बहती नाक, खिसकती निक्कर

लगता है ये हफ़्ता, बचपन की यादें सप्ताह होकर रहेगा। बचपन की यादों मे जब भी गोते लगाओ, काफी मजा आता है। इसी बहाने वर्तमान की परेशानियों से कंही दूर हँसता खिलखिलाता बचपन याद करके हम तरोताजा हो उठते है। सच है कितना अच्छा था अपना बचपन। सभी लोगों की बचपन की कुछ खट्टी मीठी यादें होती है। आइए फिर से डूबते है उन कुछ बचपन की शरारतों भरी यादों में।

बचपन मे हमारी एक खास पहचान हुआ करती थी। बहती नाक और खिसकती निक्कर। नाक का क्या था कि जुकाम बहुत रहता था, ऐसा नही कि दवाई नही खाते थे, लेकिन वो क्या है कि दवाई के साथ साथ अगर आप भगवानदास का मक्कू (बर्फ़वाला गोला) खाओ, तो असर नही करता था। सुबह सवेरे हमारे दो ही काम हुआ करते थे, शिवकुमार की गरमागरम जलेबी और भगवानदास का मक्कू। आप कहेंगे इत्ते पैसे कहाँ से आते थे, नही जी, ये सब फ्री का जुगाड़ होता था।

शिवकुमार ( एक डील के तहत) हमको जलेबी इसलिए खिलाते थे कि ताकि हम उसके लड़के को मोहल्ले मे खेलने के लिए ना ले जाएं। और रही बात भगवानदास की। हम सभी टोली बनाकर उसकी दुकान पर खड़े हो जाते और खूब होहल्ला करते। इससे उसकी दुकानदारी खराब होती। झक मारकर भगवानदास ने भी डील की, अकेले हमको रोजाना एक प्याली फ्री मे मक्कू देगा। दोनो के लिए विन विन सिचुवेशन थी, भगवानदास पूरी टोली को फ्री मे मक्कू देने से बच गया और हमको फ्री मे मक्कू मिला, ये अलग बात है कि धीरु और टिल्लू हमारी मक्कू की प्याली को गिराने की फिराक मे लगे रहते थे। इस गरमागरम जलेबी और मक्कू के काम्बीनेशन ने हमे ढेर सारा जुकाम दिया। हमने भी इसको अपने तक नही रखा, सभी मे समान रुप से फैलाया। दोस्ती बराबरी मे होती है, ये क्या कि एक दोस्त को जुकाम और दूसरा साफ सुथरा घूमता रहे।

एक और शौंक हुआ करता था हम लोगों का। गोपाल टाकीज (अब शीशमहल, या बन्द हो गयी है शायद) मे फ्री में फिल्म देखने का। पहले पहले तो हम एक्जिट गेट के पास कान लगाकर, फिल्म की पूरी पूरी कहानी सुनते थे, दिखता तो कुछ था नही, लेकिन आवाज सब साफ साफ सुनाई देती थी। उसके बाद हम इसको ढंग से रट लेते और पूरे मोहल्ले मे बात फैला दी जाती कि हम ये वाली फिल्म देख आए। सभी संगी साथी पूरे फिल्मी इफेक्ट के साथ फिल्म की स्टोरी सुनते। इसके लिए बाकायदा डील होती, कैश, काइंड या वस्तु विनिमय सब चलता।

कहानी सुनाने मे भी अच्छी खासी महारत थी। कास्टिंग से लेकर राष्ट्रीय गान (पहले फिल्मों के आखिरी मे राष्ट्रीय गान हुआ करता था) तक हम पूरी कहानी ऐसे सुनाने मानो आंखो देखा हाल। फिल्मों के संवाद तो पहले से ही रटे हुए रहते(गेट से कान लगाकर सुनने के कारण) , अलबत्ता हम हीरो हिरोइन और सीन की लोकेशन मे कल्पनाशील हो जाते थे। हीरो ने कैसे कपड़े पहने थे, उनके बालो का स्टाइल कैसा था, (उम्र कम होने के कारण हीरोइन पर शारीरीक टीका टिप्पणी से बचा जाता), सीन मे बादल, फूल, पहाड़ और झरने कहाँ कहाँ पर फिल्माया गया, इत्यादि इत्यादि सब विस्तार से बताया जाता। इन सभी मे इत्ती फेंका फांकी चलती कि कभी कभी बहुत ओवर हो जाता। लेकिन हम डायरेक्टर प्रोडयूसर को लानते भेजते हुए, सारे इल्जाम उनके सर पर डाल देते। एक बार एक लड़के ने पैसे देने से मना कर दिया, बोला फिल्मों मे गाने भी होते है, वो भी सुनाओ तभी पैसे देंगे। मुझे याद है धीरु ने उसको सूत दिया था। लेकिन लड़के का प्वाइंट वैलिड था, हम तीन रुपए(2.90 पैसे) की टिकट वाली सिनेमा की स्टोरी, पचीस पैसे मे सुनाते थे, गाने सुनाना तो जरुरी था। सो भाई, अगली बार से गोपाल टाकीज के बाहर गानो की चौपतिया भी खरीदी गयी और रट रट कर बेसुरे स्वर में गाने सुनाए गए। एक दो बार बेसुरा सुनने के बाद लोगों ने गाने सुनने की फरमाइश बन्द कर दी।

अब इस कहानी सुनाने से जो पैसे इकट्ठे होते, उससे हम फिल्म देखते। फिल्म देखने की कहानी भी काफी अजीब है। हम लोग अक्सर इंटरवल के आसपास सिनेमा हॉल पर पहुँच जाते, कई लोग इंटरवल मे फिल्म छोड़कर चले जाते थे, उनसे हम फ्री मे कटिंग टिकट लेकर इंटरवल के बाद की फिल्म देखते। रही बात इंटरवल से पहले की, उसके लिए हम लोगों ने एक टार्चवाले मामू को सैट कर रखा था। वो हमको कभी इंटरवल के पहले, कभी बाद मे फिल्म दिखा देता था। लेकिन ये अक्सर घिसी पिटी सिनेमा (जब हॉल में सीटें खाली हों) के लिए ही वैलिड था।

कई फिल्मे एडल्ट हुआ करती थी, चेतना, बॉबी, सत्यम शिवम सुन्दरम और भी कई फिल्मे, हमको सिनेमा हॉल के अंदर घुसने नही दिया जाता। उस सूरत मे हमको मजबूरन अपनी बड़ी बहनों को, पैसे देकर, फिल्म की कहानी सुननी पड़ती। जिसमे हम बाद मे थोड़े मसाले डालकर अपने स्टोरी सुनाओ बिजिनेस मे इस्तेमाल कर लेते। एक बार एक लड़के ने पूछा एडल्ट फिल्म कैसे देखी, उसके लिए भी ढेरे सारी गोलीबाजी जैसे नकली मूँछ, बुरका वगैरहा जैसी झाम स्टोरी तैयार थी। कुछ भी कहो इस स्टोरी बिजिनेस मे अच्छा खासा कम चल रहा था। ये तो मार पड़े मेरे पार्टनर धीरु को जिसने अपोजिशन मे स्टोरी सुनाने की दुकान खोल ली। पचीस पैसे से स्टोरी सुनाने का रेट दस पैसे पर आ गया। धीरे धीरे ये धंधा भी खत्म हो गया। ये तो रही हमारी बचपन की फिल्मी स्टोरी सुनाने की कहानी, आपकी भी कोई कहानी जरुर रही होगी। सुनाना मत भूलिएगा। हम इंतजार कर रहे है। तो फिर आते रहिए पढते रहिए आपका पसंदीदा ब्लॉग।

बचपन के खुराफाती शौंक : 2

पिछली पोस्ट मे हमने बात की थी बचपन के खुराफाती शौंक डाक टिकटों के संग्रह की। वैसे तो डाक टिकटों के संग्रह मे अच्छे खासे पैसे खर्च हो चुके थे, लेकिन वो बचपन ही क्या जो नयी नयी चीजें ना ट्राई करे। बस जनाब थोड़े ही दिनो मे हमारा डाकटिकटों से जी ऊब गया। हम अब ज्यादा शरीफ हो गए थे, अब टिल्लू की डाकटिकटों से चोरी छिपे अदलाबदली भी बन्द कर दी थी। अब दोस्तों मे भी डाकटिकटों को लेकर कोई खास उत्साह नही था। क्योंकि अब हम कुछ नए शौंक ट्राई करने वाले थे।

माचिस की डिब्बियों के कवर

जी हाँ जैसे बच्चे डाकटिकट संग्रह करते है, हम माचिस की डिब्बियों के कवर संग्रह करने लगे थे। इसके दो कारण थे, अव्वल इसमे कोई इन्वेस्टमेंट नही था, कवर सड़कों पर पड़े मिल जाते थे। दूसरा इसमे फर्स्ट डे कार्ड का झंझट  भी नही था। बस जनाब नाई से लेकर पहरेदार, फेरीवाले से लेकर ड्राइवर। हर वो व्यक्ति जो धूम्रपान करता था, हमारा शिकार था। हम माचिस की डिब्बी के ऊपर का कवर बड़ी सफाई से गायब कर देते थे। किसी को कोई शिकायत भी नही थी, लोगों को माचिस की डिब्बी से काम था, ना कि उसके कवर से। हमारी देखा देखी मे मोहल्ले के बाकी सभी बच्चों ने भी ये शौंक अपनाया।

वो कहते है ना, बिना मेहनत के प्रसिद्दि नही मिलती।  हम बड़ी शान से नयी नयी माचिस डिब्बी के कवर दिखाते, अपना कॉलर (जो अक्सर नही होता था) बड़े गर्व से ऊपर करते। अलबत्ता इसके लिए मोहल्ले के हर कूड़ेदान की खाक छानी गयी थी।  इस संग्रह मे एक ही परेशानी हुआ करती थी शहर मे माचिस के  लिमिटेड ब्रांड ही मिला करते, इसलिए हमलोगो ने इसका इलाज ढूंढ लिया, हम चुन्नीगंज बस अड्डे जाते थे, वहाँ पर दूसरे शहरों से आयी बसों के आसपास कई नये नये माचिस के
कवर मिल जाते। लेकिन ये शौंक भी ज्यादा दिन नही चला। अगले शौंक मे बारी थी कन्चों की।

कंचे खेलने का शौंक
ये शौंक भी अजीब था। कंचे खरीदने और जीतने का जुनून इस कदर सवार था कि समय का पता ही नही चलता था। कंचे भी अलग अलग साइजों मे आते थे, टिइयां, सफेदा, डम्पोला और ना जाने क्या क्या देसी नाम रखे गए थे। अक्सर कोई एक कंचा लकी कंचा हुआ करता था। लेकिन अजीब बात ये थी कि ये लकी कंचा रोज बदल जाता था। गर्मिया शुरु होते ही इस शौंक को पर लग जाते। हम अपनी झोले जैसी निक्कर, बहती नाक के साथ कंचे खेलने निकल पड़ते। इस खेल मे लड़ाई बहुत होती थी, क्योंकि अक्सर लोग बेईमानी पर उतर आते थे। हाथापाई तो बहुत कॉमन बात हुआ करती थी। हमने इस शौंक के द्वारा अपना जुकाम सभी साथी खिलाड़ियों को ट्रांसफर किया था। इस शौंक ने हमे मोहल्ले की कई नालियों मे हाथ डालने के लिए प्रेरित किया था। हमारे मोहल्ले के मेनहोल की सफाई वाले कर्मचारी महीने महीने आते थे, वे जब भी मेनहोल की सफाई करते तो हमारे लिए ढेरों कंचे निकालते। लेकिन ये शौंक भी ज्यादा दिन नही टिक सका।

शतरंज खेलने का शौंक
जब हम सभी बच्चे कंचो मे कुछ अधिक ही इन्वाल्व होने लगे तो बड़े बूढो ने हमे शतरंज मे उलझाया। वैसे तो शतरंज बूढो का खेल था, वे लोग चबूतरों पर अक्सर ये खेलते रहते। लेकिन जिस दिन हमे इसकी लत लगी, उस दिन सब कुछ बदल गया। गर्मिया शुरु होते ही चबूतरों पर शतरंज की बाजिया बिछने लगती। आपस मे लोग शर्त लगाकर खेलने लगे। शतरंज खेलने का शौंक काफी दिन तक चला। ये शौंक इतना परवान चढा कि हम मोहल्ला, डिस्ट्रिक्ट, यूनीवर्सिटी लेवेल तक खेले। पहले हम इंडियन स्टाइल मे खेलते थे, इसमे नियम कायदे कानून सब देसी हुआ करते थे, ये करो, वो ना करो, वगैरहा वगैरहा। लेकिन बाद मे हम इंटरनैशनल स्टाइल पर शिफ्ट हो गए। एक दिन के के शुक्ला जी, जो ज्वालादेवी स्कूल के पास रहते थे, और चैस क्लब चलाते थे, एक दिन हमे खेलते हुए देखे, बोले तुम हमारे क्लब मे खेलो। उन्होने मुझे शतरंज के इतने गुर सिखाए कि हम चैम्पियन बन गए, शहर मे हमारी रैंकिग तीसरे नम्बर तक पहुँची। आज भी हम शतरंज खेलते है, ये अलग बात है कि अब हम टूर्नामेंट नही खेलते। क्या कहा, मेरे से शतरंज खेलना है, तो आओ ना आईबिबो (Ibibo) पर खेलो, हम अक्सर उधर खेलते है।

तो भाई ये तो रहे हमारे खुराफाती शौंक, आपके भी बचपन के कुछ शौंक रहे होंगे। तो आप टिप्पणी के माध्यम से अपने शौंकों के बारे मे बताओ।

टिप्पणी अपडेट :
पिछली बार ईस्वामी की टिप्पणी मे था,

हिंदुस्तान में घरों के बाहर मेलबाक्स? इहां तो डाकिये दरवाजे के नीचे से चिट्ठी सरका देते थे.

उस जमाने मे मेलबॉक्स? अरे हाँ भाई, हमारे इलाके मे प्रिंटिग प्रेस, प्राइमरी स्कूल भर भर के हुआ करते थे। कुछ न्यूजएजेंसी के ऑफिस भी हुआ करते थे। एक ग्रंथम गाइड छपती थी(है), उसका ऑफिस भी उधर ही हुआ करता था। ये सभी पढे लिखे लोग थे, सबने अपने अपने मेलबॉक्स ऑफिस के बाहर लगाए हुए थे। इनकी देखादेखी मे (जैसा कि अक्सर होता है) कुछ पढेलिखे  परिवारों ने भी देसी तरीके से बना हुआ मेलबाक्स घर के बाहर लगाना शुरु किया था। बाकी दरवाजे के नीचे से सरकायी हुई चिट्ठियां तो हम लकड़ी की डंडी से वापस बाहर सरका लिया करते थे।

नोट: सर्वर समस्या के कारण यह लेख पुन:प्रकाशित किया जा रहा है। टिप्पणी दोबारा करने का कष्ट करें, अति कृपा होगी।

बचपन के खुराफाती शौंक : 1

हम सभी ने बचपन मे ढेर सारी शरारतें की होंगी, अब चिट्ठाकार है तो निसंदेह बचपन(अभी भी कौन से कम है) मे खुराफाती रहे ही होंगे। नयी नयी चीजें ट्राई करना और नए नए शौंक पालना किसे नही पसन्द? तो आइए जनाब आज बात करते है बचपन के कुछ खुराफाती शौंक की। इसी बहाने हम सभी अपने अपने बचपन मे ताक झांक कर लेंगे।

अब आप हमारे बचपने के मित्रों के बारे मे जानते ही होंगे। धीरु और टिल्लू, ये दोनो हमारे दाहिने और बांए हाथ हुआ करते थे। जो भी हम शरारतें करते थे, इसकी सजा इन्ही को मिलती थी, अब भाई दोस्तों के लिए कुछ तो कष्ट सहना ही पड़ता है। बचपन मे हम लोगो ने ढेर सारे शौंक पाले थे, एक एक करके उनके बारे मे बताते है।

डाकटिकटों का संग्रह
ये शौंक अक्सर सभी बच्चों मे पाया जाता है। अब पुराने जमाने मे चिट्ठियों का बहुत चलन था, इसलिए डाक टिकटों का संग्रह कोई महंगा शौंक नही था। पहले पहल तो हमने अपने घर मे आने वाले सारे पत्रों की डाक टिकटों का संग्रह करना शुरु किया। हम पत्रों को पाते ही, सफाई से उसकी डाक टिकट निकाल लिया करते थे, धीरे धीरे हमे डाक टिकट निकालने मे अच्छी खासी काफी महारत हासिल होने लगी। सबसे पहले हमने रामादीन पोस्टमैन को मोहरा बनाया। बस ठाकुर के होटल पर बिठाकर एक कटिंग चाय पिलाने मे काम बन जाता था। जब तक रामादीन चाचा चाय और समोसे पर हाथ साफ़ करते , हम लोग डाकटिकटों पर हाथ साफ कर देते।

थोड़े दिनो मे रामादीन ने भी डिमांड करनी शुरु कर दी , बोले कटिंग चाय और बांसी समोसे से काम नही चलेगा, बोले आधा पाव दूध वाली चाय और मिठाई खिलाओ। हम लोगों ने कास्ट बेनिफिट एनालिसिस किया, और यह निश्चय किया कि हम रामादीन की वामपंथियो टाइप ब्लैकमेलिंग के आगे नही झुकेंगे और कांग्रेस की तरह अपने बलबूते मैदान मे उतरेंगे। इस तरह से हम लोगों ने, आत्मनिर्भर होकर मोहल्ले की चिट्ठियों को निशाना बनाना शुरु कर दिया।

हमारे लिए घर के बाहर लगे चिट्ठी वाले डाक बक्से खोलना भी कोई बड़ी बात नही रही थी। अब वो ज्ञान ही क्या जो अपना प्रकाश दूर दूर तक ना फैलाए, सो इस सूक्ति को चरितार्थ करते हुए हमने अपनी इस महारत को गली मौहल्ले के बच्चों तक पहुँचाया। लोगों को अब पत्र बिना डाक टिकट के मिलने लगे थे, पहले पहल तो लोगों को पता ही नही चलता, लेकिन धीरे धीरे कुछ शक्की लोगों ने हम लोगों की निगरानी शुरु कर दी थी। एक दो बार पकड़े भी गए, सूते भी गए, अब वो शौंक ही क्या, जो दबाने से दब जाए। हमारा यह शौंक जारी रहा, धीरे धीरे लोगों ने डाक टिकटों की परवाह करनी छोड़ दी।

अगली समस्या थी संग्रह करने की। हम लोग एक डब्बे मे डाक टिकटे संग्रहित करते, लेकिन टिल्लू और मैने एक दूसरे पर चोरी का इल्जाम लगाया। जो कि काफी हद तक सही इल्जाम था। काफी मुहाँचाई और हाथापाई के बाद नतीजा निकला कि हम लोग अपनी अपनी स्कूल की किताबों और कापियों मे टिकट सम्भालकर रखेंगे। थोड़े दिनो तक तो हम किताबों के अन्दर ही डाकटिकट संग्रहित कर लेते थे, लेकिन परेशानी ये होती थी, स्कूल मे दोस्त यार डाकटिकट छुवा देते, अब हमारी मेहनत पर कोई हाथ साफ करे, ऐसा कैसे हो सकता था। सो हम लोगों ने डाक टिकट संग्रह करने के लिए एक फाइल खरीदने का निश्चय किया। अब ये शौंक महंगा लगने लगा था।
डाकटिकटों का संग्रह

डाकटिकटों का संग्रह

चित्र सौजन्य से : शाह बुक कम्पनी

अपने शौंक को और बेहतर बनाने के लिए हम हैड पोस्ट ऑफिस वाले पोस्टमास्टर से मिले, उसने हमको और नयी नयी कहानी समझा दी। बोला इस तरह का डाक टिकट संग्रह कुछ मायने नही रखता, तुम लोग फर्स्ट डे स्टैम्प का संग्रह करो, यानि जिस भी दिन कोई नयी डाक टिकट जारी हो (वैसे भी भारत मे इतने राजनेता वगैरहा है, किसी ना किसी की जन्म, मृत्यू या कोई एचीवमेंट डे अक्सर हर दिन होता ही रहता है।) पोस्ट ऑफिस मे आओ, फर्स्ट डे स्टैम्प कार्ड खरीदो, डाक टिकट लगाओ,स्टैम्प लगवाओ और उसको संग्रहित करो। मामला खर्चीला था, लेकिन अब क्या करें, जानकारी कम थी, इसलिए इनकी नसीहत को भी अपनाना पड़ा।

धीरे धीरे देशी डाकटिकटो से मन भर गया तो हम विदेशी चिट्ठियों की डाक टिकटों पर हाथ साफ़ करने लगे। उस जमाने मे सोवियत संघ से किताबे आया करती थी, उस पर डाकटिकट हुआ करते थे। हम लोग वो डाकटिकट छुवा दिया करते थे। फिर एक दिन पता चला कि किदवई नगर मे एक दुकानदार बाकायदा विदेशी डाकटिकटों की बिक्री करता है। ब्रिटेन, रोमानिया, हंगरी, नामिबिया और ना जाने कौन कौन से देशों की नयी नयी डाकटिकटे देखने को मिली। हमने जब उसके सोर्स के बारे मे जाँच पड़ताल की तो हमे पता चला कि वो जनाब विदेशी डाकटिकटों की रिप्रिंटिग करके बेचते थे। चोर को मिले मोर, हम लोग हर हफ़्ते(जिस दिन जेबखर्च मिलता था) किदवई नगर जाकर, डाक टिकट खरीदेते, खरीदते क्या जी, चार खरीदते और आठ चुपचाप गायब कर लाते। इस तरह से चोर के घर चोरी का सिलसिला शुरु हुआ। धीरे धीरे दुकानदार को हम पर शक होने लगा और उसने हम लोगों की दुकान मे इंट्री ही बैन कर दी। अब वो खुद चोरी करता था तो सही था, हम लोग करते थे तो गलत, ये कहाँ का इन्साफ़ है। सही कहते है, चोर वही होता है जो पकड़ा जाता है।

अब हमारी जेबखर्च का आधा हिस्सा कामिक्स मे और बाकी का हिस्सा डाक टिकटों मे खर्च (ईमानदारी से खरीदने में) होने लगा।हर महीने हमारा व्यक्तिगत बजट डेफिसिट बढ रहा था। धीरे धीए हम भी अब डाकटिकटों से ऊब चुके थे। क्योंकि अब हम कुछ नयी चीजें संग्रहित करने वाले थे। इसका मतलब अगली खुराफात? जी हाँ, वो खुराफात थी…….. नही नही ऐसे नही बताएंगे, अगली पोस्ट मे लिखेंगे। तो भैया आते रहिए और पढते रहिए आपका पसंदीदा ब्लॉग। आप अपनी बचपन की डाकटिकटों के संग्रह वाली कहानी छापना मत भूलना। पहले टिप्पणी लिखो, फिर पोस्ट मे लिखकर बताना।

नोट: यह सर्वर समस्या के कारण लेख को पुन:प्रकाशित किया गया है। टिप्पणियां दोबारा करें, अति कृपा होगी।

जरुरी सूचना : होस्टिंग सर्वर की समस्या

साथियों,
मेरे होस्ट, जिस पर मेरा पन्ना साइट होस्टेड है, के हार्डवेयर मे कुछ दिक्कत आ गयी थी। इसी कारण साइट  दो दिन डाउन रही। अब होस्ट ने साइट तो चालू कर दी है, लेकिन बैकअप कुछ पुराना है। नतीजा ये हुआ कि बचपन सीरीज के पिछले तीनो लेख गायब हो गए। साथ ही आप सभी की प्यारी प्यारी टिप्पणियां भी।

हम तुरन्त गूगल बाबा की शरण मे गए तो हमे लेख तो वापस मिल गए, लेकिन टिप्पणियां नही मिल सकी। टिप्पणियों के लिए भी एक जुगाड़ है, मै अपने जीमेल एकाउंट मे ढूंढता हूँ, काफी टिप्पणियां तो उधर मिल जाएगी।

इसी कारण तीनों लेखों को आज या कल की तारीख मे पुन:प्रकाशित किया जाएगा। आपको हुई असुविधा के लिए खेद है।

रीठेल : मोहल्ले का प्रेम प्रसंग

अब जब रीठेल का मौसम चल ही रहा है तो हमने भी बहती गंगा मे हाथ धोना सही समझा। लीजिए पेश है, चार साल पूर्व (नवम्बर 2004) लिखा हुआ मेरे एक लेख का रीठेल। अब आप इसे मौके की नजाकत कहिए या समय की मांग, बढते ब्लॉगरों और घटते ब्लॉगिंग समय के कारण, अब रीठेल जरुरी हो गया है। तो जनाब आज हम आपको रुबरु कराने जा रहे है, हम अपने मोहल्ले के एक प्रेम प्रसंग से। ऐसे प्रेम प्रसंग हर मोहल्ले मे होते है, लेकिन हर मोहल्ले मे हमारे जैसे शैतान बच्चे नही हुआ करते थे। आप भी देखिए और पढिए हमारे बचपन की शैतानियों से भरे इस मोहल्ले के प्रेम प्रसंग को। वैसे तो इस प्रेम प्रसंग के सभी पात्र वास्तविक है, अलबत्ता हमने उनके नाम बदल दिए है, ताकि हमे जूते ना पड़े, फिर भी आप इसे मस्ती के लिए पढिए, इवेस्टीगेशन के लिए नही। आपकी टिप्पणियों का इंतजार रहेगा।

अब जब मित्रो ने इतना इसरार किया है तो हमने सोचा कि चलो वर्मा जी की फैमिली की दास्तान लिख दी जाय. अब यहाँ पर ऐसे कई अनकहे किस्से बयां होंगे और ऐसे कई खुलासे होंगे जिससे वर्मा जी नाराज हो सकते है, अब वर्माजी नाराज होते है तो होते रहें, लेकिन हम अपने पाठको को थोड़े ही नाराज कर सकते है.

हाँ तो जनाब, हमारे मोहल्ले मे रहता था वर्माजी का परिवार, परिवार मे कुल जमा पाँच लोग थे, वर्माजी, वर्माइन,बड़की वर्माजी की बड़ी लड़की, छुटकी वर्मा जी की छोटी बिटिया और वर्माजी का साला…….. नाम मेरे को याद नही.साले साहब(अभी रिफ्ररेन्स के लिये इनका नाम हम बउवा रख देते है,आगे कभी सही नाम पता चलेगा तो करैक्ट कर लेंगे), पूरे मोहल्ले मे साले साहब के नाम से ही मशहूर थे,क्यो? अब मेरे से क्यों पूछते हो, मोहल्ले के रामआधार हलवाई से पूछो, या फिर नत्थू पनवाड़ी से, या फिर किराने वाले गुप्ताजी से जहाँ से साले साहब माफ कीजियेगा बउवा, सामान तो ले आते थे, पैसे देने के नाम पर वर्मा जी का नाम टिकाए आते थे. बउवा की हरकतों से वर्माजी तो बहुत परेशान थे मगर रिश्ता ऐसा था कि कुछ कहते नही बनता था.

साले साहब के मशहूर होने के और भी कई कारण थे….एक घटना हुई की पूरा का पूरा मोहल्ला साले साहब को नही भूल पाया……..

बउवा शहर आने से पहले तक गांव मे ही टंगे हुए थे, वहाँ पर भी वो कोई तीर नही मार रहे थे. बाकायदा गाँव की लड़कियो को छेड़ा करते थे, कई बार पिट चुके थे, गाँव वालो ने अपनी बहू बेटियों को सख्त हिदायत दे रखी थी, कि इस बन्दे के आसपास भी ना फटके……अगर ये बंदा उनके रास्ते मे आए, तो रास्ता ही बदल दें…….और तो और गांव वालो ने बउवा की हरकतों के कारण इनके परिवार का हुक्का पानी बन्द कर रखा था, तो परिवार वालो ने सोचा कि अब इन्हे कहाँ ठिकाने लगाया जाय, सो खूब सोच विचार कर वर्माइन को चिट्ठी लिखी गयी, वर्माइन जो जैसा कि अक्सर होता है, अपने गांव मे पहले ही ढेर सारी ढींगे हाँक चुकी थी, कि शहर मे हमारा ये है, वो है वगैरहा वगैरहा. जब उनको चिटठी मिली तो एकदम सकपका गयी, वो अपने भाई की हरकते जानती थी, और जानती थी, अगर बउवा शहर मे आ गया तो अखबार मे नाम छपना तो तय है.

लेकिन अब करें क्या वर्मा जी को कैसे पटाया जाय. आखिर उनको आइडिया मिल ही गया.शाम भयी, वर्मा साहब किसी तरह से अपने खटारा लम्ब्रेटा को खींचते खांचते या कहो धकियाते हुए घर पहुँचे, वर्माइन ने मिल कर स्कूटर चबूतरे पर चढवायी, चाय का पानी रखा, और वर्माजी को मोहल्ले की अधपकी खबरें सुनाना शुरू कर दी, कुछ सच्ची कुछ मसाला मारकर………जैसे इसका चक्कर उससे, इसका आना जाना उसके घर वगैरहा वगैरहा.कुल मिलाकर सार ये था कि जमाना खराब है, लड़किया जवान हो रही है, आप दिन भर आफिस मे रहते हो , मै अपने काम काज मे, लड़कियों की देखभाल करने वाला कोई नही वगैरहा वगैरहा. वर्माजी समझ तो गये ही थे, दाल मे कुछ काला जरूर है, फिर भी अनजान बने रहने का ढोंग करते रहे, वर्माइन ने बात आगे बढायी और क्यो ना मै अपने भाई बउवा को शहर बुलवा लें.

बउवा का नाम सुनते ही वर्मासाहब की त्योरियां चढ गयी, दिमाग सातवें आसमान पर पहुँच गया, बोले यह नामुमकिन है, वो नालायक….वर्माजी बउवा को इसी नाम से पुकारते थे.. यहाँ नही रह सकता…….गांव मे क्या कम बदनाम है जो यहाँ बुलाकर अपनी भद पिटवायी जाय… लेकिन वर्माइन थी कि अड़ गयी तो अड़ गयी…….. .अब औरतजात के आगे हम अबला मर्दो की कहाँ चलती है, दो चार दिन मे ही वर्माजी को हथियार ड़ाल देने पड़ गये. सो बऊवा शहर पधारे.अब आप कहेंगे कि इतनी सारी कथा करने की क्या जरूरत थी, ये बात तो दो लाइनो मे कही जा सकती थी. नही समझे ना? अरे भइया अगर ये बात अगर हमे दो लाइनो मे कह देते तो फिर अगला पूरा पैराग्राफ बऊवा के चरित्र चित्रण मे ना झिलाते? उस से तो आप बच गये ना. अब बचने बचाने की छोड़ो, आगे पढो

अब जब बउवा कानपुर पधारे तो सबसे पहले उनका सामना हमीं से ही हुआ, हुआ यूँ कि हमे मोहल्ले के सारे लड़के सड़क पर खेल रहे थे, हमने देखा गांव के एक जनाब जो कि रात के समय भी काला चश्मा पहने, बालों मे चमेली का तेल, कोई घटिया सा इत्र लगाये, रंग बिरंगी शर्ट, ऊपर से अंगोछा लपेटे, बिना मैचिंग का बैलबाटम,हाथ मे टिन की अटैची लिये, हमारे ग्रुप से वर्मा जी पता पूछने लगे, वैसे वर्माजी के रिलेशन मोहल्ले मे सबसे अच्छे थे लेकिन वो वानर सेना वाला किस्सा होने के बाद, हम मोहल्ले के लड़को मे उनकी रेप्यूटेशन कोई खास अच्छी नही थी, हमने सोचा चलो, वर्मा ना सही,उसका साला सही, बैठे बिठाये मौका मिल गया,कुछ तो हिसाब किताब चुकता किया जाय, हमने इन जनाब से पूरी कहानी समझी,वर्मा परिवार से बऊवा की रिलेशनशिप समझी,शहर आने का अभिप्राय समझा और फिर तुरत फुरत बनी योजना अनुसार इनको मोहल्ले के कल्लू पहलवान के घर का पता बता दिया……….कल्लू पहलवान की भी कुछ अजीब दास्तां है.

कल्लू की पहली पत्नी स्वर्ग सिधार गयी थी, तो कल्लू ने दूसरी शादी की, अपने से आधी से भी कम उम्र की लड़की से, अच्छे घर की लड़की तो मिली नही, पता नही कहाँ से उठा लाया था……….लेकिन आइटम सालिड था….लैटेस्ट माडल था……लेकिन शादी बेमेल थी…….सुना था लड़की ने शादी घरवालो के दबाव मे आकर की है. लड़की,लड़की को कल्लू कतई पसन्द नही था,कल्लू के सामने तो उसकी बेटी जैसी दिखती थी……..लड़की चुलबुली थी, मन नटखट और दिल शरारती….ऊपर से जवान खून……लड़की का सारा टाइम खिड़की पर ही बीतता… घन्टो घन्टो वहीं खड़ी रहती, और हर आने जाने वालो को हसरत भरी निगाहो से देखती,अब हम लोग क्यो कहे कि चरित्रहीन थी कि नही…….. लेकिन मार पड़े इन मोहल्लेवाले को जो कहते थे कि लड़की का चालचलन कुछ ठीक नही था……हम तो बस आप लोगो को स्टोरी सुना रहे है, किसी का चरित्रहनन थोड़े ही कर रहे है………

खैर जनाब लोगो को तो जैसे मनोरंजन का साधन मिल गया, हमारे मोहल्ले मे दूसरे मोहल्लो के लोगो की आवाजाही बढ गयी, बात कल्लू तक पहुँची,खूब मार कुटाई, हुई, रोना धोना हुआ, आखिरकार साल्यूशन के रूप मे कल्लू ने खिड़की चुनवा दी.

अब वो इश्क ही क्या जो दीवारो मे चुनवाया जा सकें, अब जब रोक लगी तो बात हद से पार होने लगी, कुछ मनचले,जिनकी सैटिंग खिड़की बन्द होने से पहले ही हो चुकी थी………कल्लू की बीबी का दीदार पाने के लिये, हिम्मत करके कल्लू के घर तक मे घुसे……. लोगो मे रोजाना चर्चा रहती थी कि, आज कौन कल्लू के घर कौन घुसा, और कितनी देर रहा.

अब मे यहाँ कल्लू पुराण तो लिखने बैठा नही हूँ, सो कल्लू वाला किस्सा जल्दी समेटते है, तो जनाब एक बार कल्लू ने एक बन्दे को अपने घर मे रंगे हाथो (….मुझे आज तक इस मुहावरे का सही अर्थ नही समझ मे आया… ये जरुरी काम काज के बीच मे रंगाई पुताई कहाँ से आ गयी) पकड़ लिया और फिर क्या था, वो बन्दा,कल्लू और उसका लट्ठ,कल्लू ने अपने तेल पिलाये लट्ठ को दे दना दे दना दन इस्तेमाल किया… तब से कल्लू बड़ा सावधान रहने लगा, और अपने घर की पूरी तरह से रखवाली रखता है.अपने घर मे घुसने वाले बन्दे को बख्शता नही है.शाम का वक्त था…कल्लू कुछ सामान लेने गुप्ता जी की दुकान पर गया हुआ था, तभी हमने बउवा को तुरत फुरत बनी योजनानुसार कल्लू के घर का पता बताया था.

अब बउवा बेचारा,गाँव का भोला भाला जवान, नासमझ(?#*%), वर्मा के दुश्मनो की साजिश मे फंस गया….. उसे क्या पता कि मुसीबत उसका इन्तजार कर रही है, वो तो बेचारा अपनी बहन का घर सोच कर अन्दर दाखिल हुआ, अटैची नीचे जमीन पर रखी, उसको खोला, बहन के लिये लायी साड़ी निकाली, शायद मन मे बहन को सरप्राइज देने की सोची होगी…….और देसी इत्र का फाहा अपने कानो के पीछे लगाया और काफी सारा अपने कपड़ो पर उड़ेला,ताकि पसीने की बदबू किसी को ना आये और दरवाजा खटखटा दिया….सामने थी कल्लू पहलवान की बीबी…दोनो की नजरे मिली, दोनो ने एक दूसरे को देखा…..लव एट फर्स्ट साइट, बउवा समझा कि जीजी ने कौनो किरायेदार रखा है,सो अन्दर दाखिल हो गया… कल्लू की बीबी पर तो इत्र ने पहले से ही जादू कर रखा था…ऊपर से साड़ी हाथ मे लिये बांका गबरू जवान , सोची खुद चलकर आया है….चलो ये ही ठीक है…..जब तक कल्लू नही आता इसी को समझा जाय……..वैसे भी कल्लू के जल्दी आने की उम्मीद नही थी………. इधर वानर सेना ने गुप्ताजी की दुकान पर जहाँ कल्लू खड़ा था, उड़ती उड़ती खबर पहुचा दी कि कल्लू के घर आधे घन्टे पहले कोई घुसा है.

बस फिर क्या था…आगे आगे आगबबूला कल्लू, पीछे पीछे पूरी वानर सेना……रास्ते भर हम लोग कल्लू को अन्दर घुसने वाले व्यक्ति के कद काठी और वेषभूषा के बारे मे पूरी तरह से बता दिये…………………….. अब कल्लू अपने घर के दरवाजे पहुँच गया था… हम लोग भी किसी विस्फोटक घटना का इन्तजार कर रहे थे……….अन्दर का हाल भी सुन लीजिये……अब तक दोनो ही समझ चुके थे कि रांग नम्बर डायल हो चुका है, लेकिन दोनो ही अपनी अपनी आदत से मजबूर थे…. चोर चोरी से जाय हेराफेरी से ना जाय…..बउवा सोचे कि गांव की तरह शहर मे भी लाटरी लग गयी उसकी और कल्लू की बीबी भी सोची दिखने मे गंवार है तो क्या हुआ…..कोई जरूरी थोड़ी है कि हर चीज मे गंवार हो……….. अभी कुछ होने ही वाला था कि बाहर खड़े कल्लू ने दरवाजा भड़भड़ाया……भड़भड़ाने की आवाज से ही कल्लू की बीबी समझ चुकी थी…….. ये कल्लू ही है, उसने बउवा की ओर देखा…वो भी समझ गया.. खाया पिया कुछ नही गिलास तोड़ा बारह आना …………. लेकिन अब करे तो क्या करे….कल्लू की बीबी ने कुछ समझदारी दिखायी और बउवा को अन्धेरी कोठरिया मे रखे बिस्तरों के पीछे छुपा दिया,अब कहते है ना कि विनाशकाले विपरीत बुद्दि…दरअसल कल्लू का लट्ठ भी बिस्तरों के पीछे ही रहता था.. और फिर अपना आंचल सम्भालकर, घबराते हुए दरवाजा खोला………. दरवाजा खोलकर देखा तो बाहर आगबबूला कल्लू पहलवान साथ मे वानर सेना…कल्लू ने पूछा….कहाँ छुपा रखा है अपने चाहने x#$%!%& वाले को………………कुछ नही बोली………………. कमरे मे इत्र की सुगन्ध और टेबिल पर रखी साड़ी, पूरी बात बयां कर रही थी……………………कल्लू ने इधर उधर ढूंढना शूरू कर दिया……..कल्लू की बीबी को मानो सांप सूंघ गया……समझ गयी, कि बचना मुश्किल है, दिमाग लड़ाया और तुरन्त फुरन्त पाला बदला, फूट फूट कर रोने लगी और कल्लू के गले से लिपट गयी…….. कल्लू ने गरजकर फिर पूछा “कहाँ है वो?” तो उसने सिसकते हुए अन्धेरी कोठरिया मे रखे बिस्तरो की और इशारा कर दिया.

इधर बउवा का हाल पूछा तो ……….बउवा की हालत तो उस बकरे की तरह से थी जिसको अभी थोड़ी ही देर मे हलाल होना था.कल्लू ने सबसे पहले अपने लट्ठ को ढूंढा और अपने कब्जे मे किया… फिर बिस्तरो को हटाना शुरू कर दिया …………….तो पाया कि अपने बउवा सिमटे से, सहमे से खड़े है, कल्लू ने फिर गिना नही दे दनी दन, दे दनी दन…. वो पिटाई की बउवा की, कि हम क्या बतायें……….. बउवा जब तक अपना परिचय देता, तब तक तो अनगिनत लट्ठ पड़ ही चुके थे….उसके बाद भी, वो इत्र और साड़ी का एक्सप्लेनेशन नही दे पा रहा था… …….पहले तो कल्लू ने उसे खूब कूटा उसके बाद वानर सेना भी इस नेक काम मे पीछे नही रही………हमने भी पूरी तरह से समाज सेवा की…..बात अब तक मोहल्ले मे पहुँच चुकी थी… कि कोई एक बन्दा जम के कूटा जा रहा है, कल्लू पहलवान के घर……..

पूरे मोहल्ले मे हाहाकार मच गया…….जिसके हाथ जो लगा, उठाकर पीटने निकल पड़ा . वर्माजी भी अपने मित्र के साथ देखने चले आये……..क्यो? अरे कोई मनाही थोड़ी थी… दुनिया जा रही थी तो वर्माजी क्यों पीछे रहते…..मोहल्ले वालो के साथ साथ वर्मा ने भी दो चार हाथ मारकर अपना पड़ोसी धर्म निभाया……..अब तक बउवा पिट पिटकर अधमरे हो चुके थे……फिर पकड़कर बउवा को रोशनी मे ले जाया गया….ताकि पहचान तो हो सके…………..रोशनी मे बउवा ने अपने जीजा और जीजा ने अपने साले को पहचान लिया……पूरा भरत मिलाप हुआ…….

वैसे वर्माजी मन ही मन खुशी हुई कि बउवा को पीटकर अपनी बरसों पुरानी इच्छा को पूरा भी कर लिया था और इल्जाम भी नही लगा………जो लोग बउवा को मार रहे थे, अब उसके कपड़े ठीक करने लगे…. कुछ लोग थू थू कर अपने घर को लौट गये…….बाकी लोगो को कल्लू और वर्मा ने मिलकर विदा किया या कहो भगाया…….. … …बउवा से पूरी कहानी सुनी…….. समझ गये कि मोहल्ले के लड़को ने चिकायीबाजी की है, खैर अब क्या हो सकता था… कल्लू ने बउवा से माफी मांगी….बउवा के जख्मो पर मलहम लगायी……..बउवा और कल्लू की बीबी की पहली मुलाकात सटीक रही…, दोनो के मन मे कुछ कुछ होने लगा था, दोनो पहली मुलाकात मे एक दूसरे को दिल दे बैठे…………

बउवा अपने जख्मो को सहला सहलाकर सिसक रहा था, पहलवान शर्मिन्दा था…. उसकी बीबी मन ही मन मुस्करा रही थी.. कि मोहल्ले मे ही सैटिंग हो गयी, और वर्मा जी, वो क्या करते बेचारे, बउवा को हाथ पकड़, या कहो सहारा देकर अपने घर की ओर प्रस्थान कर गये….. प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि बउवा और पहलवान की बीबी एक दूसरे को कनखियो से देखे जा रहे थे. और वानर सेना? आप क्या समझते है, हमे लोग पिटने के लिये मोहल्ले मे रहते….हम भी निकल लिये पतली गली से…………हमारा बदला तो पूरा हो ही चुका था.

जनाब ये तो थी, मोहल्ले के प्रेम प्रसंग का पहला भाग। अब इस लेख को लिखने के बाद से पाठकों ने हम पर दबाव बनाया और जानना चाहा कि
बऊवा की फिर पिटाई हुई कि नही?
बऊवा के प्रेम प्रसंग का क्या हुआ?
क्या वर्माजी पूरी बात जानने के बाद चुप बैठे?

आपके इन्ही सभी सवालों को जानने के लिए लेख का अगला भाग बऊआ पुराण के नाम से लिखा गया है। उसको भी जरुर देखें। आपको ये लेख कैसा लगा, मजा आया कि नही, टिप्पणी मे लिखना मत भूलिएगा।

भला उसका समर्थनपत्र मेरे समर्थनपत्र के पहले कैसे?

कांग्रेस गठबंधन के चुनाव जीतने के बाद, अभी भी उसे बहुमत की मैजिक संख्या 272 के करीब पहुँचने के लिए लगभग 10 सांसदों की जरुरत होगी। लेकिन सभी मौकापरस्त पार्टियों मे होड़ लगी है कि कौन अपना समर्थन पत्र कांग्रेस आलाकमान को पहले भेजता है। सपा हो या बसपा, जनतादल(देवगौड़ा) हो या अजीत सिंह की पार्टी, सभी मुँह उठाकर, दस जनपथ की तरफ़ निकल पड़े है। सभी दल आजकल एक ही गाना गा रहे है:

तुम अगर मुझको ना चाहो तो कोई बात नही
तुम किसी और को चाहोगी, तो मुश्किल होगी….

सबकी अपनी अपनी मजबूरिया है। बसपा सुप्रीमो के साथ मजबूरी ये है कि उनके खिलाफ सीबीआई ने ताज कॉरीडोर मामले मे केस चला रखे है, इसलिए उनको समर्थन का पत्र देना मजबूरी है। हालांकि बहिनजी जानती है कि अब पत्र देने से कुछ नही होने वाला। चुनाव पूर्व गठबंधन होता तो कोई बात होती।

सपा के अमरसिंह, वो तो हमेशा समर्थनपत्र जेब मे रखकर घूमते है। जिनसे भी इनका पंगा होता है, वो इनके बड़े भाई/बहन होते है। बस किसी तरह से कांग्रेस आलाकमान मान जाए। सपा वाले तो इतने आतुर है कि जयाप्रदा ने तो इन्टरव्यू मे ही कह डाला, कि वो मंत्री बनने के लिए तैयार है। मोहतरमा रुकिए, अभी मैडम ने हाँ नही की है, इसलिए सब्र रखिए। तब तक आजम भाई को राखी वाखी बांधने का प्रोग्राम क्यों नही बनाती।

अजीत सिंह, ये सत्ता के बिना नही रह सकते। इन्होने चुनाव बीजेपी के साथ लड़ा था। लेकिन इनकी कोई विचारधारा नही, जो सत्ता मे रहता है, अजीत सिंह उसी के साथ नजर आते है। कांग्रेस ने वक्त की नजाकत समझते हुए, इनके सामने पासा फेंका है कि अपनी पार्टी का कांग्रेस मे विलय करो। अजीत सिंह अभी ऑफर को नापतौल रहे है, उम्मीद है मान जाएंगे।

देवगौड़ा और कुमारस्वामी को भी कर्नाटक मे बीजेपी से सुरक्षा चाहिए, अब चूंकि प्रतिद्वंदी का प्रतिद्वंदी  दोस्त होता है, इस लिहाज से कांग्रेस उनकी दोस्त हुई। ये तीसरे मोर्चे मे थे, पिताजी (देवगौड़ा )तीसरे मोर्चे मे सबसे साथ हाथ उठाकर, एकता दिखा रहे थे, पुत्र (कुमारस्वामी)सबसे पहले, मुँह छिपाते हुए दस जनपथ हो आए थे। गोटियां फिट हो चुकी है, इनका काम भी बन जाएगा। मंत्रालय मिलेगा या नही पक्का नही।

लेकिन कांग्रेस इस बार सजग है, बड़े दलों से समर्थन लेने से अच्छा है छोटे छोटे दलों को कांग्रेस मे विलय कराया जाए। लेकिन यदि बड़े दल जैसे सपा, बसपा, बीजेडी, जेडीयू वगैरहा समर्थन देते है राज्यसभा में कांग्रेस की राह आसान हो जाएगी, जहाँ वो अभी बहुमत मे नही है। इस तरह से किसी भी बिल को पास कराना काफी आसान हो जाएगा।

लोग जैसे तिरुपति के मंदिर मे अपने बही खाते चढा आते है, वैसे ही सभी धर्मनिरपेक्ष (??) दल, अपना समर्थन पत्र कांग्रेस आलाकमान को अर्पित कर रहे है। हम भी सोचते है कि अपना समर्थन टिका आएं। लेकिन फिर सोचते है, मंत्रीपद तो चाहिए नही, फिर सीबीआई भी हमारे पीछे नही पड़ी, फिर सबसे बड़ी बात, कांग्रेस के किसी नेता भी हमारी बेइज्जती तो की नही, जो कि समर्थन पत्र देने की पहली शर्त है।

लेकिन क्या आपने सोचा है, यदि कांग्रेस की जगह बीजेपी खड़ी होती तो? तो क्या कुछ खास थोड़े ही बदलता। यही दल (एक इधर या उधर), बीजेपी को धर्मनिरपेक्ष दल मानते हुए, अपना समर्थन पत्र टिकाते, वैसे भी अगर बीजेपी की दो सौ सीटे आ जाती तो वो अपने आप धर्मनिरपेक्ष हो जाती। खैर कुछ भी हो, इस तरह की राजनीति देखने मे मजा आ रहा है।

आपका क्या कहना है इस बारे में?

जनादेश 2009 : समीक्षा

चुनावों मे भारतीय जनता ने अपना जनादेश दे दिया है। कुल 543 सीटों मे से कांग्रेस का यूपीए गठबंधन 260+ सीटें लेकर सबसे बड़े गठबंधन के रुप मे उभरा है। दूसरी तरफ़ भाजपा का एनडीए गठबंधन कुल 158 सीटें पाकर दूसरे नम्बर पर रहा। कांग्रेस की व्यक्तिगत सीटें (205 सीटें) भी एनडीए गठबंधन (158 सीटें) से लगभग 50 सीटें अधिक है। कांग्रेस ने पिछले 18 सालों मे इतना अच्छा प्रदर्शन नही किया। तो आखिरकार इस मुद्दाविहीन चुनाव में कांग्रेस की इस अप्रत्याशित सफलता का राज क्या था? आइए इस जनादेश के कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओ को समझें:

  • एक बात तो साफ़ है कि जनता ने स्थायित्व को वोट दिया। मतदाता काफी परिपक्व हो गए है, क्षेत्रीय पार्टियों की ब्लैकमेलिंग से वो भी चिंतित थे। जनता गठबंधन राजनीति से थक चुकी थी। जाहिर है, बीजेपी और कांग्रेस ही सबसे बड़ी पार्टियां है। वोट इन्ही मे बँटा। । इस बार का जनादेश स्पष्ट था, काम करने वाली क्षेत्रीय पार्टियों(उड़ीसा,बिहार) को वोट मिले, अन्यथा राष्ट्रीय पार्टियों के पक्ष में वोट डाले गए।
  • राजनीति मे सक्रिय गुंडा माफिया नेताओं का सफाया हुआ। इस चुनाव में एक भी माफिया जीत नही सका। यह एक अच्छी पहल है। राजनीतिक पार्टियां जनता के इस संकेत को समझें।
  • कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश और बिहार मे, क्षेत्रीय पार्टियों की बैसाखियों का सहारा नही लिया। यह एक साहसी निर्णय था, किस्मत से यूपी मे दांव चल गया, बिहार मे नही चल सका।
  • कांग्रेस के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार डा.मनमोहन सिंह की साफ सुधरी छवि, विरोधियों पर भारी पड़ी।
  • युवा मतदाताओं ने नए नेतृत्व (राहुल गांधी) पर विश्वास व्यक्त किया।
  • पश्चिम बंगाल और केरल के मतदाताओं ने वामपंथियों को उनकी गलतियों का सबक सिखाया।
  • बीजेपी ने पिछली गलती फिर दोहरायी, अति आत्मविश्वास फिर ले डूबा। जाने क्यों बीजेपी नेतृत्व हर बार आत्मविश्वास की वजह से मार खाता है।
  • चुनावो के दौरान जुटने वाली भीड़, वोट देने वालो मे नही बदल सकी। वोट प्रतिशत कम रहा। गर्मी भी एक वजह रही।
  • बीजेपी मुद्दों को जनता के सामने ठीक तरह से पेश नही कर सकी। महंगाई एक बहुत अच्छा मुद्दा था, लेकिन बीजेपी नेतृत्व इसको सही तरह से भुना नही सका।
  • कई राज्यों (राजस्थान, उत्तराखंड) मे बीजेपी की अंदरुनी गुटबाजी उसे ले डूबी।
  • वरुण गांधी की गैरजरुरी टिप्पणियां और उस पर बीजेपी का अस्पष्ट रुख, यूपी मे मुस्लिम वोटों का एकतरफ़ा धृवीकरण का कारण बना। जाहिर है, फायदा बीजेपी को नही, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को पहुँचा।

राजनीतिक पार्टियों का आत्ममंथन

बीजेपी

  • बीजेपी को अपनी दिशा और दशा निर्धारित करनी होगी। अभी से ही विजन 2014 पर काम शुरु करना होगा।
  • बीजेपी को गलतियों से सबक सीखना होगा। नेतृत्व युवा हाथों मे देना होगा। यही समय की मांग है।
  • पूरे भारत मे बीजेपी को अपनी स्वयं की पहचान बनानी होगी। खासकर पूर्वी राज्यों और दक्षिण के राज्यों मे। गठबंधन के भरोसे बैठना ठीक नही।
  • राजस्थान और उत्तराखंड की बीजेपी इकाइयों के आंतरिक कलह का समाधान करना होगा।
  • उत्तरप्रदेश मे बीजेपी को सक्रिय विपक्ष की भूमिका निभानी होगी, मुलायम/माया के आगे पीछे घूमकर बीजेपी ने अपना वोट बैंक ही खोया है।
  • मंदिर मस्जिद के मुद्दे कोर्ट के हवाले करके, अपना ध्यान बेरोजगारी, राष्ट्रवाद, आतंकवाद, महंगाई,बिजली-सड़क-पानी और आंतरिक सुरक्षा जैसे मुद्दों की तरफ़ ले जाना चाहिए। जनता के लिए मंदिर मस्जिद से कंही ज्यादा जरुरी ये मुद्दे है।

कांग्रेस

  • उत्तरप्रदेश मे कांग्रेस का पासा सीधा पड़ गया। सभी राहुल बाबा की जय हो, बोल रहे है, यदि कांग्रेस को 5 सीटे मिलती तो? होता क्या हमेशा की तरह राज्य के प्रभारी (इस समय दिग्विजय सिंह) को बलि का बकरा बनाया जाता। कांग्रेस मे हमेशा से ही होता आया है, जीत का श्रेय गांधी परिवार को और हार का ठीकरा राज्य प्रभारी।
  • कांग्रेस के कुछ सहयोगियों जैसे तृणमूल कांग्रेस, डीएमके ने अप्रत्याशित सफ़लता दर्ज की।
  • कांग्रेस के ऊपर एक बड़ी जिम्मेदारी है, मेरे हिसाब से कांग्रेस का टेस्ट अब होना है।
  • देशहित मे कठोर निर्णय भी लेने पड़े तो सत्ताधारी पक्ष को उस पर अमल करना चाहिए। हालांकि कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर राष्ट्रीय सहमति आवश्यक है।
  • महंगाई और आतंकवाद महत्वपूर्ण मुद्दे है, चुनाव जीतने का मतलब यह कतई नही कि जनता इन मुद्दों को भूल गयी है। जनता ने कांग्रेस को वोट सशक्त विपक्ष के अभाव मे दिया है, अच्छे काम के लिए नही।
  • बूढे कांग्रेसियों के रिटायरमेंट का वक्त आ गया है। उन्हे नए नेतृत्व के लिए जगह खाली करनी ही पड़ेगी।
  • कांग्रेस को सभी तरफ़ से ध्यान हटाकर, वोटबैंक की राजनीति से ऊपर उठकर, विकास के मॉडल पर काम करना होगा। जनादेश विकास के लिए है।

वामपंथी

  • आगे बढकर अपनी गलतियां स्वीकारें।
  • अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करें।
  • दुनिया भर मे वामपंथ खात्मे पर है, भारत मे भी वही ना दोहराया जाए।
  • सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाएं।

क्षेत्रीय पार्टियां

  • ये चुनाव क्षेत्रीय पार्टियों के लिए कड़ा संदेश है, सिर्फ़ बातों से काम नही चलेगा, काम भी करके दिखाना होगा।
  • क्षेत्रीय विकास के नाम पर चुनावी ब्लैकमेलिंग बन्द करनी होगी।
  • हर चुनाव मे पालाबद्ल करना जनता को रास नही आ रहा।

लेख का अंत एक अंग्रेजी कहावत से करना चाहूंगा :
Success has many fathers, while failure is an orphan
(सफ़लता मे हिस्सा बँटाने के लिए सैकड़ो आगे आते है, जबकि असफलता मिलने पर लोग अकेला छोड़ देते है।)

यही हाल कांग्रेस और बीजेपी का है। आप खुद देख लीजिएगा, यूपीए को सपोर्ट देने के लिए हर ऐरा गैरा नत्थू खैरा बड़े बड़े भाई, कहता हुआ आगे आएगा। बीजेपी के नेता अकेले मे ही बैठकर गम गलत करेंगे।आपका क्या विचार इस बारे में? अपने विचार लिखना मत भूलिएगा।

मेरा भारत महान : सचमुच एक महान उपलब्धि

आज मुझे यह समाचार पढकर बहुत अच्छा लगा। भारत दुनिया मे पहला ऐसा देश है जिसने अपने सारे रासायनिक और जैविक हथियार पूरी तरह से नष्ट कर दिए है। दुनिया के बाकी देशों को भी भारत से सबक लेते हुए, दुनिया को जैविक और रासायनिक हथियारों से मुक्त करने के लिए कदम बढाना चाहिए।

आज फिर भारत ने दुनिया को शांति का नया पाठ पढाया है। क्यों हुआ ना मेरा भारत महान?
आपका क्या कहना है इस बारे में?

सत्ता समीकरण : पाला बदल खिलाड़ी

सभी लोगों ने चैन की सांस ली है कि चुनावों का शोर कुछ थम गया है। १३ मई को आखिरी मतदान होने के साथ ही, सबकुछ सामान्य सा दिखने लगा। हमे याद आ रहा है कि कानपुर मे एक प्रत्याशी हुआ करते थे (थे नही है भाई) भगवती प्रसाद दीक्षित। लोग इनको घोड़ेवाला दीक्षित कहा करते थे, ये घोड़े पर घूमा करते थे। चुनाव चाहे मोहल्ले का हो, या फिर राष्ट्रपति का, हर जगह नामांकन करते थे। जाहिर है, हर जगह हारते थे, लेकिन इनकी सभाओं मे भीड़ सबसे ज्यादा हुआ करती थी। काफी मजाकिया किस्म के भाषण हुआ करते थे इनके। कानपुर मे ऐसा कोई नही जिसने घोड़े वाले दीक्षित के बारे मे ना सुना हो।

इनके जोश को सलाम है। लोकतंत्र की बहुत अच्छी समझ है इनको। सभी से बड़े प्यार से मिला करते थे। हमसे कुछ विशेष स्नेह था। हमने एक दिन पूछा, अगर चुनाव जीतोगे तो संसद मे घोड़ा लेकर जाओगे। तपाक से बोले,

“जरुर। अगर सवा पाँच सौ गधे संसद मे जा सकते है तो मेरा एक घोड़ा क्यों नही”। – घोड़ेवाला दीक्षित

उनकी बात मे वाकई दम था। एक दिन मूड मे थे, बोले, जिस दिन मै चुनाव जीतूंगा उस दिन सवा 500 गधों साथ मै घोड़े पर, पूरे कानपुर शहर में जलूस निकालूंगा। अब ये बात और है कि उनकी ये इच्छा कभी पूरी ना हो सकी।

चुनाव की सरगर्मियों के तहत विभिन्न पार्टियों ने एक दूसरे पर जो गोबर-कीचड़ मला था, अब सभी एक दूसरे को रुमाल बाँटते दिखेंगे। पिछली कही सुनी को भूल जाने के लिए कहेंगे। कई कई तो घड़ियाली आंसू भी बहाएंगे, कुछ भटक जाने का नाटक करते हुए, घरवापसी की गुहार करेंगे। काहे? अरे यार! किसी को स्पष्ट बहुमत जो नही मिलने वाला।

कांग्रेस अपने बूते पर सरकार बना नही सकती। उनका यूपीए गठबंधन तो चुनाव पूर्व ही छिन्न भिन्न हो गया था। एनडीए भी कोई ज्यादा सुखी नही दिख रही, उनको भी जहाँ जहाँ से उम्मीद थी, वहाँ भी बर्तन उलटे हुए ही दिख रहे है। तीसरा मोर्चा तो कब बना, कब बिगड़ा पता ही नही चला, हालत ये है कि तीसरे मोर्चे की पार्टियां, अब अकेले अकेले डिसीजन लेने की बात करने लगी। रही बात स्वयंभू चौथे मोर्चे की, (ये कौन है? यादव/पासवान मोर्चा यार!) इनकी हालत सबसे पतली है। लालू तो ब्राहमणो चुनाव वाले दिन ही बोले “वोटवा तो नही ना दिए हमको”। तो चौथा मोर्चा तो अस्तित्व मे आने से पहले ही सिमट गया। अब सबकी नजर लगी है, पाला बदल खिलाडियों पर, आइए इन पर कुछ नजर डालते है।

टीआरएस नेता
ये सबसे बड़े पाला बदल है। इनको यही नही पता रहता कि ये सुबह किस पार्टी मे होंगे शाम को किस पार्टी मे। पहले एनडीए मे थे, फिर कांग्रेस मे रहे, फिर तीसरा मोर्चा इनको उठा ले गया। अब फिर वापस एनडीए मे दिख रहे है। इनको आप एक ही समय मे तीन तीन लोगों (माया बहिन जी, सोनिया मैडम और आडवानी) को तारीफ़ करते देखेंगे। इनकी नजर मे तीनो प्रधानमंत्री बन सकते है। किसी को भी पता नही चलेगा कि कब ये एनडीए के हाथ से फिसल कर विपक्षी की झोली मे जाकर गिरते है।

रामबिलास पासवान
पासवान का भी यही हाल है। इनका मूलमंत्र है, जिधर सत्ता, उधर के हम। ये सत्ता से दूर नही रह सकते। चाहे लालू के साथ चौथा मोर्चा बनाना हो या फिर तीसरे मोर्चे वालों की रैली मे जाना हो, इनको परहेज नही। चुनाव के नतीजे आने के पहले, इनको अंदेशा हो गया है कि यूपीए मे घर वापसी मे ही भलाई है। आजकल मे ही आप अखबारों/टीवी पर, इनके घरवापसी के बयान देखेंगे। अब देखते है सत्ता के खेल मे ये किधर की गोटी फिट करते है।

अजीत सिंह
अजीत सिंह, राजनीति विरासत मे पाए रहे, चौधरी चरण सिंह जी ने ताउम्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति मे गुजार दी। सत्ता के गलियार मे वे हमेशा कांग्रेस विरोधी ही कहलाए। लेकिन अजीत सिंह, पिताजी का नाम पूरा मिट्टी मे मिला दिए। ये हर उस डाल पर दिखे, जहाँ सत्ता की हरियाली थी। चाहे एनडीए हो, मुलायम हो, या कांग्रेस, सबको समान भाव से प्यार किया, सत्ता साझी की। लेकिन जहाँ मौका मिला, खिसक लिए। इन्होने चुनाव बीजेपी के साथ मिलकर लड़ा है, लेकिन बीजेपी वाले अब तक निश्चित नही कि सोलह तारीख के बाद मे भी अजीत बाबू बीजेपी खेमे मे दिखेंगे या नदारद हो जाएंगे।

बीजू जनता दल के नवीन पटनायक
इनकी स्थिति भी अजीब है। उड़ीसा मे सत्ता मे बीजेपी के साथ है, लेकिन लोकसभा चुनाव तीसरे मोर्चे के साथ मिलकर लड़ा। पिताजी बीजू पटनायक ने पूरी उम्र कांग्रेस विरोधी राजनीति मे गुजार दी, लेकिन नवीन पटनायक को किसी से परहेज नही। इनको उड़ीसा मे राजनीति करनी है तो सरकार तो बचानी ही होगी। लेकिन केंद्र से मांगे/योजनाएं/धन मंजूर भी करवानी होंगी, इसी उधेड़बुन मे लगे हुए है। कांग्रेस को उड़ीसा मे आत्महत्या (यूपी की तरह) करनी है तो बीजू जनता दल के साथ जाएगी। नवीन पटनायक भी सोच रहे है कि अगर ज्यादा सीटे आयी तो मोलभाव करने मे आसानी होगी, नही तो एनडीए में घरवापसी तो तय है।

माया बहिन जी
माया के खेल निराले है। सत्ता के सारे समीकरण इनके आस-पास ही घूम रहे है। लेकिन ये सब तभी है जब बहिन जी के पास ’खाने-कमाने’ लायक सीटे आएं। इन्होने चुनाव तो महाराष्ट्र मे भी लड़ा है, लेकिन जीत सिर्फ़ उत्तर प्रदेश मे ही मिलेगी। अब कितनी ये तो सोलह को खुलासा हो जाएगा। इतना तो तय है कि मुलायम सिंह को अच्छी टक्कर देंगी। ये भी प्रधानमंत्री बनने की फिराक मे है, लेकिन कोई इनको बनने नही देगा। नही प्रधानमंत्री पद के साथ ये रक्षा,वित्त,गृह और रेल विभाग भी खुद सम्भालेंगी और कौनो कुछ उखाड़ नही पाएगा। वैसे माना जाता है कि गठबंधन की राजनीति मे ये कच्ची है, ये ढेर सारे दलों को साथ लेकर नही चल पाएंगी। लेकिन ऊंट किस करवट बैठेगा ये कहना मुश्किल है, सभी को सोलह मई का इंतजार है।

मुलायम सिंह यादव
अब बहिन माया की बात करें और मुलायम को छोड़ दे ऐसा कैसे हो सकते है। बहिन जी इनको माननीय मुलायम कहकर पुकारती है। शायद माननीय कहने के बाद किसी को भी गालियां देना आसान होता है। है ना बहिन जी? लेकिन ये बेचारे अपने घर के झगड़े निबटाएं, तब तो बाहर की सोचें। आजम खां ने नाक मे दम कर रखा है, ऊपर से अमर सिंह लगातार हॉटलाइन पर बने हुए है,आजम खां की करतूतों की रनिंग कमेन्ट्री करते हुए। दोनो तरफ़ से बयानबाजी जारी है। सुना तो ये है कि जया प्रदा (झगड़े की जड़ यही मोहतरमा की रामपुर सीट है) अगर चुनाव हार जाती है तो आत्महत्या कर लेंगी और अमर सिंह राजनीति से सन्यास ले लेंगे। वैसे मेरे विचार मे उल्टा होता तो ज्यादा अच्छा होता। खैर नेताओं के वादे, किसी ने कभी निभाए है क्या? आप टेंशन मत लो। मुलायम सिंह कभी तीसरे तो कभी चौथे मोर्चे मे दिखते है, इनको ना तो कांग्रेस से हमदर्दी है ना बीजेपी से प्यार। इनको तो बस ये देखना है कि मायावती किस खेमे मे है, उसके विरोधी खेमे मे रहेंगे, माननीय मुलायम।

चंद्रबाबू नायडू
ये भी सत्ता से दूर नही रहना चाहते, क्योंकि आंध्रा मे इनके विरोधी कांग्रेस वाले, इनकी नाक मे दम किए है। ये भी केंद्र मे आकर, नकेल का इंतजाम करना चाहते है। कांग्रेस के साथ तो ये जाने से रहे। तीसरा मोर्चा ध्वस्त होने के बाद एनडीए ही आखिरी सहारा है इनके लिए। लेकिन इनकी पूछ तभी बढेगी जब ये कुछ अच्छी संख्या मे सीटें जीते। नही तो इनका हाल और बुरा होना है।

जया ललिता
तमिलनाडू की ये सबसे चालाक, राजनीति की माहिर खिलाड़ी अभी अपने पत्ते नही खोल रही। तमिलनाडू मे वैसे भी सत्ताधारी पार्टी कभी भी अच्छा प्रदर्शन नही करती, इसलिए उम्मीद है इनकी पार्टी एआईएडीएमके अच्छा प्रदर्शन करेंगी। इनके साथ परेशानी ये है कि समर्थन के साथ ये ढेर सारी शर्ते भी रखेंगी। जिसमे विरोधी डीएमके को परेशान करना प्रमुख रहेगा। इनको भी प्रधानमंत्री बनने की चाह है, इसलिए सोलह के बाद ही कुछ बोलेंगी। तब तक मैडम और उनके सहयोगियों ने चुप्पी साध रखी है। वैसे इनकी मजबूरी है कि ये डीएमके विरोधी खेमे मे ही रहें।

ममता बनर्जी
इस बार पश्चिम बंगाल मे लेफ़्ट को काफी नुकसान होना है। यदि लेफ़्ट वहाँ पर पिछड़ता है तो ममता का ही फायदा होना है। ममता के पास अच्छी संख्या मे सीटे आने के बाद इनकी पूछ बढ जाएगी। पहले ये एनडीए मे थी, इस बार चुनाव कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा। तुनकमिजाज तो ये है ही, कभी भी कंही उखड़ जाती है, इसलिए लोग इनको उकसाने मे लगे हुए है। वैसे भी कांग्रेस यदि लेफ़्ट के साथ मिलकर सरकार बनाने की सोचती है तो ममता एनडीए की तरफ़ रुख करने मे देर नही करेंगी।

देवगौड़ा/कुमारस्वामी
ये भी बहुत महान प्राणी है, पिताजी कांग्रेस पार्टी को खरीखोटी सुनाते है, लेकिन बेटा फटाफट जाकर कांग्रेस मे गोटियां फिट कर आता है। किसी को (शायद इनको भी) नही पता कि ये किधर बैठेंगे। ये सभी के साथ बैठ चुके है, अब बस सोलह का इंतजार है।

नितीश कुमार
इन चुनाव मे सबकी नजर इन पर रहेगी। अभी तो ये एनडीए के साथ दिखते है, लेकिन कब (सत्ता समीकरण देखते हुए) पाला बदल ले, पता नही चलेगा। बेचारे जॉर्ज फर्नांडिस तो कब के किनारे लग चुके है। अब नितीश बाबू की ही चलनी है। बिहार मे इस बार नितीश सबसे ज्यादा सीटे जीतने जा रहे है। सभी लोग इनका गुणगान करना शुरु भी कर चुके है।

वामपंथी
ये बेचारे इस चुनाव मे पूरी तरह से घिर गए है। वैसे कांग्रेस की सरकार गिराकर, लोगों की नजरों मे दोषी तो ये पहले से ही बन गए थे। पश्चिम बंगाल मे इनकी सीटे कम होना तय है। वामपंथी बड़े शान से तीसरा मोर्चा बनाए थे| लम्बे लम्बे पोस्टर लगाए थे, जिसमे हर क्षेत्रीय नेता का अलग अलग चित्र था। अब उस पोस्टर मे से एक एक करके नेता खिसकते जा रहे है। हालत ये है कि तीसरे मोर्चे में सभी को साथ रखना टेढी खीर साबित हो रही है। खीर तो बाद मे बनेगी, पहले लकड़ियां तो इकट्ठा कर लें। कांग्रेस विरोधी रुख हमेशा रहा, अभी कुछ दिनो पहले तक लगातार कहासुनी भी होती रही। दो दिनो से रुख मे थोड़ी नर्मी दिखाई दे रही है। लेकिन सोलह तक कुछ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन एक बात तो तय है, वामपंथियों के रुतबे मे तो कमी जरुर आएगी।

इसके अलावा भी कई और छोटी छोटी पार्टियां है, जिनका रुख अभी स्पष्ट होना है। लेकिन इतना तय है, पूरा खेल ऊपर वाली पार्टियां ही तय करेंगी। कांग्रेस और बीजेपी सबसे ज्यादा सीटे लेकर भी सिर्फ़ तमाशीय बनेंगी, यही इस लोकतंत्र का सबसे बड़ा मजाक है। एक और संभावना है, मुश्किल जरुर है, लेकिन असंभव नही, आइए इसका भी आकलन करते चलें।

कांग्रेस बीजेपी गठबंधन
वैसे तो दोनो पार्टीयां इसके लिए तैयार नही होंगी। लेकिन ऐसा सम्भव है। दोनो पार्टियां बड़े बड़े गठबंधन चला चुकी है, सत्ता आने पर, दोनो पार्टियों के नेताओं की नींद, क्षेत्रीय पार्टियों के नेताओं की ब्लैकमेलिंग के कारण हराम हो चुकी है। ये लोग इनसे परेशान हो चुके है। हो सकता है एक सरकार बनाए और दूसरी अनुपस्थित रहकर, सरकार बचाए। या फिर हो सकता है दोनो पार्टियां अपनी अपनी विचारधारा को दरकिनार करके, एक राष्ट्रीय सरकार का फार्मूला बना ले, मै फिर कहता हूँ, ये मुश्किल है, लेकिन नामुमकिन कतई नही। देखते है, सोलह को क्या होता है, तब तक इंतजार करिए और मजे लूटिए। आपका क्या सोचना है इस बारे मे बताना मत भूलिएगा। आते रहिए पढते रहिए, आपका पसंदीदा ब्लॉग मेरा पन्ना।

निन्यानवे के फेर मे हम भी…

बहुत दिनो से कोई खेला नही खेला था, टैगिंग भी बन्द है, ब्लॉगिंग तो बहुत दूर हो गयी। तो आजकल हम कर क्या रहे है? अरे भई, ऑफिस के काम से थोड़ा समय मिलता है तो कभी कभी माइक्रो ब्लॉगिंग (एक लाइना) कर लेते है। आपको देखना है तो इधर देख लेना, भाषा की कोई बंदिश नही है, हिन्दी अंग्रेजी, कुछ भी चलेगा। खैर….आइए बात करते है निन्यानवे की, आज ही अमितवे (अमितवे को नही जानते? अरे दिल्ली वाला हिन्दी का भारी भरकम ब्लॉगर, हाँ हाँ वही), ने अपने ब्लॉग पर निन्यानवे आइटम की लिस्ट बतायी है। खेल का नियम यह है इसमे 99 कामों की लिस्ट है, आपको बस करना इतना है कि इस लिस्ट मे से कितने काम आपने किए है वो बताना है। बताने के लिए आप लिस्ट को कॉपी पेस्ट करे, अपने ब्लॉग पर और किए हुए कामों को बोल्ड कर लें।

तो बात हो रही थी कि हमने कितने तीर मारे, तो भैया आप ही देख लो, कित्ते तीर मारे है….. :

1. अपना ब्लॉग आरंभ किया
2. तारों की छांव में नींद ली
3. संगीत बैन्ड में कोई वाद्य यंत्र बजाया (वाद्य यंत्र तो बजाया, लेकिन बैंड वालों ने भगा दिया था)
4. अमेरिका के हवाई द्वीपों की सैर करी
5. उल्का वर्षा देखी
6. औकात से अधिक दान दिया (दान दिया, औकात से ऊपर नही)
7. डिज़नीलैन्ड की सैर करी
8. पर्वत पर चढ़ाई करी
9. प्रेयिंग मैन्टिस (praying mantis) कीड़े को हाथ में पकड़ा
10. सोलो गाना गाया (सुनते सुनते सब निकल लिए, आखिरी मे एक बंदा बचा था, माइक्रोफोन उसका था ना इसलिए…)
11. बंजी जंप करी (गए थे करने, ऊँचाई से नीचे देख कर, हवा निकल गयी, लौट आए, फिर जाएंगे…..ऊँचाई, नीचे…हवा…..फिर..)
12. पैरिस गए
13. समुद्र में बिजली का तूफ़ान देखा
14. कोई कला शुरुआत से अपने आप सीखी
15. किसी बच्चे को गोद (adopt) लिया
16. फूड प्वॉयज़निंग झेली
17. कुतुब मीनार को देखा
18. अपने लिए सब्ज़ी उगाई
19. फ्रांस में मोनालिसा देखी
20. रात के सफ़र में ट्रेन में नींद ली (हाँ, बाकी मुसाफिर हमारे खुर्राटों के कारण जागते रहे)
21. तकिए द्वारा लड़ाई की (मेरी बेटी इसमे तेज है, हम ना जीत पाते उस से)
22. सड़क पर किसी अंजान व्यक्ति से लिफ़्ट ली (कई बार, अक्सर ये दोस्ती मे तब्दील भी हुई)
23. स्वस्थ होते हुए भी ऑफिस से बीमारी के लिए छुट्टी ली (हाँ मौसम सुहावना हो, लांग ड्राइव पर जाने का मूड हो तो, ऑफिशली बुखार हो जाता है।)
24. बर्फ़ का किला बनाया
25. मेमने को गोद में उठाया (पकड़ मे आए, तब तो उठाएं)
26. बिना किसी वस्त्र के नग्न ही पानी में उतरे (तरण ताल, नदी, तालाब, समुद्र अथवा बाथ टब इत्यादि में) -(किसी ने देखा तो नही..?)
27. मैराथन रेस में दौड़ लगाई
28. वेनिस में गोन्डोला (एक तरह की नाव) में सवारी करी
29. पूर्ण ग्रहण देखा
30. सूर्योदय अथवा सूर्यास्त देखा
31. होम रन मारा (बेसबॉल में)
32. समुद्र पर्यटन (cruise) पर गए
33. नियाग्रा फॉल्स स्वयं देखा
34. पूर्वजों की जन्मभूमि देखने गए ( रह गयी ये इच्छा)
35. किसी कबीले के रहन सहन को नज़दीक से देखा
36. अपने आप एक नई भाषा स्वयं सीखी
37. इतना धन अर्जित किया कि पूर्णतया संतुष्ट हुए (संतुष्टि तो कभी नही आती)
38. पिसा की झुकती मीनार (Leaning Tower) देखी
39. रॉक क्लाइम्बिंग करी
40. माइकलेन्जलो द्वारा कृत पुरातन इज़राइल के राजा डेविड की मूरत देखी
41. कैरीओकी (karaoke) गाया
42. वायोमिंग के येलोस्टोन नेशनल पार्क में मौजूद ओल्ड फेथफुल गीज़र को भभक कर उठते देखा
43. किसी अंजान को रेस्तरां में खाना खिलाया (कई साधुओं/भिखारियों को पकड़ पकड़ कर खाना खिलाया)
44. अफ़्रीका गए (इजिप्ट गए, लेकिन साउथ अफ्रीका जाने का सोचा है एक बार)
45. चांदनी रात में समुद्र तट पर सैर करी
46. एम्बुलेन्स में ले जाया गया, (लाद कर ले जाया गया, एम्बुलेंस नही थी लेकिन)
47. अपनी तस्वीर बनवाई (फोटो नहीं)
48. गहरे समुद्र में मछली पकड़ने गए
49. वैटिकन में सिस्टीन चेपल देखा
50. पैरिस में ऐफिल टॉवर के शीर्ष से नज़ारा किया
51. स्कूबा डाईविंग अथवा स्नॉर्कलिंग करी
52. बरसात में चुंबन लिया/दिया (डिटेल मत पूछना, मजा बहुत आया था।)
53. मिट्टी में खेले
54. ड्राईव-इन सिनेमा देखा
55. किसी फिल्म में नज़र आए
56. चीन की बड़ी दीवार देखी
57. अपना व्यवसाय आरंभ किया
58. मार्शल आर्ट की क्लास में भाग लिया
59. रूस गए
60. लंगर/भंडारे में लोगों को खाना परोसा (कई बार)
61. ब्वॉय स्कॉऊट पॉपकार्न अथवा गर्ल स्कॉऊट कुकीज़ बेची
62. समुद्र में व्हेल देखने गए
63. खामखा बिना वजह किसी ने फूल दिए
64. रक्त दान किया
65. स्काई डाईविंग करी
66. नाज़ी कॉन्सनट्रेशन कैम्प देखा
67. खुद का दिया बैंक चैक बाऊंस हुआ (बहुत गालियां खायी थी)
68. हैलीकॉप्टर में सवारी करी
69. बचपन के किसी मनपसंद खिलौने को बचा के रखा
70. राज घाट पर गांधी समाधि देखी
71. कैवियार (मछली के अंडों का अचार) खाया
72. रजाई का कवर सिला
73. चांदनी चौक गए
74. घने जंगल में सैर की
75. नौकरी से निकाले गए
76. लंदन के बकिंघम महल में पहरेदारों की बदली देखी
77. हड्डी टूटी
78. तेज़ रफ़्तार मोटरसाइकल की सवारी करी (तभी तो टूटी थी)
79. अमेरिका में ग्रैन्ड कैनयन देखी
80. अपनी किताब छपवाई (लोगो ने मेरे लेख छाप दिए, इसलिए छपाई तो हुई)
81. वैटिकन गए
82. नई नवेली गाड़ी खरीदी
83. जेरूसलम की सैर करी
84. अखबार में फोटो छपी
85. नव वर्ष की पूर्व संध्या की मध्यरात्रि किसी अंजान का चुंबन लिया (गलती से लिया था, पीछे पड़ गयी)
86. राष्ट्रपति भवन की सैर करी
87. किसी जानवर का शिकार कर खाया
88. चिकन पॉक्स झेला
89. किसी की जान बचाई(हाँ उसने मारा भी था मेरे को)
90. जज अथवा जूरी बन निर्णय सुनाया (किसी प्रतियोगिता में या न्यायालय में)
91. किसी प्रसिद्ध व्यक्ति से मुलाकात करी
92. बुक क्लब की सदस्यता ली
93. किसी अज़ीज़ को खोया
94. शिशु को जन्म दिया
95. जॉन वेन की फिल्म “द अलामो” देखी
96. अमेरिका के ग्रेट सॉल्ट लेक में तैराकी करी
97. किसी कानूनी मुकदमे में शरीक हुए/रहे
98. सेल फोन के मालिक हैं/रहे
99. मधुमक्खी ने डंक मारा (डंक तो मारा था, गले पर, लेकिन मधुमक्खी थी, या मक्खा ये पता नही।)

ये तो रही हमारी लिस्ट, आपकी लिस्ट के क्या हाल है? लिखना मत भूलना