भूखे मरेगा। लेकिन हम नहीं माने, किसी तरह से इसी जद्दोजहद में बीकॉम निबटाया, लेकिन सीए के इम्तिहान में नहीं बैठे। साथ ही साथ कम्प्युटर कोर्स के बारे में भी पता करते रहे, उस समय कम्प्युटर ट्रेनिंग का मतलब साउथ इंडिया हुआ करता था, हम हिम्मत नहीं हारे, फार्म भर दिये। ढेर सारी लानते मिली, लेकिन हम अडिग रहे, इस तरह से एक अच्छा खासा चार्टर्ड अकाउंटेंट बनने वाला बंदा कम्प्युटर प्रोग्रामिंग की दुनिया में उतर गया।

इस तरह से हम अपनी मर्ज़ी (भले देर से ही सही) से अपनी पसंद के कैरियर मे शिफ्ट हो गए। आपकी भी कुछ कहानी रही होगी, हमे बताना मत भूलियगा, तो लिख मारिए अपनी कहानी, पढ़ने के लिए हम है न, अपनी कहानी का लिंक देना मत भूलिएगा, तो आते रहिए और पढ़ते रहिए आपका पसंदीदा ब्लॉग।

नए ब्लॉगर के लिए विशेष

मुझसे अक्सर नए ब्लॉगर पूछते हैं, कि मै अपने ब्लॉग को लोकप्रिय बनाने के लिए क्या उपाय करूँ? मेरा अक्सर सीधा सीधा जवाब होता है, खूब लिखो और रोज लिखो, हर उस मुद्दे पर लिखो, जिस पर आपकी पकड़ है। साथ साथ दूसरों के ब्लॉग पढ़ो, खबरों की साइट पर जाओ, अगर किसी खबर पर आपको प्रतिक्रिया देनी है तो तुरंत अपने ब्लॉग पर आओ, और अपनी प्रतिक्रिया लिखो।

विभिन्न ब्लॉग के बारे में जानने के लिए कम से कम किसी एक ब्लॉग संकलक (Blog Aggregator) पर जरूर जाएँ, साथ ही प्रतिदिन चिट्ठों पर की गयी चिट्ठा चर्चा को भी अवश्य पढ़ें। चिट्ठा चर्चा को तो आपको अपना होम पेज ही बना देना चाहिए।

कोई जरूरी नहीं कि आप ब्लॉग उन विषयों पर लिखें, जिन पर आपको काफी जानकारी है, बल्कि , हर उस मुद्दे पर भी लिखो जिस पर आप थोड़े कमजोर है, ब्लॉग तो एक माध्यम है, लोगो तक अपने विचार पहुंचाने का, लोग आपके ब्लॉग पर आकर पढ़ेंगे, आपके विचार जानेंगे, हो सकता है सहमत हो, या असहमत हो, लेकिन अपने विचार जरूर प्रकट करेंगे।

एक नियम बनाए, प्रतिदिन आप कम से कम दस ब्लॉग पर जरूर विजिट करें, उन पर अपनी टिप्पणी दें। इसी तरह से आप अपने ब्लॉग पर की गयी टिप्पणी का जवाब अवश्य दें, ये जवाब प्रति-टिप्पणी के रूप में हो सकता है, अथवा आप चाहे तो उस टिप्पणी को विषय बनाकर एक पोस्ट लिख दें। धीरे धीरे टिप्पणी के लेनदेन से आपका दूसरे ब्लॉगर के साथ जुड़ाव हो जाएगा। साथ ही नए पाठक भी मिलेंगे।

एक बात का ध्यान जरूर रखें, किसी भी तरह के विवाद में से दूर ही रहें। ब्लॉग पर विषय अपने मन मुताबिक चुने, ये ब्लॉग आपका है इसको आप अपने हिसाब से चलाएं।

जब हम ब्लॉगिंग में नए नए आए थे, तो हम सभी ब्लॉगर साथियों का एक अघोषित नियम हुआ करता था कि हम नए ब्लॉग पर जाकर टिप्पणी अवश्य करते थे, शायद अब समयाभाव के कारण लोगों ने टिप्पणी करना बंद कर दिया है, उसे दोबारा शुरू करें। इस टिप्पणी के आदान प्रदान के कारण ही हम ब्लॉग-जगत में इत्ते सारे मित्र बना सके हैं। पुराने ब्लॉगर साथियों से मेरा निवेदन है कि जहां भी नया ब्लॉग देखें, उस पर टिप्पणी अवश्य करें, नए ब्लॉगर को उत्साह और प्रोत्साहन की जरूरत होती है। यदि हम उसको प्रोत्साहित नहीं करेंगे तो ना जाने कितने ब्लॉग खुल कर बंद हो जाएँगे। यदि आपके पास समय का अभाव है तो आप दूसरे किसी ब्लॉगर साथी या मेरा पन्ना पर आकर उस नए ब्लॉग के बारे में टिप्पणी कर दें, इसी बहाने दूसरे लोग उस ब्लॉग पर विजिट करके टिप्पणी करेंगे।

इन्ही छोटी छोटी बातों और ढेर सारी शुभकामनाओ के साथ।

बम धमाके और बहानो का अंबार

अभी पिछले दिनो दिल्ली में बम धमाके हुए थे, (आशा है आप चौंके नहीं होंगे, अब हमे आदत जो हो गयी है।) फिर जैसा की हमेशा होता है, हमारे गृहमंत्री चिदम्बरम साहेब टीवी पर पधारे। टीवी चैनल वालों ने सवालों की झड़ी लगा दी, हमने महसूस किया कि उनके पास जवाबो की कमी थी, इसलिए उनकी सुविधा के लिए हम कुछ रेडी जवाब दे रहे है।  चिदम्बरम साहब यदि चाहें (और यदि मंत्री बने रहे तो)  अगले धमाको के समय जैसे चाहे वैसा प्रयोग कर लें।  हमारा इन बहानो पर कोई कॉपी-राइट नहीं है। मिर्ज़ा साहब कि प्रतिक्रिया साथ में दी जा रही है।

  • हमे धमाको की पहले से ही जानकारी थी। (अगर थी तो क्या चाहते थे, पहले हो जाये फिर कोई एक्शन लें? )
  • हमने तो राज्य सरकार को पहले ही कह दिया था, अब उन्होने कोई कदम नहीं उठाए। (इसे कहते हैं, हाथ धोना)
  • हम इन धमाकों के दोषियों को बख्शेंगे नहीं। (पकड़ कर जेल में बिरयानी खिलाएँगे। )
  • ये तो लश्कर का ही काम है। (कोई नयी बात बताओ)
  • इसमे तो हूजी का हाथ लगता है। (किसी का भी नाम लो, कौन सा आतंकवादी आकर विरोध करेगा)
  • बम बनाने की तकनीक से तो ये आई एम का काम दिखता है। (भैया पहले डिसाइड कर लो, एक ही आप्शन चुनो)
  • आतंकी सीमापार से आए थे। (अच्छा! इत्ती जल्दी पता चल गया)
  • बम रखने वाला जल्दी से आकर जल्दी चला गया। (अबे वहाँ बैठेगा क्या?)
  • घटनास्थल की कई कई बार रेकी हुई थी।
  • हम आतंकवादियों को जल्द पकड़ लेंगे। (बस खबर लग जाए, कि ये लोग कहाँ छिपे है।)
  • इसमे नाइट्रोजन का प्रयोग किया गया था।
  • ये वाला बम दो किलो का था।
  • बम रखने वाला साइकल से आया था। लेकिन वापस कार से गया था।
  • सभी देशवासी एकजुट है। (और कोई विकल्प है क्या? )
  • हमने 99% प्रतिशत धमाके तो रोक लिए, ये 1% वाला है।
  • लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए।
  • पुलिस पर विश्वास रखें, और जांच में सहयोग दे।
  • खबरी चैनल वाले बम धमाके वाली खबर बार बार न दिखाएँ। (साँप नेवले की कुश्ती दिखाएँ)
  • ये तो केसरिया बम दिखता है।
  • इसमे तो आर एसएस का हाथ दिखता है।
  • मेरे पास तो बम फटने के पाँच मिनट पहले फोन आया था। (दिग्विजय सिंह)
  • अगली बार ऐसा नहीं होगा।
  • हमने पुख्ता इंतजाम  किए हैं। (बहाने तलाशने के?)

क्या आपके पास भी कोई और बहाना है, यदि है तो मंत्रीजी को सुझाये। नहीं तो अपनी प्रतिक्रिया ही दें।

लेकिन क्या कभी हमने सोचा है? हम क्यों फिजूल की बाते करते हैं, क्यों नहीं कायदे से जांच करते हैं। क्यों नहीं आतंकवादियों को समय से सजा देते हैं। इन बम धमाकों में मरने वाले भी इंसान होते है, मरने वाला भी किसी का भाई, बेटा, बेटी, पिता होता है। लेकिन इन संवेदनहीन नेताओं को कौन समझाये। काश! हम इंसान की जान की कीमत समझ पाते।

कुवैत मे धूल की सुनामी

शुक्रवार(25th मार्च,2011) को लगभग शाम के चार बजे, सूर्य अभी चमक रहा था, कुवैत मे यकायक अंधेरा छा गया। इसका कारण था, धूल का बवंडर, जिसने पूरे शहर को अपने आगोश मे ले लिया। जो जहाँ था वहीं थम गया। शहर मे जनजीवन लगभग अस्त व्यस्त हो गया।
कुवैत एयरपोर्ट भी इससे अछूता नही रहा, इस बवंडर के कारण कई विमानों को अपना मार्ग बदलना पड़ा।

जिसने भी इस बवंडर को देखा उसे सूनामी की याद आ गयी। लीजिए आप भी देखिए इस बवंडर के कुछ फोटो और वीडियो:

DustStorm


ये रहे कुछ वीडियो:

ब्लॉगिंग का दुश्मन : ट्विटर?

कितने हसीन थे वो दिन, जब भाई अपनी खुजली मिटाने के लिए लम्बे लम्बे ब्लॉग लिखा करते, तुरत फुरत उसे पब्लिश करते, फिर चैट पर बैठकर, हर दूसरे बन्दे को लिंक टिकाते। बात यहीं तक सीमित नही रहती, बल्कि लिंक टिकाने के एक घंटे बाद चैट पर तगादा करते, कि पोस्ट समझ मे आई? (असली मतलब था, अबे कमेंट तो कर)।

अब पाठक सोचते है, एक तो जबरन पढवाए है, फिर जबरन टिप्पणी करवा रहे है, ये तो वही बात हुई कि पहले भाई-कम-शायर ने कट्टा(रिवाल्वर) लगाकर शेर सुनाए फिर वाह! वाह! ना कहने पर धमकाया। इसी टिप्पणी के तगादे के चक्कर मे, ब्लॉगर्स के दोस्तो यारों ने चैट पर नज़र आना ही कम कर दिया है। खैर पाठक क्या जाने, एक ब्लॉगर ही टिप्पणी के महत्व को जानता है।

लेकिन अब कहाँ रहे वो दिन। अब तो सभी ब्लॉगर दुनिया की भीड़ मे खो गए है लगता है। इनको ब्लॉगिंग से दूर करने मे ट्विटर का भी भरपूर हाथ है। ट्विटर के बारे मे आप सभी जानते ही है। नही जानते तो ये वाला लेख झेलिए। ट्विटर की महिमा अपरम्पार है। इस माइक्रो ब्लॉगिंग प्लेटफार्म का प्रयोग लोग बाग अपना स्टेटस बताने मे किया करते थे।

स्टेटस बताना तो ट्विटर का सिर्फ़ एक प्रयोग था, असल ब्लॉगर्स को लम्बी लम्बी पोस्ट छोटी छोटी (140 अक्षर अंग्रेजी के) वाली पोस्ट पर उतारना था। लगभग वही मामला था, जैसे इमेल आने से चिट्ठी पत्री गायब सी हो गयी है। ऊपर से एसएमएस आने के बाद तो लगता है इमेल के दिन भी गिने चुने है। खैर हम बात कर रहे थे ट्विटर की। ट्विटर की महिमा अपरम्पार है, ट्विटर ने बड़े बड़े गुल खिलाए है। बड़े बड़े तानाशाहों के तख्ता पलट करवा दिए है। अब ट्विटर पर एक और इल्जाम लगा है, ब्लॉगिंग बन्द करवाने का। एक स्टडी एक अनुसार ट्विटर पर लिखने वाले काफी लोगों ब्लॉगिंग की दुनिया को अलविदा कह दिया है। जिन्होने अलविदा नही कहा है, उन लोगों ने ब्लॉगिंग काफी कम कर दी है। अब दूसरों की बात क्या करें, हम खुद इसकी एक ताजा मिसाल है। पिछले दो सालों से ब्लॉगिंग इतनी कम कर दी है कि पूछो मत। बहाने तो हम कई गिना सकते है, लेकिन सच पूछो तो ट्विटर पर चहकना इतना सहज है, झट से दिल की बात कह दो, ब्लॉगिंग मे थोड़ी प्रस्तावना, ढेर सारा मसाला और थोड़ा उपसंहार करना पड़ता है। अब भई जहाँ सहजता होगी वहाँ दुनिया भागेगी ही। लेकिन मै नही मानता कि ब्लॉगिंग कभी मरेगी। अभी ब्लॉगिंग को काफी नयी ऊचाईयां हासिल करनी है।

आप क्या सोचते है इस बारे में?

बदलता ज़माना

सोशल नैटवर्किंग ने हमारी लाइफ़ को किस तरह से बदल दिया है, इसकी एक बानगी देखिए :

मालकिन (नौकरानी से) : कांता बाई! तुम तीन दिन काम पर नही आई,क्या बात है?
नौकरानी : मेमसाब! मैने तो फेसबुक पर अपना स्टेटस अपडेट कर दिया था कि तीन दिनो के लिए गाँव जा रही हूँ, साहब(आपके पति) का कमेंट भी आया था, “हैव ए सेफ ट्रिप, हनी! जल्दी लौटना, तुम्हारे बिना जी नही लगता”

(ईमेल से भेजा गया चुटकुला)