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19 अक्तुबर, 2006 PurnimaPurnima

इसको इग्नोरे करें।

रिश्ते

6 फरवरी, 2006 BhawanaBhawana


कभी खिंचते - खिचाते
हर पल नये रंग दे जाते
जाने अनजाने रिश्ते

कभी उलझने बढाते
कभी उलझने सुलझाते
नये - नये रंग दिखलाते
जाने अनजाने रिश्ते

कभी एक पल में
अपना बनाते
कभी सदियों का नाता
पल में भूल जाते
जाने अनजाने रिश्ते

कभी गुमनाम
कभी बदनाम
कभी बहुत कुछ कह जाते
जाने अनजाने रिश्ते
-भावना

इन्तजार

2 फरवरी, 2006 BhawanaBhawana

DOLI
साथिया
तुम्हारी हर एक मुलाकात मुझे तेरे और नजदीक ले आती है
ये नजदीकी मुझे इस कदर सताती है
अब तुम बिन रहना है, मुशकिल
हरपल अब तेरी याद आती है
नजरे झुकाती हूँ तो सपनो में तुम आते हो
नजरे मिलाती हूँ तो और सपने दिखाते हो
इस कदर सपनों मे आना-जाना
कुछ मुशकिल सा होने लगा हे
अब तो बस इन्तजार है
तुम डोली ले कर कब आते हो

-भावना

विदा

23 दिसम्बर, 2005 पराग कुमार मांदलेपराग कुमार मांदले

विदा
मेरे प्राण पियारे
पाखी विदा!

नेह-प्यार के
नाते पुराने
छुट गए
मिला किसी को
नया ख़जाना
कुछ लुट गए
बड़ी निराली
है जीवन की
यह अदा।

खाली हाथों
की रेखाएं
कहती हैं
प्रीत सदा
सौ-सौ दुखों को
सहती है
युगों-युगों ने
दोहरायी है
यही कथा।

पाखी उड़ा
पीछे रहा
खाली पिंजरा
फिर भी दिल में
बसा रहेगा
इक चेहरा
वक्त की आंधी
नहीं सकेगी
जिसे मिटा।

इस पिंजरे में
पाखी नया
नहीं आएगा
गीत यहाँ पर
कोई नहीं
अब गाएगा
छुटा संगीत
मौन यहाँ
अब आन बसा।

परदा इतना झीना कैसा?

5 अक्तुबर, 2005 पराग कुमार मांदलेपराग कुमार मांदले


छोड़ो भी यह जीना कैसा?
हँस के आंसू पीना कैसा?

जीवन की हर इक कतरन को
आशाओं से सीना कैसा?

प्यास रही ना भीतर जब तो
फिर सागर ओ’ मीना कैसा?

अंगारों के हम हैं आदी
मौसम भीना-भीना कैसा?

जहां झुके सर वहीं खुदा है
मक्का ओ’ मदीना कैसा?

घर की चर्चा चौराहे पर
परदा इतना झीना कैसा?

-पराग कुमार मांदले