श्री रामचरित मानस

आइये आज कुछ बात करते है, ब्लॉगजगत के कुछ यादगार लम्हों की।  बात कुछ २००६ की है, जब हम हिंदी ब्लॉगजगत में स्थापित होने की कगार पर थे।  हर रोज कुछ ना कुछ नयी खुराफात करने की कोशिश करते थे,  इसी कोशिश का नतीजा था , श्री रामचरित मानस को इंटरनेट पर देखने का, वैसे तो कई संस्करण उपलब्ध थे, लेकिन यूनिकोड पर एक भी ना था, लिहाज़ा  हमने सुन्दर काण्ड लिख मारा।  अब पन्गा तो ले ही लिया था, अब बाकी का काम कैसे हो, तो पुराने साथियों शुकुल और रवि भाई को साधा गया।  दोनों को पूर्ण सहयोग से हमने जुलाई २००६ में श्रीरामचरित मानस को इंटरनेट पर स्थापित किया।

कोशिश यही थी कि  इसे हर जगह प्रदर्शित किया जाए, इसलिए हमें जो भी प्लेटफार्म (ब्लॉगर, वर्डप्रेस, या अन्य ) मिले वहां पर इसको स्थापित किया गया , ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इसको देखकर , नित्यदिन पढ़े और लाभान्वित हो। काफी वर्ष ऐसा ही चलता है, सैकड़ों  टिप्पणियों और उस से भी ज्यादा पाठकों की धन्यवाद मेल देखकर दिल गदगद  हुआ।  समयाभाव के कारण या कहो हमारी सुस्ती के कारण इसको अपनी साइट पर नहीं ले जा सके और ना ही उसमे कुछ नया फ़ीचर डाल सके।  अभी पिछले दिनों कुछ समय मिला था तो इसको हमने अपने सर्वर पर स्थापित किया और उसने काफी सारे नए फ़ीचर जोड़े हैं। साइट का नया पता यहाँ पर है।

आइये कुछ बात करते है नए फ़ीचर की, हमने थोड़ा प्रयास किया है, आपका सहयोग रहेगा तो और भी काम आगे बढ़ेगा। नए फीचर में हमने जो जोड़ा है :

  1. रामायण जी की आरती  – यह नया पेज बनाया गया है, आप पसंद करेंगे।
  2. रामायण प्रश्नावली – हमने आपकी जानकारी परखने के लिए रामायण प्रश्नावली प्रस्तुत करी  है, इसके नित नए संस्करण लाते रहेंगे, आपको पसंद आएंगे।
  3. रोचक तथ्य – श्री रामचरित मानस से सम्बंधित कुछ रोचक तथ्यों को एक साथ दर्शाया गया है, उम्मीद है आपको पसंद आएंगे.
  4. हनुमान चालीसा – पाठकों की विशेष मांग पर हनुमान चालीसा को भी इस साइट पर जोड़ा गया है, आशा है आपको पसंद आएगा।
  5. मोबाइल एप्लिकेशनश्री रामचरित मानस का एंड्रॉइड पर एप्लीकेशन गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध कराया गया है, आशा है आपको पसंद आएगा।

अभी बहुत कूछ है दिमाग में , जिसको कार्यान्वित किया जाएगा, आपसे निवेदन है  कि साइट का विजिट करें और हमें और सुझाएं ताकि हम इसमें और भी फ़ीचर जोड़ सके।

तो फिर आते रहिए पढ़ते , आपका पसंदीदा ब्लॉग।

 

रैनसमवेयर

आजकल हर तरफ जिधर देखो उधर रैनसमवेयर  की ही चर्चा है, लेकिन ये है क्या? सभी लोग इस से भयभीत क्यों है? आइये कुछ जानकारी करते है।  मै  हूँ जीतेन्द्र चौधरी, हर तकनीकी विषय को आपकी भाषा और आपके लेवल पर समझाने  वाला, आपका दोस्त, हमदम और मददगार ।

रैनसमवेयर क्या होता है?

पुराने समय में हम लोग सभी कुछ इंटरनेट पर नहीं करते थे, आजकल तो जो भी है, सब ऑनलाइन है, हमारी इमेल्स , खाताबही, सोशल मीडिया और हर वो छोटी बड़ी चीजें हो कभी डायरी और दिमाग में हुआ करती थी, आजकल ऑनलाइन है।  हमारा सारा हिसाब किताब, एक कंप्यूटर के अंदर समाया हुआ है, देखा जाए तो पूरी की पूरी दुनिया ही कम्प्यूटर के अंदर है।  अब जब सब कुछ एक ही जगह है तो उसकी कुछ सुरक्षा तो होनी ही चाहिए ना ? बस यहीं पर हम मात खा जाते है।  हम कम्प्यूटर, लैपटॉप और मोबाइल तो महंगे से महँगा खरीदेंगे लेकिन उसकी सुरक्षा के लिए कोई 500 रुपये का सॉफ्टवयेर नहीं लेंगे।  खैर ये तो बात थी हमारी, हम बात कर रहे थे,  रैनसमवेयर  की।

computer virus photo

दरअसल रैनसमवेयर कुछ दुष्ट प्रजाति के प्रोग्रामर्स की खुराफाती दिमाग की उत्पति है, जो दुनिया को परेशान करना चाहते हैं।  रैनसम माने अपहरण , फिरौती।  जैसे पुराने समय में जग्गा डाकू , लाला के बच्चे  को  उठाकर ले जाते थे, फिर फिरौती की रकम वसूलते थे, बस कुछ वैसा ही, रैनसमवेयर  वाले खुराफ़ातिये  कर रहे है।  अब लाला तो अपने बच्चे की फिरौती देने से रहा , इसलिए लाला के बच्चे की जगह आपके कंप्यूटर का डाटा हो गया है।  रैनसमवेयर वाले आपके कंप्यूटर पर एक प्रोग्राम डाल  देते है, जो बस चुपचाप आपकी गतिविधियों को रिकॉर्ड करता रहता है, जिस दिन उसके आका का फरमान होता है, उस दिन आपका डाटा एन्क्रिप्ट यानी कूट भाषा में बदल दिया जाता है। साथ ही आपका अपना कंप्यूटर अब किसी और के आधीन हो जाता है, आप कुछ भी नहीं कर सकते।आपको पता तभी चलता है, जब उसके आका यानी रैनसमवेयर वाले की फिरौती वाली चिट्ठी आपको मिलती है। अब बस फिरौती की रकम का खेला शुरू होता है, कोई दे देता है, कोई नहीं देता, कोई शर्म के मारे बताता नहीं, कोई पुलिस को बताता है, कोई पेशेवर सुरक्षा वालों की शरण में चला जाता है।  लेकिन भाई उस खुराफाती बन्दे का उद्देश्य पूरा हुआ, उसको बताना था, आपकी सुरक्षा में सेंध कैसे लगायी जा सकती है।

हम तो छोटे लोग है, कोई हमारा क्या बिगाड़ लेगा?

सही कहा, आप उनके टारगेट हो भी नहीं, उनका टारगेट तो सभी बड़ी कंपनियां है, जो बड़े बड़े नेटवर्क पर काम करती है, जहाँ एक दिन का नुकसान भी लाखों करोडों में होता है।  लेकिन मान लो, आप अपना सारा हिसाब किताब अपने कंप्यूटर पर रखते हो, सारा ऑनलाइन बैंकिंग, पासवर्ड, सब कुछ, वो तो जग्गा डाकू के हाथ लग गया ना।  तो  यदि आप इस समस्या से ग्रस्त हो, तो सबसे पहले दुसरे कंप्यूटर पर जाकर, अपने पासवर्ड बदल डालिये, बैंक को भी बोलिये, कोई भी ऑनलाइन ट्रांसैक्शन न करे।  लेकिन ये समस्या आयी कैसे? मैंने तो सबसे अच्छा कंप्यूटर खरीदा था?

समस्या कहाँ है?

जे हुई ना  बात! समस्या है, कंप्यूटर का प्रोग्राम बनाने वाले आपरेटिंग सिस्टम में, आपकी कंजूसी में, आपकी लापरवाही में और सबसे बडी आपकी ललक में , जो हर ऐरी गैरी चीज को डाउनलोड और खोलकर देखते हैं,  और बेईज्जती कराना चाहते हैं ? खैर आप तो बदलोगे नहीं, आइये इलाज़ की बात करते है।

कोई इलाज़ है क्या?

है ना ,  क्यों नहीं होगा इलाज़ ? सबसे पहले तो आप अपना घर चैक  करिये, अपने नुक्सान का जायज़ा  लीजिये।  पता करिये आपके पास अपने डाटा का बैकअप है क्या? क्या कहा?  बैकअप क्या होता है? बहुत सही, ठीक है भाई आप जग्गा डाकू को पैसे दे आइये, जब आपको बैकअप नहीं पता तो फिर क्या बताएं। जिनके पास बैकअप है, वो नुकसान का जायजा लें, अपने कंप्यूटर को फॉर्मेट करिये , कोई अच्छा सुरक्षा सिस्टम लगाइये और नयी शुरुवात करिये।

उनको पैसे देंकर समस्या सुलझा लें क्या?

कतई  नहीं, आप पैसा देंगे तो वो लोग सुधरने की बजाय और दुष्ट लोगों को इकठ्ठा  करके इस से भी भयंकर हमला करेंगे।  आप फिरौती देकर भी उनकी नज़रों में  आ जाएंगे,  क्या गारंटी है कि अगली बार वो दूसरे नाम से अपहरण कांड नहीं  करेंगे।  यदि आप इस समस्या से ग्रस्त है, तो सबसे पहले किसी पेशेवर को संपर्क करिये, जो आपको सही सलाह देगा, पुलिस में इत्तिला करिये, साइबर क्राइम वालों को बताइये और सबसे बड़ी बात,  दृढ़ निश्चय करिये, कि आप फिरौती नहीं देंगे।

आगे के लिए क्या सबक है?

सबसे बड़ा सबक यही है, कि एक दूसरी हार्डडिस्क , उसमे अपना बैकअप लेकर रखें।  किसी भी ऐसी गैरी, नंगी पुंगी ललचाती हुई फाइल को ना खोलें, कोई अच्छा सा एंटी वायरस खरीदें (कॉपी वाला मत लेना, नहीं तो फिर फँसोगे ), अपनी जानकारी कूट भाषा में रखें, किसी को भी थाली में परोस कर मत दें।  बस यही सबक है, चलो भैया , आज  के लिए बस इत्ता ही, फ्री में क्या बच्चे की जान लोगे?

आते रहिये पढ़ते रहिये, यदि आपको मेरा ब्लॉग पसंद आया तो यहाँ पर टिप्पणी  करिये, मोबाइल एप्लीकेशन डाउनलोड करिये, गूगल प्ले स्टोर पर जाकर मेरे एप्लीकेशन की रेटिंग करिये।

 

 

समस्या और अंतरात्मा की आवाज

साथियों आइये आज कुछ अलग तरह की बात करते  है।  लेकिन  पहले आपको एक छोटी सी कहानी सुनाना चाहता हूँ, सुनेंगे ना ?

एक बार की बात है, एक राजा ने सुंदर सा महल बनाया  और महल के मुख्य द्वार पर एक गणित का सूत्र लिखवाया
और घोषणा की की इस सूत्र से यह द्वार खुल जाएगा और जो भी सूत्र को हल कर के द्वार खोलेगा में उसे अपना उत्तराधिकारी  घोषित कर दूंगा………..
राज्य के बड़े बड़े गणितज्ञ आये और सूत्र देखकर लोट गए किसी को कुछ समझ नहीं आया ……..
आखिरी  तारीख आ चुकी थी
उस दिन 3 लोग आये और कहने लगे हम इस सूत्र को हल कर देंगे
उसमे 2 तो दूसरे राज्य के बड़े गणितज्ञ अपने साथ बहुत से पुराने गणित के सूत्रो की किताबो सहित आये
लेकिन एक व्यक्ति जो साधक की तरह नजर आ रहा था सीधा साधा कुछ भी साथ नहीं लाया उसने कहा में बेठा हूँ  यही पास में ध्यान कर रहा हूँ
अगर पहले ये दोनों महाशय कोशिश  कर के  द्वार खोल दे तो मुझे कोई परेशानी नहीं
पहले इन्हें मोका दिया जाए
दोनों गहराई से सूत्र हल करने में लग गए लेकिन नहीं कर पाये और हार मान ली

अंत में उस साधक को ध्यान से जगाया गया और कहा की आप सूत्र हल करिये ऑप का समय शुरू हो चुका हे
साधक ने आँख खोली और सहज मुस्कान के साथ द्वार की और चला
द्वार को धकेला और यह क्या। .. द्वार खुल गया

राजा ने साधक से पूछा आप ने ऐसा क्या किया

साधक ने कहा जब में ध्यान में बेठा तो सबसे पहले अंतर्मन से आवाज आई की पहले चेक कर ले की सूत्र हे भी या नहीं
इसके बाद इसे हल करने की सोचना और मैंने वही किया।

ऐसे ही कई बार जिंदगी में समस्या होती ही नहीं  और हम विचारो में उसे इतनी बड़ी बना लेते हे की वह समस्या कभी हल न होने वाली है लेकिन हर समस्या का उचित इलाज आत्मा की आवाज है।  साथियों आज  ज्ञान यहीं तक था, किसी भी समस्या को इतना बड़ा मत बनाइए की वो आप पर हावी हो जाए, अपने दिल की बात सुनिए , ऐसे कोई समस्या ही नहीं जिसका कोई समाधान ना  हो।

इधर उधर की

अभी पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ, बीजेपी ने सभी अनुमानों को गलत साबित  करते हुए उत्तर प्रदेश में जोरदार वापसी करी।  इस तरह से मुलायम यादव  के पुत्र अखिलेश यादव के शासन का पटाक्षेप हुआ, ये जीत कई मायनो में महत्वपूर्ण थी , क्योंकि सपा की कलह , जाटों  की अजित सिंह से नाराजगी, मायावती का बिखरा हुआ वोट बैंक, छोटी छोटी पार्टियों का बीजेपी को समर्थन , सब कुछ काल्पनिक सा लग रहा था, लेकिन अमित शाह ने ऐसा कर दिखाया। मानना पड़ेगा , बन्दे में दम है, इतने दिनों की मेहनत  रंग लायी और बीजेपी सत्तासीन हुई.

लेकिन अभी सरप्राइज और भी बाकी  थे, इसलिए बीजेपी ने बाकी सभी को दरकिनार करते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी योगी आदित्यनाथ को थमाई। योगी आदित्यनाथ यूपी में बीजेपी के ब्रांड प्रचारक थे, मुख्यमंत्री की दौड़ में अगली पंक्ति में  थे, लेकिन पहले नंबर थे या नहीं कहना मुश्किल है। सुना है नागपुर से एक फ़ोन आया और योगी का रास्ता साफ़ हुआ।  दिल्ली में मोदी और यूपी में योगी सच साबित हुआ।  अब जैसा की हर बार होता है, योगी ने आते ही अखिलेश के कई फैसलों को  उलट पलट कर दिया। राजनीतिक भाषा में इसे सरकारी फैसलों की समीक्षा कहते हैं, अब जब फैसले पलटने ही है, तो समीक्षा काहे, सीधे सीधे बोलो, बदलना है, जनता ने पूरा पूरा हक़ दिया है।  कुछ भी हो, योगी के आने से बड़े बड़े मंत्री और संतरियों की पेंट ढीली हो गयी है, काहे? अब काहे का, योगी ठहरे योगी, सादगी से खुद भी रहेंगे और सभी मंत्रियों को भी रहने के लिए मजबूर ( सॉरी सॉरी प्रेरित  बोलते हैं )  करेंगे। सारे वीआईपी लोगों की नाक में दम  हो रखा है, उधर रही सही कसर दिल्ली के नए  फरमान ने निकल दी।

दिल्ली  से नया  फरमान आया है की अब अभी वीआईपी है, कोई भी गाडी में लाल बत्ती नहीं लगाएगा। भला ये भी कोई बात हुई, खाने तो पहले ही नहीं देते थे, अब जीने भी नहीं  देंगे?  पुराने ज़माने की कहानियों में सुनते थे, दैत्यों को जान तोतों में हुआ करती थी,  नए ज़माने में नेताओं की जान लाल बत्ती वाली गाडी में,  ना ना भाई, हमने किसी नेता को दैत्य नहीं  बोला  ये  आपकी कल्पनाशक्ति है, हम इसमें कुछ नहीं कर सकते।

बीजेपी के मार्गदर्शन मंडल में पूर्ण रूपेण फुल्ली फालतू बैठे बुजुर्गों पर नयी गाज गिरी है, अब क्या उनको मंडल से भी हटाया है ? नहीं भई , सुप्रीम कोर्ट ने दोनों बुजुर्गों को बाबरी मस्जिद वाले केस में लपेट  लिया है। अब नियति में  लिखा है उस पर किसी का बस थोड़े ही है,  अब कहाँ वो दोनों राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के सुहाने सपने देख रहे थे, अब कहाँ रोज रोज कोर्ट कचहरी के चक्कर , ये तो बहुत नाइंसाफी  हुई उनके साथ।  कोर्ट के फ़ैसले  से दो बाते हुई, ये दोनों बुजुर्ग मंडल में बने रहेंगे , राष्ट्रपति पद की रेस में शामिल नहीं  और दूसरा राम मंदिर का मुद्दा लगातार गरमाता रहेगा।  मोदी की विन विन है।

अभी समेटते है, वीकेंड का टाइम है, घर का सामान लाने भी जाना है, नहीं तो ऐसा ना हो कि  श्रीमती जी हमारी समीक्षा करते हुए, हमें मार्गदर्शक मंडल तक ही सीमित कर दें , आप भी अपना अपना काम काज देखो, आते रहो, पढ़ते रहो, आपका पसंदीदा  ब्लॉग मेरा  पन्ना।

 

 

 

 

मेरे प्यारे भाइयों

क्यों ये शीर्षक कुछ जाना पहचाना सा लगा ना? आज कई सालों के बाद ब्लॉग़ को देखने की सुध ली है, कुछ बाते भी साझा करनी थी, इसलिए सोचा क्यों ना कोई ऐसे शीर्षक से शुरुवात की जाए ताकि ज्यादा लोगों का ध्यान आकर्षित हो सके. सबसे पहले तो सभी पाठकों से माफ़ी चाहता हूँ, लगभग दो साल बाद लिख रहा हूँ , इस बीच ना जाने कितने सावन और बसंत निकल गए, आज लिखने के लिए गूगल का नया क्रोम प्लग-इन प्रयोग कर रहा हूँ, इसलिए थोड़ी पूर्ण विराम जैसी गलतियां स्वाभाविक है।

पहली अच्छी खबर कि मेरा पन्ना का एंड्रॉइड मोबाइल एप्लीकेशन आ गया है, ये रहा लिंक। आप इसको अपने मोबाइल पर लगा सकते हैं और प्रयोग करिये। अपनी प्रतिक्रिया ब्लॉग और गूगल प्ले स्टोर देना मत भूलें। हो सकता है, पहले वर्जन में कुछ गलतियां रह गयी हो, उनको अगले संस्करण में सुधारने का पूरा प्रयास किया जाएगा।

 

दूसरी अच्छी खबर ये कि मैंने ब्लॉगिंग में वापसी की है इस बार हिंदी और अंग्रेजी दोनों में एक साथ।  मेरा अंग्रेजी ब्लॉग  JCWebTech यहाँ पर उपलब्ध है, यह ब्लॉग पूर्ण रूप से तकनीकी होगा , दोनों ब्लॉग पर लगातार लिखने की पूरी कोशिश की जायेगी।  अंग्रेजी ब्लॉग का मोबाइल एप्लिकेशन इसी हफ्ते प्ले स्टोर पर अपलोड हो जाएगा। उम्मीद है आप का स्नेह दोनों ब्लॉग पर बना  रहेगा।

साथ ही मेरा पन्ना का रंग रूप भी निखारना है, थोड़ा समय लगेगा, लेकिन जल्द ही करूंगा। लिखने को बहुत कुछ है, लेकिन आज के लिए सिर्फ इतना ही, जल्द ही शुरू होगा , मेरा पन्ना का नया सफर आपके दिल की बात , आपके साथ , आते रहिये और पढ़ते रहे रहिये आपका पसंदीदा ब्लॉग मेरा पन्ना  सभी का पन्ना।

आज का विचार

क्या हम भारतीय गंदगी पसंद लोग है?

जब हम विदेशों में जाते हैं, तो बड़े सभ्य बन जाते हैं, लेकिन भारत लौटने पर फिर वही करने लगते हैं, जैसा बाकी कर रहे होते हैं। आखिर क्या वजह है कि हम गंदगी से पीछा नही छुड़ा पाते? 

अपने विचार टिप्पणी में व्यक्त करिएगा । आते रहिए और पढते रहिए अपना पसंदीदा ब्लॉग।

 

 

 

 

चुनाव और नेताओं की आत्मा की आवाज

बहुत दिनों बाद आपसे मुखातिब हुआ हूँ, क्या करें मुआ ट्विटर और फेसबुक जान छोड़े तब ना। आज भी ये वाली पोस्ट मोबाइल से ही लिख रहा हूँ, लैपटॉप खोले तो जमाना हो गया।

तो भैया, हम बात कर रहे हैं नेताओं की अंतरात्मा की, मिर्जा पीछे से बड़बड़ा रहे हैं ‘जो चीज होती नही उसके बारे में बात काहे करें।’  सही कहा, इन नेताओं के पास या तो आत्मा होती नही और अगर कंही अपवाद स्वरूप होती भी है तो चुनाव आने तक सोती रहती हैं।

इसी तरह के एक नेता हैं, राम बिलास पासवान, इन्होंने आत्मा की आवाज पर दलबदल करने में पीएचडी कर रखी है, इनकी आत्मा की आवाज हर चुनाव के पहले इनको आवाज देकर कहती हैं, जा, जीतने वाले पक्ष की तरफ पालाबदल कर। आजकल मोदी की हवा देखकर ये एनडीए के पाले में है, कल कहां होंगे खुद इनको नही पता।

अब ये अकेले दलबदलू नेता हैं, एेसा नही है, अजीत सिंह, झारखंड मुक्ति मोर्चा वाले, मायावती और भी ढेर सारे नेता हैं जो आत्मा की आवाज वाली सियासत करते हैं, विचारधारा गयी तेल लेने।

मोबाइल पर ब्लॉग लिखना कठिन है, इसलिए अभी लेख समेटते हैं, मिलते रहिये और पढते रहिए मेरा पन्ना।

धन्यवाद सुप्रीम कोर्ट

आज बहुत दिनो बाद ब्लॉग लिखने बैठा हूँ, समझ मे नही आता कि क्या लिखू, हमेशा की तरह अपने व्यस्त होने का बहाना बनाऊ या फिर फेसबुक/ट्विट्टर पर अतिव्यस्त होने का रोना रोऊँ. ब्लॉग लेखन एक अलग तरह का लेखन है, जिसमे आपको टाइम देना पड़ता है. फेसबुक और ट्विट्टर फास्ट फ़ूड कि तरह है, जब मन किया ट्वीट कर लिया. जबकि  ब्लॉग लेखन एक पूरे भोजन की तरह है. आप पाठकों तक अपनी बात ठीक ढंग से पहुंचा सकते है.

आज खबर देखी कि सुप्रीम कोर्ट ने मतदाताओं को राईट टू रिजेक्ट का विकल्प उपलब्ध करवाया है,सीधे शब्दों में, इसका मतलब है कि वोटर को लगता है कि एक भी उम्मीदवार उसके वोट के लायक नहीं है और यह बात दर्ज करवाना चाहता है ताकि बाद में बोगस वोटर उसके वोट का बेजा इस्तेमाल न कर लें. इसका मतलब है कि यदि आप चुनाव में खड़े सभी प्रत्याशियों को रिजेक्ट करना चाहते है तो आप अब कर सकते है. अभी यह तय नहीं है कि इसका प्रयोग आने वाले आम चुनावों तक हो सकेगा अथवा नहीं. अभी तक यह सुविधा दुनिया के कुछ चुनींदा देशों में ही उपलब्ध थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से भारत के मतदाता भी इस नयी सुविधा  का प्रयोग कर सकेंगे.

कुछ भी हो, यह निर्णय भारत के लोकतंत्र में एक मील का पत्थर साबित होगा. धन्यवाद सुप्रीम कोर्ट आपके इस निर्णय का हम तहे दिल से स्वागत करते है.

आज से मैंने अपने ब्लॉग को लिखने के लिए विंडोज लाइव राइटर  और भाषा इण्डिया सॉफ्टवेयर का प्रयोग कर रहा हूँ, हो सकता है इस लेख को लिखने में कुछ मात्रा वगैरह की गलतियाँ दिखे,कृपया उसे अनदेखा करियेगा. धीरे धीरे मेरा हाथ नए वाले सॉफ्टवेर पर सध जाएगा. यदि किसी को लाइव राइटर पर हिंदी शब्दकोष का पता हो तो जरूर बताये.

तो फिर आते रहिये और पढते रहिये, आपका पसंदीदा ब्लॉग मेरा पन्ना.

 

होली का हुड़दंग

आज होली है, इंटरनेट और फ़ेसबूक पर सभी दोस्त यार एक दूसरे को होली की शुभकामनाएँ दे रहे है। लेकिन हमारी स्थिति अजीब है, हम ऑफिस में बैठे हुए अभी भी उन ऊलजुलूल सॉफ्टवेयर और प्रोजेक्ट मैनेजमेंट  में व्यस्त है, हमारे यहाँ कुवैत में सारे त्योहार वीकेंड यानि शुक्रवार/शनिवार को शिफ्ट कर दिये जाते है, वो भले ही होली/दिवाली हो या किसी भी महानुभाव का जन्मदिन, बंदा ऊपर बैठे बैठ गुजारिश करता है कि भाई मेरा जन्मदिन आज है आज ही मना  लो, मेरी आत्मा को शांति मिलेगी, लेकिन ना, यहाँ वाले कुछ नहीं सुनते, बोलते हैं मनाएंगे तो वीकेंड में ही, खैर हमे क्या, हमे तो जब मनाने को बोलोगे तब मना लेंगे। खैर बात हो रही थी, होली की।

हम वैसे तो अपने मोहल्ले की होली को विस्तार से लिख चुके हैं, अगर आपने ना पढ़ी हो तो हमारे ये दोनों लेख जरूर पढ़ लें, ताकि सनद रहे और वक्त जरूरत काम आए। मजा आए तो टिप्पणी जरूर करिएगा।
फाल्गुन आयो रे भाग एक
फाल्गुन आयो रे भाग दो

तो जनाब सबसे पहले तो आप सभी को होली की बहुत बहुत शुभकामनाएँ। होली का नाम सुनते ही लोगो में जोश भर जाता है, हालांकि अब वो पहले जैसी बात नहीं रही। हमारे जमाने में होली की तैयारियां तो लगभग एक महीने पहले से करी जाती थी। वो वानर सेना की मीटिंग, होली मनाने के तरीके, झगड़े, पंगे, कमीज फटाई, मार कुटाई, लगभग पूरी संसद जैसा माहौल था। निर्णय वही होता था, जो हम चाहते थे, लेकिन बिना ये सब किए मजा नहीं आता था, इसलिए होली का पहला आइटम यही होता था। अब जब निर्णय हो चुका हो तो अगला काम होता था, एक कमेटी बनाना जो होली के पूरे आयोजन की देखरेख करेगी। फिर चंदे के लिए बड़े बकरों माफ करिएगा चंदा दानदाताओं की पहचान करी जाती थी, फिर उनसे निवेदन (?#$#@ करके ) किया जाता था कि भई होली है, आप भी थोड़ा लोड उठाओ। अगर हम आपको ये नहीं बताते कि हम होली का चंदा इकट्ठा कर रहे है, आप समझते कि हम राष्ट्रीय चुनाव कि बात कर रहे है। चंदे का खेल ऐसा ही होता है, होली का चंदा हो या राष्ट्रीय चुनाव। अब हम चंदे कि पूरी प्रक्रिया पिछले लेख में बता चुके हैं, इसलिए हम दोबारा नहीं लिखेंगे।

Holi Image

होली वाले दिन पूरा हुड़दंग होता था, लाउडस्पीकर का शोर, वही घिसे पिटे पुराने होली गीत से शुरू होते होते, हेलन (भई हमारे जमाने में सिर्फ वही आइटम नंबर करती थी, हीरोइने तो सिर्फ नखरे ही दिखाती थी ) के गीतों तक पहुंचा जाता था। कभी कभी कुछ बाजारू भोजपुरी गीतों को भी चलाया जाता था, लेकिन किसी के ठीक से  समझ में आने पहले ही हटा लिया जाता था। ये सब हम कुछ पुराने ठरकी बुजुर्गो की विशेष फरमाइश पर चलाते थे, जिनकी जोशे जवानी तो एक्सपायर हो चुकी थी, लेकिन उमंगे अभी भी जवान थी। ये सब मुफ्त में नहीं होता था, इसके लिए बकायदा विशेष चंदा वसूला जाता था।

शुकुल की विशेष मांग पर चमचम रेडियो वाले की बात लिखी जा रही है। चमचम रेडियो वाले के दो ही शौंक थे, भांग खाना और नवाबी शौंक। अब नवाबी शौंक क्या होता है, हम यहाँ पर नहीं लिख सकते, शुकुल से पूछा जाए। होली पर भांग का विशेष इंतेजाम किया जाता था, इसके लिए चंदे के पैसों में पूरा प्रोविज़न रखा जाता। चमचम रेडियो वाला (हम उसका नाम भैयाजी रख लेते हैं), तो भैयाजी भांग बहुत खाते थे, हमेशा आँखें चढ़ी चढ़ी रहती थी। मोहल्ले में पूरी तरह से बदनाम था, अक्सर अपने में ही खोया रहता था, पूछो कुछ तो जवाब कुछ और देता था, लेकिन अपने काम में माहिर था। अब मोहल्ले में लाउडस्पीकर किराए पर देने वाली भी इकलौती दुकान थी, इसलिए भैयाजी के अलावा हमारे पास कोई और जुगाड़ भी नहीं था। फिर ऊपर से हमे भैयाजी के अलावा उधार भी कौन देता, हमारी कौन सी  अच्छी साख थी? तो फिर लाउडस्पीकर के लिए भैयाजी फ़ाइनल। अब भैयाजी की वर्माजी कि मँझली बिटिया से सेटिंग थी।  अब ये कैसे हुई, अरे भई, हम मोहल्ले में लाउडस्पीकर लगवाने के लिए जगह का सर्वे कर रहे थे, तब वर्माजी की बिटिया खिड़की से झांक रही थी, बस वहीं भैयाजी और वर्माजी की बिटिया के बीच आखें दो और पौने चार हुई। अब पौने चार कैसे, यार भैयाजी की बायीं आँख थोड़ी कम खुलती है ना इसलिए। तो फिर जनाब, भैयाजी अटक गए, बोले सेटिंग हो गयी है, लाउडस्पीकर तो वर्माजी के घर में ही लगेगा, सबने समझाया लेकिन भैयाजी नहीं माने. हम भी ताड़ गए थे, कि माजरा क्या है, खैर हमने शर्त रख थी, जगह का चुनाव  भैयाजी का, लेकिन पेमेंट कितना और कब मिलेगा, वो  हमारी मर्जी। कहते हैं प्यार में आदमी (सिर्फ आदमी, औरत क्यों नहीं?) अंधा हो जाता है, अब भैयाजी के प्यार के अंधेपन का हम लोगों ने  फायदा ना उठाया तो फिर क्या किया।  तो फिर डील हो गयी, डिसाइड हो गया लाउडस्पीकर वर्माजी के द्वारे ही लगेगा। बिजली के बिल का पंगा था ही नहीं, उस जमाने में कटिया लगाना भी एक शौंक था। फिर मोहल्ले के त्योहार और कटिया न लगे, ऐसे कैसे हो सकता था?  इसलिए फ्री में लाउडस्पीकर घर के बाहर लगे, तो वर्माजी को काहे की परेशानी।

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खैर वर्माजी खुश, भैयाजी खुश, वर्माजी की बिटिया खुश तो हम और आप काहे को चिंता करें। हम भी खुशी खुशी होली मनाएँ। भैयाजी को लाउडस्पीकर के बहाने वर्माजी के घर में एंट्री मिल गयी। वो हर पाँच दस मिनट में लड़की के इशारे होते ही, घर में अंदर हो जाता और फिर तभी बाहर निकलता जब घर के किसी बड़े बुजुर्ग को उसके होने का आभास होता या फिर बाहर वानर सेना वाला  भैयाजी को गालियों से नहीं नवाजता। ये अंदर बाहर ,बाहर अंदर सब कुछ सही चल रहा था, हम डील के हाथों बंधे थे, वानर सेना को पूरी स्थिति की जानकारी नहीं थी, वर्माजी अपने आप में बिजी थे, वरमाइन पकवान बनाने में। लेकिन वो कहते है न, इश्क़ और मुश्क (ये मुश्क क्या होता है?) छिपाए नहीं छिपते, इसलिए बैरी जमाने को भैयाजी के इस प्रेम प्रसंग की खबर लग गयी। हुआ यूं की भैयाजी भांग की पिनक में वर्माजी के घर होली मिलने चले गए और काफी देर घर के अंदर ही रहे, नहीं भाई, होली मिलन कोई गुनाह थोड़े ही है, लेकिन अगर आप होली के दो महीने बाद होली मिलने जा रहे हो तो पक्का पंगा है। वही हुआ, भैयाजी रंगे हाथों (ये मुहावरा गलत है, रंगे हाथों का मतलब आज तक समझ में नहीं आया ) पकड़े गए, फिर जैसा होता है, वही हुआ, लड़की मुकर गयी, इसलिए सिर्फ डांट पड़ी, लेकिन भैया जी, भैयाजी की तो जमकर सुताई हुई। शोर सुनकर मोहल्ले वाले भी हाथ बटाने पहुँच गए।  वर्माजी और मोहल्ले वाले , जब मार मार कर थक गए तो उन्होने पिटाई का काम वानर सेना को आउटसोर्स कर दिया। हम लोग भी पूरे मजे ले लेकर भैयाजी को मारे, हर ऐसी वैसी जगह पर मारा गया, जहां से उनके नवाबी शौंक परवान चढ़ते  थे।  अब चूंकि  भैयाजी ने हमारी वानर सेना के एक वानर को भी अपने नवाबी शौंक का शिकार बनाया था, इसलिए उस वानर ने भी अपनी जमकर भड़ास निकली। इस तरह से भैयाजी को उनके किए (या बिना किए ) की सजा मिली।

खैर हम मुद्दे से न भटके, बात होली की हो रही थी, ये तो भैयाजी को शुकुल पकड़ कर ले आए बीच में। अब होली का जिक्र हो और धरतीधकेल नेताजी (मोहल्ले के छुट भैया नेता, आजकल बहुत नाम और नामा  कमा रहे हैं, नहीं भई, हम उनका नाम नहीं लेंगे, डील है) की बात न हो। हमारे नेताजी का कहना था, कि वो जमीन से जुड़े हुए नेता है। हम लोग इसका नमूना हर होली में, नेताजी को जमीन पर लोटते हुए देखते थे,इसलिए हम भी इस बात की ताकीद करते है कि वो सचमुच जमीन से जुड़े हुए नेता हैं। नेताजी का भाषण, मोहल्ले, शहर, प्रदेश और देश/विदेश की समस्याओं से शुरू होता था, (फिर भांग के पकोड़ों की वजह से ) नॉन वेज चुटकुलों में जाकर भी नहीं थमता था। नेताजी हमारे होली दिवस के सबसे सॉलिड आइटम थे। भंग के पकोड़ो और ठंडाई के बात उनका खुद पर कंट्रोल खतम हो जाता था, जहां इनका कंट्रोल खतम हुआ, वानर सेना ने कमान संभाल ली, फिर नेताजी को कैसे और किस रूप में नाचना है, ये वानर सेना डिसाइड करती थी। नेताजी मधुबाला से शुरू होते थे और हेलेन के कैबरे पर जाकर रुकते थे, अब मोहल्ले वालों  विशेषकर भैयाजी का  बस चलता तो वो उनको सनी लियोने बना देते, लेकिन सड़क का मामला था और फिर भैयाजी भी अभी पिछले पैराग्राफ में पिटा  था, इसलिए उनके इरादों पर पानी फेरा गया। नेताजी को किसी और दिन भैयाजी के हवाले करेंगे।

होली का हुड़दंग शाम तक चलता था, अलबत्ता 12 बजे के बाद हम लोग मोहल्ले के हर घर में होली खेलने जाते थे। ये वाला प्रोग्राम हमारा सबसे सफल प्रोग्राम हुआ करता था, लोग पूरा साल इंतज़ार करते, दूर दूर से ही अपने माशूक़ को देखते रहते, लेकिन घरों में होली खेलने वाले प्रोग्राम में शामिल हो जाते, क्यों? अरे भाई माशूक़ के घर एंट्री मिल गयी थी, वो भी बिना नाम बदनाम हुए। अक्सर उस घर में ज्यादा लोग जाते जहां पर जवान कन्याएँ रहती थी, अब जितने  अंदर जाते, बाहर उतने नहीं निकलते थे, अक्सर गिनती में कमी हो जाती थी। अब जैसे जैसे बंदे कम होते जाते, हम लोग भी होली खेलते खेलते अपने अपने घरों को निकल जाते। वो भी क्या दिन थे? पूरा मोहल्ला एक परिवार की तरह होता था, आपस में गिले शिकवे भी होते थे, लेकिन आपस में प्यार बहुत था। अपने घर का लोग खयाल भले न रखे, पड़ोसी के घर का जरूर रखते थे। यही सब लोगों को जोड़े रखता था। अब कहाँ वो खयाल,  वो किस्से कहानिया, वो होली की मस्तियाँ  , वो त्योहार, वो अपनापन , सब कुछ जैसे यादों में ही सिमट कर रह गया है। खैर होली तो होली ही है, चलो इसी दिन आप लोग सब कुछ भूलकर पड़ोसी के साथ होली मना लें। ध्यान रहे, पड़ोसी से ही मनाएँ, पड़ोसिन से पंगे न लें। आप सभी को होली की बहुत बहुत शुभकामनाएँ।  इसी के साथ मुझे इजाजत दीजिये, नहीं तो कंपनी मेरे को भैया जी बना देगी। आते रहिए पढ़ते रहे आपका पसंदीदा ब्लॉग।

दो मोबाइल का चक्कर….

आप सभी को मेरा प्यार भरा नमस्कार।
आप सभी लोगों से बहुत दिनों बाद मुखातिब हुआ हूँ, क्या करूँ, रोजी रोटी से टाइम मिले तो ही कुछ लिखा जाए। खैर ये सब गिले शिकवे तो चलते ही रहेंगे। चलिये कुछ बात की जाए हमारे आपके बारे में। मै अक्सर दो अपने साथ रखता हूँ, एक मेरा सैमसंग गलक्सी एस2 और दूसरा मेरा प्यारा नोकिया ई71। मेरे से अक्सर लोग पूछते है कि ये दो दो मोबाइल का चक्कर क्या है। मै बस मुस्करा कर रह जाता हूँ। लेकिन पिछले दिनों मिर्जा पीछे ही पड़ गया, बोला तुमको आज बताना ही पड़ेगा कि दो दो मोबाइल, वो भी एक नयी तकनीक वाला और दूसरा पुराना, चक्कर क्या है। तो आप लोग भी मिर्जा के साथ साथ सुनिए।

हे मिर्जा, पुराने जमाने में हमारे मोहल्ले में वर्मा जी रहते थे, (यहाँ वर्मा जी का नाम सिर्फ रिफ्रेन्स के लिए लिया गया है, बाकी के शर्मा,शुक्ल,मिश्रा, वगैरह ना फैले और किसी भी प्रकार की पसढ़ न मचाएँ।) तो बात वर्मा जी की हो रही थी उनके चार बेटे थे। जब भी कोई उनके घर जाता तो शान से अपने सारे बेटों के बारे में बताते थे। एक दिन हम उनके घर गए तो उन्होने हमे अपने बेटो से मिलवाया।

ये मेरा सबसे छोटा बेटा है, डॉक्टर है।
ये मेरा तीसरे नंबर का बेटा है, इंजीनयर है।
ये मेरा दूसरे नंबर वाला बेटा है, वकील है।
और ये मेरा सबसे बड़ा बेटा है, ज्यादा पढ़ लिख नहीं पाया, इसलिए नाई की दुकान चलता है।
हम बमक गए, बोले वर्मा जी, आपने अपने सारे बच्चों को इतना अच्छा पढ़ाया लिखाया और कैरियर मे सेट किया, लेकिन आपका बड़ा बेटा टाट में पैबंद की तरह दिख रहा है, इसको आप अपने दूसरे बेटों के साथ परिचय में शामिल नहीं किया करो। अच्छा नहीं लगता। वर्मा जी धीरे से बोले, “मियां धीरे बोलो, मेरा बड़ा बेटा ही तो घर का खर्च चला रहा है। उसी पर तो पूरे घर का दारोमदार है। उसका परिचय नहीं कराएंगे तो कैसे चलेगा।”

तो हे मिर्जा, उसी तरह मेरे पास भी दो मोबाइल है, एक नयी तकनीक वाला और दूसरा नोकिया वाला, लेकिन आवाज आज भी पुराने वाले मोबाइल से ही अच्छी आती है। नया वाला तो सिर्फ
एप्लिकेशन प्रयोग करने और मन बहलाने के लिए है। सुबह से दिन तक, नए वाले फोन की बैटरी चुक जाती है, नोकिया वाला फोन न हो, लोगों से बात करना मुहाल हो जाये। इसलिए ये नोकिया वाला फोन मेरे घर का नाई वाला बेटा है, उसके बिना सब कुछ सूना सूना सा है। उम्मीद है आप लोगों को भी मिर्जा के साथ साथ मेरे दो दो मोबाइल रखने का मकसद समझ में आ गया होगा। तो फिर इसी के साथ विदा लेते है, मिलते है, अगले कुछ दिनों में।

अपडेट : छोटी बेटी के स्कूल की छुट्टियाँ थी, इसलिए बेगम साहिबा अपने मायके भारत तशरीफ ले गयी है, हम अपनी तशरीफ यहीं पर रखे हुए हैं, क्योंकि कंपनी का कहना है, अभी आप तशरीफ का टोकरा नहीं हटा सकते, सिस्टम हिल जाएगा। इसलिए यहीं बने रहें। अब बेगम साहिबा के बिना जीवन कितना सुखमय/दुखमय चल रहा है, इस बारे में जल्द ही लिखा जाएगा।