फिर मिले सुर…

मिले सुर मेरा तुम्हारा… कुछ याद आया? राष्ट्रीय एकता और सदभावना पर 1988 मे बना यह गीत जब पहली बार पंद्रह अगस्त को दिखाया गया तो कई लोगो ने सोचा कि यह कांग्रेस सरकार का प्रचार है, लेकिन कब यह गीत हमारे दिलों को छू गया,पता ही नही चला । इसकी लोकप्रियता कुछ इस कदर बढी कि लोग बार बार लगातार इस गीत को देखना/सुनना पसन्द करने लगे। इस बार 2010 मे इस गीत को दोबारा बनाया गया है, बोल वही है, लेकिन परिकल्पना अलग है। आप भी देखिए।

ये रहा भाग दो

वीडियो साभार यूट्यूब डाट काम

गीत दो भागों मे फिल्माया गया है, दोनो के लिंक ऊपर दिए हुए है। यह गीत आज भी हम सभी मे राष्ट्रीयता की भावना को जगाता है, जिसकी आज देश को बहुत जरुरत है। कुछ लोगों का कहना है कि इस गीत मे बॉलीवुड का तड़का कुछ ज्यादा ही है। लेकिन जब भी कोई नयी चीज बनती है तो आलोचनाएं तो कुछ होती ही है। उसलिए उन आलोचनाओं को दरकिनार करते हुए भावनाओं को समझते हुए, गीत को देखिए। रही बात तड़के की तो आप अपना नया संस्करण बना सकते है, उसमे सिर्फ़ ब्लॉगिंग वालो का ही तड़का दीजिएगा। है कि नही?

आपको कैसा लगा ये गीत?
इसमे दिखाए गए कलाकारों मे से कितनों को आपने पहचाना?
क्या इसका नया संस्करण आप नही बना सकते? तो फिर देर किस बात की है, उठाइए कैमरा और बनाइए अपना संस्करण, अपलोड करने के लिए यूट्यूब तो है ना। तो कब दिखा रहे है आप अपना संस्करण?

सम्बंधित लिंक
फिर मिले सुर भाग एक
फिर मिले सुर भाग दो
मिले सुर मेरा तुम्हारा (मूल रुप में)

दिल ढूंढता है…फुर्सत के रात दिन

आजकल इस भागदौड़ भरी जिंदगी मे थकना मना है, नही नही भाई मै कोई प्रोडक्ट बेचने की कोशिश नही कर रहा हूँ, बस इस भागदौड़ भरी जिंदगी से दूर कुछ पल आराम से गुजारने की सलाह दे रहा हूँ। आजकल हम लोग दिन भर ऑफिस/दुकान पर काम करते है, और शाम होते ही इस बोझ पर अपने कंधो पर उठाकर अपने घर ले जाते है। जिसका कारण है बढती हुई प्रतियोगिता या कहें गला काट प्रतियोगिता। लेकिन क्या ये बोझ घर ले जाना जरुरी है? हम क्यों ऑफिस की टेंशन घर ले जाते है?

अभी पिछले दिनो भारत यात्रा के दौरान मैने देखा, मेरे पुराने मित्र, नयी जीवनशैली मे रंग चुके है। उनकी जीवनशैली मे अप्रत्याशित तेजी आ चुकी है, ऑफिस मे काम का भारी दबाव है, पति पत्नी अगर दोनो काम करते है तो एक दूसरे के लिए समय निकालना काफी मुश्किल हो रहा है। इसका नकारात्मक प्रभाव उनकी पारिवारिक जिंदगी पर हो रहा है। पहले ऐसा नही था, आस पास के कुछ वर्षो मे ही ये बदलाव देखने के मिला है। लैपटाप मोबाइल के आने से यह बोझ बढता ही जा रहा है। जिंदगी तनाव मे गुजर रही है जिससे स्वभाव मे चिड़चिड़ापन बढ रहा है और ढेर सारी बीमारियां जैसे इस शरीर मे प्रवेश करने के लिए तैयार बैठी दिख रही है।

लेकिन क्या यह तनाव जरुरी है? विदेशो मे भी लोग काम करते है, शायद इससे ज्यादा ही करते होंगे, लेकिन मैने उनको तनावग्रस्त कम ही देखा है। शायद वे जितना मेहनत करने मे विश्वास रखते है, उतना ही अपनी व्यक्तिगत जिंदगी को जीने मे भी रखते है। मैने वीकेंड पर शायद ही किसी अंग्रेज को आफिस जाते या काम करते देखा है। वीकेंड को वे लोग पूरी मस्ती से जीते है, अपने परिवार के साथ। इसका मतलब ये कतई नही कि भारतीय वीकेंड पर मस्ती नही करते, लेकिन मैने उनको वीकेंड पर भी परिवार से ज्यादा अपने काम से जुड़ा पाया। हो सकता है कि भारत मे अभी परिस्थियां कुछ अलग हो। शायद मेरे कुछ भारतीय ब्लॉगर साथी इस पर कुछ प्रकाश डाल सकें।

Fursat

जहाँ तक कुवैत का सवाल है मेरी दिनचर्या कुछ इस तरह है। मै सुबह लगभग पाँच बजे उठता हूँ, थोड़ी देर योगा करता हूँ, चाय पीने के बाद आधे घंटे की वॉक जरुर करता हूँ, सम्भव हो सका तो पास के गार्डन मे और छुट्टी वाले दिन तो पक्का समुंद्र के किनारे जाता हूँ। लौट कर नहाना और ऑफिस के लिए तैयार होना। सात से तीन बजे तक ऑफिस, फिर चार बजे तक घर वापसी। वैसे तो मेरी कम्पनी मेरे को घर पर परेशान नही करती लेकिन जब भी जरुरत होती है, मै उपलब्ध रहता हूँ। मेरे सारे एप्लीकेशन ठीक से चल रहे है कि नही, उनका लेखा जोखा मेरे इमेल पर आता रहता है, अगर जरुरत पड़ती है तो मै कंही से भी उनको देख/ठीक कर सकता हूँ। घर पहुँचकर लंच के बाद एक घंटे की नींद फिर शाम की दिनचर्या, कुछ देर परिवार,टेनिस, टीवी, दोस्तों मे निकलता है, फिर रात की वॉक। डिनर तो मै करता नही, कुछ फल/दूध लेकर कुछ पढते हुए, बिस्तर की तरफ़ बढ लेते है। इस तरह दिन पूरा निकल जाता है। हाँ इस बीच बीबीजी की शॉपिंग और ब्लॉगिंग के लिए भी समय चुराया जाता है। वीकेंड पर रुटीन एकदम अलग है। वीकेंड पर पूरा समय सिर्फ़ परिवार को ही दिया जाता है, अक्सर मोबाइल को साइलेंट रखकर, गैरजरुरी इमेल वगैरहा को वीकडे पर टालते हुए सिर्फ़ और सिर्फ़ परिवार के साथ पूरा समय बिताने की कोशिश करता हूँ। हाँ इस बीच कभी कभी सामाजिक कार्यों (जैसे उपकार संस्था) अथवा ब्लॉगिंग के लिए भी समय निकाला जाता है। आपकी क्या दिनचर्या है?

सवाल ये है कि हम इस भागदौड़ भरी जिंदगी मे अपने परिवार को कितना समय देते है? देते भी है कि नही? क्या ऐसा तो नही इस भागदौड़ मे हम अपने परिवार को भुला ही बैठे है? आपका क्या कहना है इस बारे में?

बीत गया ये साल भी

लो जी, ये साल भी गुजर गया। ऐसा लगता है कि अभी अभी ही तो साल शुरु हुआ था, इत्ती जल्दी खत्म भी हो गया, लगता है इस साल को पर लग गए, तभी तो जल्दी जल्दी निकल गया। हम भी इस साल कुल जमा तीस लेख ही लिख पाए, बकौल मिर्जा लानत है ऐसे ब्लॉगर पर। शुकुल भी बोलते है तुमको शरम आती है कि नही? अब का करें, इत्ता जल्दी जल्दी जो निकल गया इ साल, सोचते ही रह गए, लिखने का टाइम ही नही मिला। अब साल के जल्दी निकलने की टेंशन हमसे ज्यादा तो कामनवेल्थ गेम्स की तैयारियां कराने वालो को है। समय निकला जा रहा है इनकी तैयारियां लगता है अगले ओलम्पिक तक भी पूरी ना हो सकेंगी। ज्यादा से ज्यादा होगा ये कि आखिरी टाइम मे इस्तीफ़ा विस्तीफा देने का नाटक होगा। अब आप भी कहेंगे कि क्या लेकर बैठ गए, इसलिए चलो उनको उनके हाल पर छोड़ते है, आइए बात करते है कुछ और। Read the rest of this entry »

एक संक्षिप्त पोस्ट भारत से

साथियो बहुत दिनो बाद लिख रहा हूँ, क्या करुं रोजी रोटी के बाद जो समय मिलता है परिवार को देने मे निकल जाता हूँ, इस समय मै भारत यात्रा पर हूँ, गुडगाँव के पास भिवाडी मे एक रिटायरमेंट रिसोर्ट मे हूँ, यहाँ तक कैसे पहुँचा इसकी कहानी अगली बार, अभी तो सिर्फ ये सूचना देना चाहता हूँ कि यदि किसी चिट्ठाकार को मुझसे मिलना हो तो अमित गुप्ता (भारीभरकम ब्लागर) या बैंगानी भाईयौ (अहमदाबाद वाले)से मेरा नम्बर प्राप्त कर सकता है। कल ही कुछ पुराने चिट्ठाकारो से मुलाकात हुई, काफी अच्छी रही, इसका विवरण अमित गुप्ता अपने चिट्ठे पर् करेंगे। बाकी का लेखा जोखा लौटने पर, तब तक के लिए नमस्कार।

चिट्ठा चर्चा और मेरे अनुभव

साथियों, आज चिट्ठा चर्चा अपनी 1000वी पोस्ट लिख रहा है, इस अवसर पर चिट्ठा चर्चा की टीम को ढेर सारी बधाईयां एवं भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामनाएं। जैसा कि आपको पता है कि मै भी चिट्ठा चर्चा से जुड़ा रहा हूँ, ढेर सारे चिट्ठों की चर्चाएं की है। आइए कुछ अवलोकन करें उन पुराने अनुभवों का।

चिट्ठा चर्चा की शुरुवात
मेरे ख्याल से 2004 की बात है, उस समय हिन्दी ब्लॉगजगत मे गिने चुने ब्लॉगर ही हुआ करते थे। उस समय हिन्दी ब्लॉगिंग को आगे बढाने और उसका प्रचार प्रसार करने पर पूरा जोर था। हम लोग कोई भी मंच और कोई भी अवसर, हिन्दी ब्लॉगिंग को प्रचारित प्रसारित करने के लिए नही छोड़ते थे। अक्सर भाई लोग अंग्रेजी ब्लॉगों पर हिन्दी मे टिप्पणियां कर आया करते थे, जिसे कुछ अंग्रेजी ब्लॉग वाले अपनी तौहीन समझकर हटा दिया करते थे, लेकिन कुछ अच्छे ब्लॉगर भी होते थे, उन टिप्पणियों को अपने ब्लॉग पर लगाए रखते थे, इस तरह से लोगों को पता चलता था कि हिन्दी में भी ब्लॉगिंग हुआ करती है।

बात शुरु हुई थी ब्लॉग मेला से। यजद ने अपने ब्लॉग पर ब्लॉग मेला आयोजित किया था, जिसमे हम लोगों ने भी शिरकत की थी। इस तरह से हम लोगों अंग्रेजी ब्लॉग वालों के साथ सब कुछ सही चल रहा था। फिर बारी आयी मैडमैन के ब्लॉग मेले की, जिसमे हम लोगों ने शिरकत की थी, वहाँ पर मैडमैन ने हिन्दी चिट्ठों की समीक्षा करने से साफ़ साफ़ मना कर दिया। ऊपर से एक जनाब, जो अपने को सत्यवीर कहते थे ने हिन्दी को एक क्षेत्रीय भाषा कह दिया और सुझाव दिया कि आप लोग अपना अलग से मंच तलाशो। बस फिर क्या था, इस पर मुझे, अतुल, देबाशीष और इंद्र अवस्थी को ताव आ गया, हम लोगों ने उनको अंग्रेजी मे ही पानी पी पी कर कोसा। काफी कहासुनी हुई, मेरे विचार से अंग्रेजी-हिन्दी ब्लॉगिंग का वो सबसे बड़ा फड्डा था। नतीजा ये हुआ कि मैडमैन ने अपनी उस पोस्ट पर कमेन्ट ही बन्द कर दी।

उनकी नजर मे मसला वंही समाप्त हो गया, लेकिन हमारे दिलों मे एक कसक रह गयी थी। जिसका नतीजा चिट्ठा चर्चा की नीव के रुप मे सामने आया। चूंकि चिट्ठे कम थे, इसलिए मासिक चर्चा हुआ करती थी, फिर ब्लॉग बढने के साथ साथ इसको पंद्रह दिनो, सप्ताह मे और अब तो रोज (कई कई बार तो दिन मे कई कई बार) ही चिट्ठा चर्चा होती है। काफी दिनो तक चिट्ठा चर्चा, चिट्ठा विश्व के साथ जुड़ी रही, फिर चिट्ठा विश्व मे कुछ समस्याएं आयी, तब नारद का उदय हुआ, धीरे धीरे और भी एग्रीगेटर आएं। लेकिन चिट्ठा चर्चा लगातार जारी रही। इसकी पूरी कहानी शुकुल की जुबानी ये रही।


चर्चाकारों के छिटकने की कहानी
चूंकि चिट्ठा चर्चा मे सिर्फ़ ब्लॉग की पोस्ट के बारे मे संक्षेप मे लिखकर उसका लिंक दे दिया जाता था। इसलिए धीरे धीरे इसमे नयापन जाता रहा। इससे चर्चा करने वालों का मन उचट गया, फिर नयी टीम की खोज शुरु हुई, कई नए लोग आए, चर्चा मे विविधिता लाए। यदि आपको चिट्ठा चर्चा के विभिन्न रंग देखने है तो पुरानी चर्चाओं को पढिए, सचमुच दिल खुश हो जाएगा। हमने भी काफी दिन चर्चाएं की थी, शुकुल ने हमारा दिन मुकर्रर कर दिया था, हर तारीख पर गवाही देने जाना पड़ता था। अगर नही जाते तो शुकुल का तगादा शुरु हो जाया करता था। तगादा भी ऐसा वैसा नही, इस तगादे में उलहाना और उँचे स्तरों का गाली गलौच (ऐसी गालियां जो सुनने मे तारीफ़ लगें) भी शामिल हुआ करता था। कभी कभी तो लगता था जीटॉक खोलें ही ना। मेरे विचार से ठलुवा (इंद्र अवस्थी) ने ब्लॉगिंग से सन्यास इसलिए लिया कि शुकुल उसको चिट्ठा चर्चा का सोमवार का ठेका दिए हुए था। बंदे ने सोचा ना ब्लॉगिंग करेंगे और ना ही चर्चा। यही कुछ हाल अपने अतुलवे का भी हुआ। खैर शुकुल डटा रहा और बाकायदा आज तक मोर्चे पर डटा हुआ है, डंडा हाथ मे लेकर सबसे तगादा करता रहता है। शुकुल के इस ज़ज्बे को सलाम।

मौजूदा स्वरुप और भविष्य के लिए सुझाव

मेरे विचार से चिट्ठा चर्चा का मौजूदा स्वरुप काफी अच्छा है, चूंकि एक ब्लॉग पोस्ट का अस्तित्व अगली पोस्ट आने तक ही होता है, इसलिए चिट्ठा चर्चा की अहमियत काफी बड़ी है। चिट्ठा चर्चा को वर्तमान स्वरुप मे चर्चा करते रहने के साथ साथ कुछ और भी करना चाहिए। मेरे कुछ सुझाव है :

  • चिट्ठा चर्चा का मासिक अंक निकालना चाहिए, जिसमे उस महीने के अच्छे चिट्ठों के बारे में उल्लेख हो।
  • यदि सम्भव हो तो, हिन्दी अखबारों से सम्पर्क करके उन्हे साप्ताहिक चिट्ठा चर्चा की पीडीएफ़ फाइल भेज दी जानी चाहिए।
  • ब्लॉग मेला, कहानी लेखन प्रतियोगिता टाइप के आयोजन चिट्ठा चर्चा के तत्वावधान मे किए जाने चाहिए।
  • नए चिट्ठाकारों को आगे लाने के लिए उनको चिट्ठा चर्चा मे शामिल किया जाना चाहिए।
  • चर्चाकारों की टीम बी(Team B) बनायी जानी चाहिए, ताकि यदि एक टीम चूक गयी तो दूसरी टीम अपनी चर्चा के साथ तैयार रहें।

एक बार फिर चिट्ठा चर्चा की टीम को बहुत बहुत शुभकामनाएं। चिट्ठा चर्चा इसी तरह पाँच हजार, दस हजार, लाख…… का आँकड़ा छूती रहे और आगे बढती रही। इन्ही शुभकामनाओं के साथ…….

अनदेखा करिए

हैलो टेस्टिंग,
कृप्या इस पोस्ट को इग्नोर करिए। इग्नोर मतलब अनदेखा करिए।
हैलो टेस्टिंग,
कृप्या इस पोस्ट को इग्नोर करिए। इग्नोर मतलब अनदेखा करिए।

दद्दा अब देखो, आ गयी क्या?

सड़क पर हमारा व्यवहार

आज बहुत दिनो बात लिखने का मौका मिला है, चलो जी जित्ता हो सके निबटा लिया जाए। आजकल तो पढने लिखने का मौका ही मिलता, क्या करें, तीन तीन प्रोजेक्ट सर पर है, सबको निबटाना है। एक अकेली जान, हैरान परेशान क्या क्या करूं, इसलिए ब्लॉगिंग बैक बर्नर पर चली गयी है। खैर जनाब ये हमारी परेशानी है, हम ही सुलटेंगे, आप टेंशन मत लो। आइए बात करते है, सड़क पर हमारे व्यवहार की। इसके पहले हम आपको एक आपबीती सुनाते है।

ये आपबीती है कुवैत की एक सड़क की। किस्सा सुनकर आपको काफी अजीब लगेगा। वैसे तो पूरे गल्फ मे मशहूर है कि सऊदी और कुवैत के बाशिंदे काफी गर्म मिजाज और अकड़ू किस्म होते है। लेकिन कुवैत मे मैने एक बात देखी है, कानून को कोई भी अपने हाथ मे नही लेता। मेरे को याद है काफी साल पहले मेरी गाड़ी का एक्सीडेंट हुआ था। दरअसल गलती मेरी ही थी, अगला बन्दा(कुवैती ही था) मेरी गाड़ी के आगे चल रहा था, स्पीड यही कोई 80/100 किमी की रही होगी, अचानक अगली गाड़ी वाले को ब्रेक मारना पड़ा, मैने भी काफी कोशिश की, लेकिन फिर भी मेरी गाड़ी उसकी गाड़ी को छू ही गयी। बन्दा अपनी गाड़ी से बाहर निकला, हम दोनो ने एक दूसरे का अभिवादन किया, हाथ मिलाए, उसने हमे सिगरेट ऑफर की, दोनो ने एक दूसरे की गाड़ी का मुआयना किया, और फिर पुलिस को फोन किया गया। सड़क के किनारे खड़े होकर, पुलिस का इंतजार करने के बीच काफी प्रेमपूर्वक बातचीत हुई। पुलिस भी आनन फानन मे पहुँच गयी, उसने हमारी गाड़ियों की लोकेशन को कागज पर उतारा, हम सभी ने एक दूसरे के नम्बर लिए और ऑफिस के बाद शाम को मिलने का वादा किया, इस तरह से बड़े ही सौहार्दपूर्ण तरीके से एक सड़क दुर्घटना को निबटाया गया। इसके उलट अगर यही बात दिल्ली/कानपुर मे घटित होती तो क्या होता? चलिए एक किस्सा भारत का भी हो जाए।

अभी पिछली भारत यात्रा के दौरान, देखा काफी कुछ बदल गया है। नही बदला है तो बस हम लोगों का सड़क पर व्यवहार करने का रवैया। दिल्ली मे मै अक्सर खुद ड्राइव नही करता, दोस्त की एक गाड़ी और ड्राइवर लेकर, फैमिली सहित, कंही काम से जा रहा था। दक्षिण दिल्ली की बात रही होगी, आश्रम के पास एक हमारी गाड़ी के पीछे एक गाड़ी आ रही थी, जिसे एक लड़की चला रही थी, और जाने का पॉस मांग रही थी, आगे ट्रैफिक था इसलिए ड्राइवर पॉस नही दे पा रहा था। लड़की लगातार हार्न पर हार्न देती रही। अगली लाल बत्ती से जैसे ही गाड़ी आगे निकली, लड़की ने गाड़ी को हमारी गाड़ी के आगे लगा दिया और बाहर निकल कर सीधे हमारे ड्राइवर के पास आकर, माँ बहन की गालियां निकालने लगी। लड़की के मुँह से धाराप्रवाह गंदी गंदी गालियां सुनकर मै भी सकते मे आ गया। ऐसा नही कि हमने गालियां नही सुनी/दी, लेकिन फैमिली के साथ बातचीत के दौरान मजाल है कि कभी मुँह से कोई भी गलत शब्द निकल जाए। लेकिन लड़की के मुँह से धाराप्रवाह गालियां सुनकर, हम तो एकदम से सकते मे आ गए।

लड़की पढी लिखी लग रही थी, हमने तुरन्त हस्तक्षेप किया और पूछा कि शक्ल से तो तुम पढी लिखी लगती हो, क्या यही सही तरीका है रोड पर व्यवहार करने का। क्या यही कहती है हमारी सभ्यता? लड़की पर तो जैसे मेरी बात का कुछ असर ही नही हुआ, वो बदतमीजी से व्यवहार करती रही, ड्राइवर के गिरेहबान पर हाथ डालने लगी। ड्राइवर ने हमारी तरफ़ देखा, हमने भी बात न बनते देख, उसको आंखो ही आँखो मे गो अहेड का संकेत दे दिया, फिर क्या था, ड्राइवर ने उतर कर उसको उसी की भाषा मे समझाया कि गलती तुम्हारी थी, और अगर तुम इसी तरह से व्यवहार करती रही तो तुमको सीधे अंदर करवा देंगे। गालियों का बदला गालियों से मिलता देख, लड़की बड़बड़ाती हुई अपनी गाड़ी की तरफ़ चली गयी।

अब दोनो किस्से आपने सुने/पढे, आप खुद ही फर्क देखिए। दिल्ली मे घटित ने मुझे कई बातों सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि :

  • क्या हमे सड़क पर व्यवहार करने का तरीका नही आता?
  • क्या हम गाड़ी खरीदकर सोचते है हमने सड़क भी खरीद ली है?
  • क्या हमारी लाइफस्टाइल काफी तनावपूर्ण है, और उस तनाव को हम सड़क पर निकालते है?
  • क्या हमे सड़क पर चलने वाले दूसरे लोगों की कतई परवाह नही होती?

आपका क्या सोचना है इस बारे में? अपनी प्रतिक्रिया लिखना मत भूलिएगा।

रीठेल : कलियुग मे लंका सेतु निर्माण

साथियों, पेश है, लगभग तीन साल पहले लिखा हुआ मेरे एक लेख का रीठेल। यह एक काल्पनिक लेख है, इसका उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना नही है। इसलिए इसको सिर्फ़ मनोरंजन की दृष्टिकोण से ही पढा जाए।

सबसे पहले तो एक डिसक्लेमर: यह एक काल्पनिक लेख है, इसका उद्देश्य लोगों को हँसाना है, ना कि किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना। इसलिये कोई चप्पल जूता लेकर हमारे द्वारे ना आये। और एक आवश्यक सूचना यदि इस डिसक्लेमर के बावजूद आप आवेश मे आकर अपने चप्पल हमारी तरफ़ फ़ेंक कर मारे तो कृप्या करके दोनो पैरो की चप्पले फ़ेंके, अन्यथा एक चप्पल हमारे किसी काम की नही, उसे वापस आपकी तरफ़ उछाल दिया जायेगा।

अभी कुछ दिनो पहले मेरे को किसी ने एक मेल फ़ारवर्ड की थी, जिसमे भगवान श्रीराम द्वारा,त्रेता युग मे लंका पर चढाई के लिये रामेश्वरम से श्रीलंका तक बनाये गये पुल की सैटेलाइट इमेज के चित्र थे, बाद मे पता चला किसी रामभक्त ने बहुत जतन से उन चित्रों को असली रूप देने की कोशिश की थी। ताकि रामायण की सत्यता सिद्द की जा सके। अब मै यहाँ पर उन चित्रों की सत्यता और असत्यता सिद्द करने नही बैठा हूँ बल्कि मै तो बस ये अन्दाजा लगा रहा था कि यदि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने वो पुल त्रेता युग की जगह कलियुग मे बनाया होता तो क्या नजारा होता। जरा आप भी देख लीजिये, तो जनाब पेश है, किस्सा ए लंका सेतु।


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चित्र साभार : डीएनए अखबार

राम बड़े हैरान परेशान से इधर उधर टहल रहे थे, समुन्द्र देवता भी कुछ कोआपरेट नही कर रहे थे, लक्ष्मण ने भाई को चिन्तावस्था मे देखा तो पूछा “ऐसा क्या मसला है बिग ब्रदर, व्हाई आर यू सो टेन्सड?” राम ने दु:खी अवस्था मे कहा ” ये समुन्दर देव हमारी बात सुन ही नही रहे, लगता है इनको कुछ डोज देना ही पड़ेगा।” इतना कहकर उन्होने अपने हाई टेक धनुष बाण को उठाया और गाइडेड तीर को समुन्दर की तरफ़ तान दिया। समुन्दर पानी पानी से धुंआ धुंआ हो गया, बहुत विचलित हो गया, उसने भी सुन रखा था, यदि बाण, धनुष से निकल गया तो फ़िर कुछ नही किया जा सकता, इसलिये मान्ड्वली करने मे ही भलाई है। लेकिन क्या करे, एक तरफ़ रावण (सो काल्ड भाई॒!) और दूसरी तरफ़ कल के लड़के।इधर कुंआ और उधर खाई, पिटाई तो दोनो तरफ़ से ही होनी थी, लेकिन फ़िर भी समुन्दर ने बीच का रास्ता निकालते हुए राम को पुल बनाने का सुझाव दिया। ये सुझाव हजार बवालों की जड़ थी, मुझे आज तक समझ मे नही आया, पुल बनाने के सुझाव को क्यों एक्सेप्ट कर लिया गया।बीच से समुन्दर को सुखाकर अपने आप रास्ता बनाने का सुझाव तुलसीदास को क्यों नही आया। Read the rest of this entry »

09/09/2009 यानि एक साल और कम

आज 09/09/09 है। यानि कि नौ सितम्बर दो हजार नौ। एक ऐसा दिन जो दोबारा मेरी जिन्दगी मे नही आएगा। वैसे आज का दिन कुछ खास भी है, क्योंकि आज के दिन ही मै पैदा हुआ था। अब कितने साल का हो गया, ये मत पूछना, मै शरमा जाऊंगा। वैसे दिल से तो मै अभी भी स्वीट सिक्स्टीन ही हूँ। ये आप लोगों का प्यार है तो जो मुझे सदा जवां रहने की प्रेरणा देता है।

एक शुकुल है जो हमारे बारे मे ढेर सारी अफवाहें उड़ाता रहता है, जिसमे से एक अफवाह ये है कि हम बड़े कलाकारी व्यक्ति है। ये तो शुकुल की आंखों का भ्रम है, शायद (उसके) बुढापे के कारण आंखो मे मोतियाबिंद उतर आया होगा, इसलिए ऐसी गलत सलत खयालात दिमाग मे आ गए होंगे। वैसे मै कोई कलाकार वगैरहा नही हूँ, इसलिए आप शुकुल के बहकावे मे ना आएं। अगर आ गए, तो रिस्क आपका। अब मै कोई महान आत्मा तो हूँ नही जो मेरी जीवनी लिखी जाए, इसलिए ये काम भी हम गाहे बगाहे स्वयं करते रहते है। अलबत्ता शुकुल ने दो एक बार जीवनी लिखने के नाम पर मेरी ढेर सारी खिंचाई की थी, आप उसके ब्लॉग पर जरुर पढना और खुद डिसाइड करना उसने दोस्ती निभायी है या ….। इंशा अल्लाह ऐसे दोस्त हो तो बाकी…. किसी चीज की जरुरत ही क्या।

मेरी जन्मदिन की यादों मे मुझे याद आता है कि आज का दिन विशेष हुआ करता था, आज के दिन घर मे मेरी पसंद का खाना बनता था, काफी कुछ पकवान वगैरहा बनते थे। जिसको हम सबसे पहले अनाथालय और मंदिर के बाहर बैठे भिखारियों को खिलाते थे। उस जमाने मे बर्थडे केक नाम की चीज नही हुआ करती थी, होती भी होगी, हमारे घर मे ये परम्परा नही थी। अलबत्ता मेरे इसरार करने पर मम्मी आटे का हलवा बनाती थी, जिसको हम चम्मच से काटकर खुश हो लिया करते थे। जन्मदिन पर हमारे लिए छूट थी कि हम चाहें तो स्कूल जाए अथवा ना जाएं, जाहिर है, हम स्कूल नही जाना ही पसन्द करते थे। आज के दिन खेलने के नाम पर भी हमे जल्दी आवाज नही दी जाती थी। अब अगर हम स्कूल नही जाते तो जाहिर है टिल्लू और धीरू भी स्कूल नही जाते, तीनो मोहल्ले मे धमाचौकड़ी मनाते। काश! फिर लौट आएं तो पुराने दिन। इसके अलावा आज के दिन मोहल्ले वालों की शिकायत पर भी कोई कान नही देता था। अब जन्मदिन वाले दिन बच्चें को पीटना कोई अच्छी बात थोड़े ही है।

ऐसे कई जन्मदिन आते गए, हलवे बनते रहे। माताजी के गुजरने के साथ साथ हलवा बनने की प्रक्रिया तो समाप्त हो गयी, लेकिन गाहे बगाहे परिवार वाले केक कटवाते रहे, इस बार मैने केक भी ना काटने का निर्णय लिया है। जन्मदिन पर मै अनाथालय और वृद्द आश्रम जरुर जाता हूँ और यथाशक्ति अपना सहयोग कर आता हूँ। ये आदत आजतक कायम है और ईश्वर करे हमेशा जारी रहे। हमारे स्वर्गीय चाचाजी ने ये आदत डलवायी थी, उनका मानना था जन्मदिन की पार्टी करना घोर अपराध है, उतने पैसे मे ना जाने कितने गरीबों का भला किया जा सकता है। इसलिए हम लोग भी (भले डर के मारे) चाचाजी की हाँ मे हाँ मिलाते हुए, जन्मदिन की पार्टी मनाने की जिद नही करते थे। वैसे भी आजकल जब भी कोई हमसे जन्मदिन की पार्टी मांगने की जिद करता है तो हम चाचाजी वाला रिकार्ड सुना देते है, लेकिन दोस्त यार और घरवाले मानते थोड़े ही है। कंही ना कंही कुछ खिचड़ी पक रही होगी, शाम को ही पता चलेगा।चलिए जी, अब लेख को यही समेटते है, यादें तो कभी खत्म नही होंगी, फिर बैठेंगे कभी यादों का पुलिन्दा लेकर। आते रहिए पढते रहिए, आपका पसन्दीदा ब्लॉग।

जाते जाते : जन्मदिन की गिफ़्ट
इस बार बच्चों ने जिद करके इस जन्मदिन पर हमारा मोबाइल नोकिया N70 विदा करवाया। अब हम ठहरे नोकिया प्रेमी इसलिए नोकिया का E71 (देखें नीचे वाला चित्र) खरीदवाया गया। इस तरह से एक जिन्दगी एक मोबाइल वाला सिद्दांत खत्म, आज से नोकिया E71 का प्रयोग शुरु। इस प्यारी गिफ़्ट के लिए बच्चों को ढेर सारा प्यार।

From MeraPannaPhoto

फोटो सौजन्य से :Urbanmixer at Flickr

मेरा पन्ना के पाँच साल पूरे

लीजिए जनाब, मेरे हिन्दी ब्लॉग मेरा पन्ना के इसी सप्ताह पाँच साल पूरे हो गए। ये पाँच साल कब गुजर गए पता ही नही चला। पाँच साल के जीवन काल मे मै ब्लॉगिंग के विभिन्न चरणो से गुजरा। नव ब्लॉगर से उत्साही ब्लॉगर, उत्साही ब्लॉगर से स्थापित ब्लॉगर, अच्छी कमाई करने वाला ब्लॉगर होते होते, मेरे को हिन्दी ब्लॉगिंग का नारदमुनि बनाने मे मित्रों ने देर नही की। हिन्दी ब्लॉगिंग का परिवार भी एक छोटा मगर काफी सक्रिय परिवार है। इस परिवार मे आकर पाँच साल कैसे बीते पता ही नही चला।

ब्लॉगिंग से ही ढेर सारे साथियों से मुलाकात हुई, जिनसे घर के जैसे रिश्ते बनते चले गए। ब्लॉगिंग ने मुझे काफी कुछ दिया है। परदेस मे रहकर भी मै देश से जुड़ा हुआ हूँ, अपने देश, अपनी सभ्यता, संस्कृति और भाषा से जुड़ना किसे नही अच्छा लगता। मुझे कभी भी नही लगा कि मै अपने देश से दूर हूँ, बल्कि मै तो पूरी तरह से जुड़ाव महसूस करता हूँ।

मेरे ब्लॉगिंग के सफर मे शुरु के तीन साल मै पूरी तरह से सक्रिय रहा। हिन्दी ब्लॉगिंग से जुड़े किसी भी प्रोजेक्ट मे बराबर का भागीदार रहा। भागीदार क्या, केंद्र मे रहा। ढेर सारे तकनीकी लोगों को इकट्ठा किया और अपनी तकनीकी मार्केटिंग,पीपल मैनेजमेंट और प्रोजेक्ट मैनेजमेंट के ज्ञान को सहकारी प्रोजेक्ट मे प्रयोग किया। इसमे कई बार ढेर सारी सफलताएं मिली, शाबासी मिली, अनबन हुई, आलोचनाए हुई, कई बार असफलताओं का भी मुँह देखना पड़ा। लेकिन प्रत्येक असफलता ने दोबारा जोश से काम करने की प्रेरणा दी। प्रत्येक अनबन से लोगों को समझने का मौका मिला, रिश्ते और प्रगाढ होते गए। आलोचनाओं से समस्याओं को देखने का दूसरा नजरिया मिला, आत्मचिंतन और आत्ममनन करने का मौका मिला। कुल मिलाकर बहुत अच्छा अनुभव रहा। अक्सर लोग पूछते है, मै इतना सब करने के लिए समय कैसे निकाल पाता हूँ, इसका श्रेय मे देना चाहूंगा हिन्दी ब्लॉगिंग जगत के दोस्तों के प्यार और विश्वास को, जिनके कारण मुझे इतना काम करने की प्रेरणा मिली। साथ ही मै अपने परिवार का भी धन्यवाद करना चाहूंगा जिन्होने मुझे इस कार्य मे पूरा पूरा सहयोग किया।


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चित्र सौजन्य : बैंगानी बंधु

पिछले दो सालों से मै कुछ ज्यादा सक्रिय नही रह सका, इस साल तो लगभग ना के बराबर ब्लॉगिंग की, इसी कारण शुकुल बोलते है, तुम्हारे ना होने से कितनी शांति है इधर। सक्रिय ना रहने के कारण? कई है, अव्वल तो ऑफिस मे कुछ काम ज्यादा बढ गया है, नौकरी भी बचानी है, मैनेजमेंट बदल गया है, इसलिए मुझे भी नए मैनेजमेंट के साथ तालमेल बिठाने और अपनी कार्यकुशलता दिखाने कुछ समय लगेगा। इसलिए ब्लॉगिंग कुछ समय के लिए बैक बर्नर पर चली गयी है। लेकिन इसका मतलब यह कतई नही कि मै ब्लॉगिंग से विरक्त हो गया हूँ, ब्लॉगिंग कभी नही छूट सकती। अलबत्ता कुछ समय के लिए अवकाश जरुर ले सकता हूँ। उम्मीद है आप सभी पाठकों का सहयोग मिलता रहेगा।

कई बार लोगों ने पूछा है आप हिन्दी ब्लॉगिंग से कमाई कैसे कर लेते है? मै कहूँगा ईश्वर की कृपा है और पाठकों का प्यार। हर महीने गूगल एडसेंस से आने वाले चैक इस बात के गवाह है। अब कितने के चैक आते है, इसका खुलासा मै यहाँ नही कर सकता क्योंकि गूगल एडसेंस इस बात की इजाजत नही देता। लेकिन इतना जरुर कह सकता हूँ कि जितने पैसे भी आते है, उसका आधा मै दान कर देता हूँ, (नोट: कृपया चंदा मांगने का कष्ट ना करें।), बाकी का मै डकार जाता हूँ।

इंटरनैट पर हिन्दी का बढता प्रसार देखकर मै काफी खुश हूँ, विशेषकर पिछले तीन सालों से इंटरनैट पर हिन्दी की काफी वैबसाइट आयी है, विकी पर भी लोगों का सहयोग बढ रहा है। लेकिन अभी भी जितनी उम्मीद थी, उतना नही है, लेकिन फिर भी संतोषजनक है। आशा है आने वाले वर्षों मे यह प्रसार बढता चला जाएगा।

मेरा पन्ना के पाठकों से मेरा निवेदन है कि मेरे पाँच साल से लिखे लेखों को पढे, टिप्पणियां करे। पुराने लेख जो कई साल पहले लिखे गए है, आज भी प्रासंगिक है। मनोरंजन प्रधान पाठकों को कहूँगा कि वे मोहल्ला पुराण पढे, मिर्जा साहब के मुरीदों के लिए मिर्जा उवाच भी हाजिर है। तकनीकी लेख मैने ज्यादा नही लिखे है, लेकिन जो भी लिखे है वे पठनीय है। अलबत्ता अर्थव्यवस्था वाले लेख मुझे भी काफी पसन्द है, जो अब काफी सारी वैबसाइट पर भी उपलब्ध है। शायद अगले कुछ समय मे अर्थव्यवस्था वाले लेखों पर ध्यान दूं, क्योंकि बिजिनिस वैबसाइट मुझसे पूरे साल का करार करने की इच्छुक है, इसलिए लिखना ही पढेगा। खैर आप आते रहिए और पढते रहिए।

देखिए बातों बातों मे लेख बहुत लम्बा होता चला गया। बेतरतीब बातें करने मे ऐसा हो ही जाता है। अब लेख को यही समेटते है, नही तो शुकुल गरिआएगा, कि हमारे तीन पन्ने के लेख को लम्बा बोलते हो और अपने ढाई पन्ने वाले लेख को छोटा। आप सभी लोगों के प्यार,सम्मान, प्रोत्साहन, आलोचनाओ और टिप्पणियों का ढेर सारा धन्यवाद, आशा है आप ये अपना प्यार आने वाले वर्षों मे भी प्रदान करते रहेंगे, इसी विश्वास के साथ।