अपने एण्ड्रोइड फोन पर हिन्दी चलाएं

अभी पिछले दिनो मैंने अपना फोन बदला था, सैमसंग गलक्सी एस से सैमसंग गलक्सी एस2, हिन्दी का सपोर्ट न पिछले एण्ड्रोइड फोन मे था न इसमे। बहुत सारे जतन करके देखे, लेकिन कोई तरीका काम नहीं आया। सारे तरीको में आपको अपने फोन को रूट करना होता था, जिसके कारण आपकी वारंटी खतम होने का डर था, इसलिए सारे तरीके वहाँ पर जाकर रुक जाते थे। आज थोड़ा समय था, इसलिए मैंने सोचा चलो कुछ जुगाड़ ट्राई करते हैं।

सबसे पहले तो आपको आवश्यक एप्लिकेशन के बारे में बता दें।

(ये सारे एप्लिकेशन आपको एंडरोइड मार्केट में फ्री में उपलब्ध हैं।)

 

 

 

From MeraPannaPhoto
  1. सबसे पहले तो आप हिंदीखोज वाला एप्लिकेशन लगा दीजिये, जिसके लगाने से आपके मोबाइल में मंगल फॉन्ट आ जाएगा।
  2. उसके बाद आप गो-कीबोर्ड और गो-कीबोर्ड हिन्दी स्थापित कर दीजिये।
  3. गो-कीबोर्ड की सेटिंग में जकर, हिन्दी को इनेबल कर दीजिये। यह आपके लिए एक शब्दकोश भी डाउन-लोड कर देगा।
  4. अब बारी आती है, fontomizer SP की, इसको स्थापित करिए, ये आपके लिए हिन्दी फॉन्ट अक्षर टीटीएफ़ स्थापित कर देगा।
  5. अब मोबाइल की सेटिंग में जाकर अक्षर फॉन्ट को डिफ़ाल्ट फॉन्ट कर दीजिये। इस से मोबाइल पर हिन्दी दिखने लगेगी।

एसएमएस के लिए आपको Go SMS Pro स्थापित करना होगा, सेटिंग में जाकर Scan Font Package करिए, फिर हिन्दी खोज को सिलैक्ट करके मंगल फॉन्ट को लगा दीजिये। ये आपको दो जगह पर करना होगा, बस फिर अपनी सेटिंग एनेबिल करिए और हिन्दी लिखिए/पढ़िये। बिना किसी दिक्कत के।

समस्या : अभी भी एक समस्या है, वो है, हिन्दी में मात्रा का सही नहीं दिखाना, कुछ शब्दो में हिन्दी की मात्रा सही से नहीं दिखती, जहां भी आधे शब्द है, अथवा ई की मात्रा है, वहाँ पर दिक्कत है, ये दिक्कत गूगल की तरफ से है, उसमे गूगल बाबा ही कुछ कर सकते है, लेकिन फिर भी  ना होने से कुछ होना तो भला है, है कि नहीं?

विस्तृत जानकारी स्क्रीनशॉट के साथ जल्द मेरे जुगाड़ी ब्लॉग पर उपलब्ध है।

दशहरा और अतीत की यादें

आज शुकुल गूगल चैट पर प्रकट हुए और आदेश किया की भई कल दशहरा है, तुमने कुछ लिखा भी है कि नहीं, हम बोले यार नून तेल लकड़ी से फुर्सत मिले तब तो दशहरे का सोचें, फिर विदेश मे ईद दशहरा दिवाली सब एक दिन जैसे ही दिखते हैं। कम से कम कुवैत मे तो ऐसा ही है। यहाँ पर सभी त्योहार अक्सर सप्ताहांत यानि शुक्रवार और शनिवार को ही मनाए जाते जाते है। चाहे वो त्योहार हो या जन्मदिन, अब बंदा पैदा हो मंगलवार को लेकिन नहीं जी, हम तो उसका जन्मदिन शुक्रवार को ही मनाएंगे। अब क्या करें, यहाँ के हिसाब से ही चलना है। खैर ये सब तो चलता ही रहेगा। तो भैया पाठकों कि बेहद मांग पर पेश हैं दशहरे पर विशेष मेरे दो पुराने लेख :

इन दोनों लेखो को लिखकर जितना मजा  हमे आया था उतना ही मजा हमारे पाठकों को पढ़कर आया। विशेषकर हमारे आप्रवासी मित्रो को, जो बेचारे देसी त्योहारों के दिन भी ऑफिस में बैठकर मेरे लेख पढ़कर ही त्योहार मना लेते हैं। ये दोनों पोस्ट मैंने ब्लॉग्स्पॉट पर लिखी थी, इसलिए टिप्पणियाँ आपको यहाँ पर नहीं मिलेंगी, फिर भी अगर आप दोबारा पढ़ रहे हैं तो टिप्पणी करना मत भूलिएगा। जाते जाते आपको नवरात्रि, दुर्गापूजा और दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएँ।

चलते चलते : दुर्गापूजा पर एक चुटकुला याद आ गया, मुलाहिजा फरमाएँ :

हमारे शादीशुदा एक मित्र अक्सर कहा करते हैं “मै शादी के पहले भी शेर था अब भी हूँ।
हमने बोला कि ये तो असंभव है, उन्होने स्पष्ट किया :
“मै शादी के पहले भी शेर था और अब भी हूँ , अलबत्ता अब दुर्गा माता शेर के ऊपर बैठी हुई हैं।”
(उनकी पत्नी का नाम दुर्गा है)

 

 


आपका कैरियर और आपकी पसंद?

आइये कुछ ऐसी चर्चा करते हैं जिनका संबंध हमारे निजी जीवन से है। अक्सर हम अपने बच्चों को शिक्षा देते है की वो अपना कैरियर अपनी पसंद से चुने। पता है क्यों? क्योंकि हम नहीं चाहते की जो परेशानी हमे झेलनी पड़ी, वो उनको भी झेलनी पड़े। आप  चाहे  माने या न माने, हम आज जिस कैरियर में है, वो अपनी पसंद से नहीं है, क्योंकि हमारे जमाने में कैरियर पसंद करने की ज़िम्मेदारी माता पिता निभाते थे, हमे तो सिर्फ फरमान जारी कर दिया जाता था कि ‘मेरा बेटा तो इंजीनियर/डॉक्टर बनेगा‘।

क्या कभी आपने सोचा है, कि यदि आप, वो ना होते जो आप अभी है, तो क्या होते? चलिए सोचते है इसी बारे में, तो इंतज़ार मत करिए, लिख मारिए अपनी आप बीती। जब तक आप अपनी कहानी लिखते है, तब तक हम आपको अपनी कहानी सुना देते हैं।

ये उस समय की बात है, जब मै सातवी कक्षा मे था, एक दिन घर में बात उठी कि मेरे को क्या बनाया जाये, मजेदार बात ये है कि मेरे को इस वार्तालाप में शामिल होने कि मनाही थी, घर के बाकी सभी लोग अपनी अपनी राय रख रहे थे, गोयाकि हम कोई भैंस बकरी हो, कि इसको कैसे सजाया जाये। हम भी चुपचाप सुन रहे थे। ताऊ-जी ने कहा नालायक है, इसको किसी दुकान मे बैठा दो, थोड़े दिनो मे काम सीख लेगा तो फिर उसकी दुकान खुलवा देंगे। बड़ी बहन हमको डॉक्टर बनाने पर उतारू थी, पिताजी बोले, (सिविल) इंजीनियर बना देते है, अच्छी कमाई होती है, सभी लोग अपनी अपनी सुनाये जा रहे थे, सबके अपने अपने कारण थे| किसी ने भी हमसे नहीं पूछा। हम शुरू से ही गायक बनना चाहते थे, इसलिए जब भी मौका मिलता हम शुरू हो जाते। घर वाले भी मेरी सुरीली/बेसुरी आवाज़ से पक चुके थे, उनको ये कैरियर कमाऊ नहीं दिखता था, फिर ध्वनि प्रदूषण का भी खतरा था। फिर मेरे (बेसुरे) गाने से ये पारिवारिक समस्या से बढ़कर, मोहेल्ले की समस्या बन सकती थी। इसलिए घर वाले बोले, ना बेटा गायक न बन पाओगे, अगर बन भी गए, तो क्या गाकर रोजी रोटी कमाओगे? इसलिए गायकी को शौंक की श्रेणी में डाला गया।

अब चूंकि घर में एक चार्टर्ड अकाउंटेंट पहले से मौजूद था, इसलिए ये तो पक्का था, कि असहमति कि दशा में हमको चार्टर्ड अकाउंटेंट ही बनना था। अब सारे लोग अपने अपने कारण गिना-गिना कर थक गए, संसद कि तरह किसी भी एक डिसिजन तक नहीं पहुंचा जा सका। अंततः ताऊ-जी (प्यार से हम सभी लोग उन्हे चाचाजी ही कहा कराते थे) ने फरमान सुना दिया कि साइन्स पढ़ना इसके बूते कि बात नहीं, डॉक्टर तो किसी भी तरह से नहीं बन सकता, लिहाजा लड़का कॉमर्स पढ़ेगा और आगे चलकर अकाउंटेंट बनेगा। इस तरह से हमारे कैरियर के बारे में डिसिजन लिया गया। अब हम अमरीका में होते तो बड़े होकर घरवालों पर केस कर देते, लेकिन क्या करें, भारत में पैदा हुए, इसलिए संस्कृति कहो या फिर लोक-लिहाज का डर,सो हम भी चुपचाप इसको स्वीकार कर लिए।

 

हमने कॉमर्स  की पढ़ाई शुरू करी, बात उस समय की है, जब हम इंटरमीडिएट (12वी कक्षा) मे हुआ करते थे, हम शुरू से ही अलमस्त टाइप के थे, दिन कहाँ गुजरा पता नहीं, अलबत्ता रात को पढ़ाई जरूर करते थे। हमारे कुछ मित्रों के बड़े भाई IIT कानपुर में पढ़ते थे, हम अक्सर साइकल उठाकर उनसे मिलने IIT कानपुर चले जाया करते, उनकी लैब में जकर टाँक झांक करते, उनकी लाइब्ररी मे बैठ जाते, लोग समझते थे, कि हम लाइब्ररी मे पढ़ने जाते थे, ये गलत था, ऐसा ओछा इल्ज़ाम आप हम पर नहीं लगा सकते। दरअसल पूरी आईआईटी में सबसे ठंडी जगह वही थी, इसलिए वहाँ जाकर कोई भी किताब खोलकर पसर जाते। धीरे धीरे लोगों से भी पहचान शुरू हुई, लोगो को गलतफहमी होने लगी कि लड़का काफी पढ़ाकू किस्म का है। अब अक्सर हमारा काफी टाइम आईआईटी में कटने लगा था। जिसका खामियाजा यानि शादी के रूप में  भी हमे भुगतना पड़ा, इस दुखड़े के बारे में किसी और दिन बात करेंगे।

इधर आईआईटी वालों ने अपनी 25वी सालगिरह पर अपनी सारी प्रयोगशालाएँ पब्लिक के लिए खोल दी थी। हम तो वहाँ के रेगुलर आउट-साइडर थे ही, हम भी हर गतिविधि जैसे क्विज़ वगैरह में भाग लिए, और भगवान जाने किसकी गलती से हम एक दो क्विज़ में प्रथम स्थान पर आ गए, एक प्रोफेसर ने ताड़ लिया, बोले आओ बैठो, समझते हैं। उन्होने हमसे पूछा क्या पढ़ते हो, हम बोले कॉमर्स, प्रोफेसूर ने बोला, तुम्हारा लॉजिकल रीज़निंग अच्छा है, तुम कम्प्युटर मे शिफ्ट काहे नहीं हो जाते। अब इनको कौन समझाता कि , ये डिसिजन हमारे हाथ में नहीं था, प्रोफेसर साहब ने हमे रोजाना कम्प्युटर पर काम करने के लिए बुलाया, जिसके लिए हम तुरंत तैयार हो गए। अब शाम हम उनके साथ ही बिताते थे। उस समय के कम्प्युटर आज के तरीके के कम्प्युटर नहीं हुआ करते थे। बड़े बड़े कमरे के बराबर वाले कम्प्युटर हुआ कराते थे। खैर अब कम्प्युटर का कीड़ा तो हमको काट ही चुका था, अब कॉमर्स में किसको इंटरेस्ट होता।

हमने घर पर आकर हिम्मत करके सबको बताया की अब हम कॉमर्स नहीं पढ़ेंगे, कम्प्युटर साइन्स पढ़ेंगे, सभी बोले, इसका दिमाग खराब हो गया है, कम्प्युटर कभी भारत में आएगा नहीं, भूखे मरेगा। लेकिन हम नहीं माने, किसी तरह से इसी जद्दोजहद में बीकॉम निबटाया, लेकिन सीए के इम्तिहान में नहीं बैठे। साथ ही साथ कम्प्युटर कोर्स के बारे में भी पता करते रहे, उस समय कम्प्युटर ट्रेनिंग का मतलब साउथ इंडिया हुआ करता था, हम हिम्मत नहीं हारे, फार्म भर दिये। ढेर सारी लानते मिली, लेकिन हम अडिग रहे, इस तरह से एक अच्छा खासा चार्टर्ड अकाउंटेंट बनने वाला बंदा कम्प्युटर प्रोग्रामिंग की दुनिया में उतर गया।

इस तरह से हम अपनी मर्ज़ी (भले देर से ही सही) से अपनी पसंद के कैरियर मे शिफ्ट हो गए। आपकी भी कुछ कहानी रही होगी, हमे बताना मत भूलियगा, तो लिख मारिए अपनी कहानी, पढ़ने के लिए हम है न, अपनी कहानी का लिंक देना मत भूलिएगा, तो आते रहिए और पढ़ते रहिए आपका पसंदीदा ब्लॉग।

नए ब्लॉगर के लिए विशेष

मुझसे अक्सर नए ब्लॉगर पूछते हैं, कि मै अपने ब्लॉग को लोकप्रिय बनाने के लिए क्या उपाय करूँ? मेरा अक्सर सीधा सीधा जवाब होता है, खूब लिखो और रोज लिखो, हर उस मुद्दे पर लिखो, जिस पर आपकी पकड़ है। साथ साथ दूसरों के ब्लॉग पढ़ो, खबरों की साइट पर जाओ, अगर किसी खबर पर आपको प्रतिक्रिया देनी है तो तुरंत अपने ब्लॉग पर आओ, और अपनी प्रतिक्रिया लिखो।

विभिन्न ब्लॉग के बारे में जानने के लिए कम से कम किसी एक ब्लॉग संकलक (Blog Aggregator) पर जरूर जाएँ, साथ ही प्रतिदिन चिट्ठों पर की गयी चिट्ठा चर्चा को भी अवश्य पढ़ें। चिट्ठा चर्चा को तो आपको अपना होम पेज ही बना देना चाहिए।

कोई जरूरी नहीं कि आप ब्लॉग उन विषयों पर लिखें, जिन पर आपको काफी जानकारी है, बल्कि , हर उस मुद्दे पर भी लिखो जिस पर आप थोड़े कमजोर है, ब्लॉग तो एक माध्यम है, लोगो तक अपने विचार पहुंचाने का, लोग आपके ब्लॉग पर आकर पढ़ेंगे, आपके विचार जानेंगे, हो सकता है सहमत हो, या असहमत हो, लेकिन अपने विचार जरूर प्रकट करेंगे।

एक नियम बनाए, प्रतिदिन आप कम से कम दस ब्लॉग पर जरूर विजिट करें, उन पर अपनी टिप्पणी दें। इसी तरह से आप अपने ब्लॉग पर की गयी टिप्पणी का जवाब अवश्य दें, ये जवाब प्रति-टिप्पणी के रूप में हो सकता है, अथवा आप चाहे तो उस टिप्पणी को विषय बनाकर एक पोस्ट लिख दें। धीरे धीरे टिप्पणी के लेनदेन से आपका दूसरे ब्लॉगर के साथ जुड़ाव हो जाएगा। साथ ही नए पाठक भी मिलेंगे।

एक बात का ध्यान जरूर रखें, किसी भी तरह के विवाद में से दूर ही रहें। ब्लॉग पर विषय अपने मन मुताबिक चुने, ये ब्लॉग आपका है इसको आप अपने हिसाब से चलाएं।

जब हम ब्लॉगिंग में नए नए आए थे, तो हम सभी ब्लॉगर साथियों का एक अघोषित नियम हुआ करता था कि हम नए ब्लॉग पर जाकर टिप्पणी अवश्य करते थे, शायद अब समयाभाव के कारण लोगों ने टिप्पणी करना बंद कर दिया है, उसे दोबारा शुरू करें। इस टिप्पणी के आदान प्रदान के कारण ही हम ब्लॉग-जगत में इत्ते सारे मित्र बना सके हैं। पुराने ब्लॉगर साथियों से मेरा निवेदन है कि जहां भी नया ब्लॉग देखें, उस पर टिप्पणी अवश्य करें, नए ब्लॉगर को उत्साह और प्रोत्साहन की जरूरत होती है। यदि हम उसको प्रोत्साहित नहीं करेंगे तो ना जाने कितने ब्लॉग खुल कर बंद हो जाएँगे। यदि आपके पास समय का अभाव है तो आप दूसरे किसी ब्लॉगर साथी या मेरा पन्ना पर आकर उस नए ब्लॉग के बारे में टिप्पणी कर दें, इसी बहाने दूसरे लोग उस ब्लॉग पर विजिट करके टिप्पणी करेंगे।

इन्ही छोटी छोटी बातों और ढेर सारी शुभकामनाओ के साथ।

बम धमाके और बहानो का अंबार

अभी पिछले दिनो दिल्ली में बम धमाके हुए थे, (आशा है आप चौंके नहीं होंगे, अब हमे आदत जो हो गयी है।) फिर जैसा की हमेशा होता है, हमारे गृहमंत्री चिदम्बरम साहेब टीवी पर पधारे। टीवी चैनल वालों ने सवालों की झड़ी लगा दी, हमने महसूस किया कि उनके पास जवाबो की कमी थी, इसलिए उनकी सुविधा के लिए हम कुछ रेडी जवाब दे रहे है।  चिदम्बरम साहब यदि चाहें (और यदि मंत्री बने रहे तो)  अगले धमाको के समय जैसे चाहे वैसा प्रयोग कर लें।  हमारा इन बहानो पर कोई कॉपी-राइट नहीं है। मिर्ज़ा साहब कि प्रतिक्रिया साथ में दी जा रही है।

  • हमे धमाको की पहले से ही जानकारी थी। (अगर थी तो क्या चाहते थे, पहले हो जाये फिर कोई एक्शन लें? )
  • हमने तो राज्य सरकार को पहले ही कह दिया था, अब उन्होने कोई कदम नहीं उठाए। (इसे कहते हैं, हाथ धोना)
  • हम इन धमाकों के दोषियों को बख्शेंगे नहीं। (पकड़ कर जेल में बिरयानी खिलाएँगे। )
  • ये तो लश्कर का ही काम है। (कोई नयी बात बताओ)
  • इसमे तो हूजी का हाथ लगता है। (किसी का भी नाम लो, कौन सा आतंकवादी आकर विरोध करेगा)
  • बम बनाने की तकनीक से तो ये आई एम का काम दिखता है। (भैया पहले डिसाइड कर लो, एक ही आप्शन चुनो)
  • आतंकी सीमापार से आए थे। (अच्छा! इत्ती जल्दी पता चल गया)
  • बम रखने वाला जल्दी से आकर जल्दी चला गया। (अबे वहाँ बैठेगा क्या?)
  • घटनास्थल की कई कई बार रेकी हुई थी।
  • हम आतंकवादियों को जल्द पकड़ लेंगे। (बस खबर लग जाए, कि ये लोग कहाँ छिपे है।)
  • इसमे नाइट्रोजन का प्रयोग किया गया था।
  • ये वाला बम दो किलो का था।
  • बम रखने वाला साइकल से आया था। लेकिन वापस कार से गया था।
  • सभी देशवासी एकजुट है। (और कोई विकल्प है क्या? )
  • हमने 99% प्रतिशत धमाके तो रोक लिए, ये 1% वाला है।
  • लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए।
  • पुलिस पर विश्वास रखें, और जांच में सहयोग दे।
  • खबरी चैनल वाले बम धमाके वाली खबर बार बार न दिखाएँ। (साँप नेवले की कुश्ती दिखाएँ)
  • ये तो केसरिया बम दिखता है।
  • इसमे तो आर एसएस का हाथ दिखता है।
  • मेरे पास तो बम फटने के पाँच मिनट पहले फोन आया था। (दिग्विजय सिंह)
  • अगली बार ऐसा नहीं होगा।
  • हमने पुख्ता इंतजाम  किए हैं। (बहाने तलाशने के?)

क्या आपके पास भी कोई और बहाना है, यदि है तो मंत्रीजी को सुझाये। नहीं तो अपनी प्रतिक्रिया ही दें।

लेकिन क्या कभी हमने सोचा है? हम क्यों फिजूल की बाते करते हैं, क्यों नहीं कायदे से जांच करते हैं। क्यों नहीं आतंकवादियों को समय से सजा देते हैं। इन बम धमाकों में मरने वाले भी इंसान होते है, मरने वाला भी किसी का भाई, बेटा, बेटी, पिता होता है। लेकिन इन संवेदनहीन नेताओं को कौन समझाये। काश! हम इंसान की जान की कीमत समझ पाते।

कुवैत मे धूल की सुनामी

शुक्रवार(25th मार्च,2011) को लगभग शाम के चार बजे, सूर्य अभी चमक रहा था, कुवैत मे यकायक अंधेरा छा गया। इसका कारण था, धूल का बवंडर, जिसने पूरे शहर को अपने आगोश मे ले लिया। जो जहाँ था वहीं थम गया। शहर मे जनजीवन लगभग अस्त व्यस्त हो गया।
कुवैत एयरपोर्ट भी इससे अछूता नही रहा, इस बवंडर के कारण कई विमानों को अपना मार्ग बदलना पड़ा।

जिसने भी इस बवंडर को देखा उसे सूनामी की याद आ गयी। लीजिए आप भी देखिए इस बवंडर के कुछ फोटो और वीडियो:

DustStorm


ये रहे कुछ वीडियो:

ब्लॉगिंग का दुश्मन : ट्विटर?

कितने हसीन थे वो दिन, जब भाई अपनी खुजली मिटाने के लिए लम्बे लम्बे ब्लॉग लिखा करते, तुरत फुरत उसे पब्लिश करते, फिर चैट पर बैठकर, हर दूसरे बन्दे को लिंक टिकाते। बात यहीं तक सीमित नही रहती, बल्कि लिंक टिकाने के एक घंटे बाद चैट पर तगादा करते, कि पोस्ट समझ मे आई? (असली मतलब था, अबे कमेंट तो कर)।

अब पाठक सोचते है, एक तो जबरन पढवाए है, फिर जबरन टिप्पणी करवा रहे है, ये तो वही बात हुई कि पहले भाई-कम-शायर ने कट्टा(रिवाल्वर) लगाकर शेर सुनाए फिर वाह! वाह! ना कहने पर धमकाया। इसी टिप्पणी के तगादे के चक्कर मे, ब्लॉगर्स के दोस्तो यारों ने चैट पर नज़र आना ही कम कर दिया है। खैर पाठक क्या जाने, एक ब्लॉगर ही टिप्पणी के महत्व को जानता है।

लेकिन अब कहाँ रहे वो दिन। अब तो सभी ब्लॉगर दुनिया की भीड़ मे खो गए है लगता है। इनको ब्लॉगिंग से दूर करने मे ट्विटर का भी भरपूर हाथ है। ट्विटर के बारे मे आप सभी जानते ही है। नही जानते तो ये वाला लेख झेलिए। ट्विटर की महिमा अपरम्पार है। इस माइक्रो ब्लॉगिंग प्लेटफार्म का प्रयोग लोग बाग अपना स्टेटस बताने मे किया करते थे।

स्टेटस बताना तो ट्विटर का सिर्फ़ एक प्रयोग था, असल ब्लॉगर्स को लम्बी लम्बी पोस्ट छोटी छोटी (140 अक्षर अंग्रेजी के) वाली पोस्ट पर उतारना था। लगभग वही मामला था, जैसे इमेल आने से चिट्ठी पत्री गायब सी हो गयी है। ऊपर से एसएमएस आने के बाद तो लगता है इमेल के दिन भी गिने चुने है। खैर हम बात कर रहे थे ट्विटर की। ट्विटर की महिमा अपरम्पार है, ट्विटर ने बड़े बड़े गुल खिलाए है। बड़े बड़े तानाशाहों के तख्ता पलट करवा दिए है। अब ट्विटर पर एक और इल्जाम लगा है, ब्लॉगिंग बन्द करवाने का। एक स्टडी एक अनुसार ट्विटर पर लिखने वाले काफी लोगों ब्लॉगिंग की दुनिया को अलविदा कह दिया है। जिन्होने अलविदा नही कहा है, उन लोगों ने ब्लॉगिंग काफी कम कर दी है। अब दूसरों की बात क्या करें, हम खुद इसकी एक ताजा मिसाल है। पिछले दो सालों से ब्लॉगिंग इतनी कम कर दी है कि पूछो मत। बहाने तो हम कई गिना सकते है, लेकिन सच पूछो तो ट्विटर पर चहकना इतना सहज है, झट से दिल की बात कह दो, ब्लॉगिंग मे थोड़ी प्रस्तावना, ढेर सारा मसाला और थोड़ा उपसंहार करना पड़ता है। अब भई जहाँ सहजता होगी वहाँ दुनिया भागेगी ही। लेकिन मै नही मानता कि ब्लॉगिंग कभी मरेगी। अभी ब्लॉगिंग को काफी नयी ऊचाईयां हासिल करनी है।

आप क्या सोचते है इस बारे में?

बदलता ज़माना

सोशल नैटवर्किंग ने हमारी लाइफ़ को किस तरह से बदल दिया है, इसकी एक बानगी देखिए :

मालकिन (नौकरानी से) : कांता बाई! तुम तीन दिन काम पर नही आई,क्या बात है?
नौकरानी : मेमसाब! मैने तो फेसबुक पर अपना स्टेटस अपडेट कर दिया था कि तीन दिनो के लिए गाँव जा रही हूँ, साहब(आपके पति) का कमेंट भी आया था, “हैव ए सेफ ट्रिप, हनी! जल्दी लौटना, तुम्हारे बिना जी नही लगता”

(ईमेल से भेजा गया चुटकुला)

मोबाइल नम्बर पोर्टेबिल्टी :कब, क्यों, कैसे?

आज भारत के मोबाइल क्रांति मे एक और अध्याय जुड़ गया है, अब आप अपना नम्बर बदले बिना अपना सर्विस प्रोवाइडर बदल सकते है। तकनीकी भाषा मे इसको मोबाइल नम्बर पोर्टेबिल्टी कहते है (अब हिन्दी मे इसका क्या अनुवाद होगा, इसके पचड़े मे पड़े बिना आगे पढिए)।

From MeraPannaPhoto

Photo Courtesy : Blogdefined.com

तो जनाब इसकी जरुरत क्यों आन पड़ी। हुआ यूं कि आपने मोबाइल कम्पनी के प्रलोभनों मे आकर अपने सर्विस तो ले ली, कभी किसी आइडिए के कारण, कभी कुत्ते, जूजू वाले, कभी अच्छे संगीत वाले तो कभी बहुत ही संवेदनशील विज्ञापन के चक्कर मे। लेकिन फिर आपको लगा कि आप फंस गए। अब नम्बर तो आप सभी को प्रसाद की तरह बाँट चुके थे, अब इस जंजाल से बाहर निकलने का कोई रास्ता भी नही था। लेकिन जनाब सरकार ने आपकी सुनी और आपको नम्बर पोर्टेबिल्टी सेवा देना अनिवार्य कर दिया। आज से यह सेवा पूरे भारत वर्ष मे उपलब्ध है।

लेकिन इसको लेने के लिए करना क्या पड़ेगा, अरे भाई बताते है, थोड़ा सब्र तो करो….ये रही पूरी जानकारी :

  • सबसे पहले तो आपको जिस मोबाइल प्रोवाइडर के पास जाना है, उससे एक फार्म लेना होगा।
  • फिर आप अपने मोबाइल आपरेटर को एक एस एम एस करेंगे, 1900 नम्बर पर।
  • जवाब मे आपरेटर आपको एक नम्बर भेजेगा, इसको सम्भाल कर रखें। आपके मोबाइल से 19 रुपए कट जाएंगे।
  • यह आपका पोर्टेब्लिटी नम्बर है, इसको आप नए आपरेटर के फार्म मे भरेंगे।
  • अगले 48 घंटे मे आपकी सर्विस एक प्रोवाइडर से दूसरे प्रोवाइडर मे शिफ़्ट हो जाएगी, बशर्ते आपके मोबाइल पर कुछ बकाया ना हो।
  • आपको एक घंटे के लिए मोबाइल बंद रखना पड़ सकता है, अधिक जानकारी के लिए नए प्रोवाइडर से पूछे।

तो जनाब हो गयी पोर्टेब्लिटी, अब झेलिए इस नए प्रोवाइडर को। लेकिन ध्यान रहे, अगले 50 दिनो तक आप इस प्रोवाइडर का दामन नही छोड़ सकते। अगर इस से भी दु:खी हो गए तो पचास दिन बाद फिर से इस पोस्ट को पढिए और फिर यही स्टैप दोहराइए।

कुछ सवाल तो अब भी है, तो पूछो ना भई, हम यहाँ बैठे ही जवाब देने के लिए है:

हमारा फोन सीडीएमए है, कर लो दुनिया मुट्ठी मे वालो का, हम उकता गए है, जीएसएम मे कैसे जाएं?
सबसे पहले तो आप अपना फोन चैक करिए, उसमे जीएसएम सुविधा है कि नही अगर नही तो दूसरा मोबाइल खरीदिए, बाकी प्रोसेस यही रहेगा। आप सीडीएमए से जीएसएम, जीएसएम से जीएसएम या  अथवा जीएसएम से सीडीएमए, कुछ भी कर सकते है।
हम उत्तर प्रदेश मे रहते है, राजस्थान वाले प्रोवाइडर से सर्विस ले सकते है?
हाँ हाँ क्यो नही, लेकिन काहे? पैसे ज्यादा आ गए है का? हर बार रोमिंग का पैसा भरना है का?
और भी सवाल है…तो भेज दीजिए….हम जवाब दे देंगे, इसी बहाने दूसरों का भी भला हो जाएगा। तो आते रहिए और पढते रहिए, आपका पसंदीदा ब्लॉग।

Logic of 111 | १११ का फंडा

Do u know the logic of 111 ? 11 – 1 – 11 ✓ Take ure birth year (last 2 digits) + current age +1 = 111. Its amazing !!

क्या आपको १११ का फंडा पता है? नही तो पढिए
आप अपने जन्म का साल लीजिए, आखिरी के दो अंक (उदाहरण : 68)
उसमे अपनी उम्र जोड़ दीजिए (उदाहरण : 42)
उसमे 1 अंक को जोड़ दीजिए (68+42+1)
आपका उत्तर 111 ही आएगा।

चाहे तो आप स्वयं ट्राई कर लीजिए। है ना मजेदार?