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19 अक्तुबर, 2006
Purnima
इसको इग्नोरे करें।
Bhawana
कभी उलझने बढाते
कभी उलझने सुलझाते
नये - नये रंग दिखलाते
जाने अनजाने रिश्ते
कभी एक पल में
अपना बनाते
कभी सदियों का नाता
पल में भूल जाते
जाने अनजाने रिश्ते
कभी गुमनाम
कभी बदनाम
कभी बहुत कुछ कह जाते
जाने अनजाने रिश्ते
-भावना
Bhawana
साथिया
तुम्हारी हर एक मुलाकात मुझे तेरे और नजदीक ले आती है
ये नजदीकी मुझे इस कदर सताती है
अब तुम बिन रहना है, मुशकिल
हरपल अब तेरी याद आती है
नजरे झुकाती हूँ तो सपनो में तुम आते हो
नजरे मिलाती हूँ तो और सपने दिखाते हो
इस कदर सपनों मे आना-जाना
कुछ मुशकिल सा होने लगा हे
अब तो बस इन्तजार है
तुम डोली ले कर कब आते हो
-भावना
पराग कुमार मांदले
विदा
मेरे प्राण पियारे
पाखी विदा!
नेह-प्यार के
नाते पुराने
छुट गए
मिला किसी को
नया ख़जाना
कुछ लुट गए
बड़ी निराली
है जीवन की
यह अदा।
खाली हाथों
की रेखाएं
कहती हैं
प्रीत सदा
सौ-सौ दुखों को
सहती है
युगों-युगों ने
दोहरायी है
यही कथा।
पाखी उड़ा
पीछे रहा
खाली पिंजरा
फिर भी दिल में
बसा रहेगा
इक चेहरा
वक्त की आंधी
नहीं सकेगी
जिसे मिटा।
इस पिंजरे में
पाखी नया
नहीं आएगा
गीत यहाँ पर
कोई नहीं
अब गाएगा
छुटा संगीत
मौन यहाँ
अब आन बसा।
पराग कुमार मांदले

छोड़ो भी यह जीना कैसा?
हँस के आंसू पीना कैसा?
जीवन की हर इक कतरन को
आशाओं से सीना कैसा?
प्यास रही ना भीतर जब तो
फिर सागर ओ’ मीना कैसा?
अंगारों के हम हैं आदी
मौसम भीना-भीना कैसा?
जहां झुके सर वहीं खुदा है
मक्का ओ’ मदीना कैसा?
घर की चर्चा चौराहे पर
परदा इतना झीना कैसा?
-पराग कुमार मांदले