दिल्ली वालों का लिटमस टेस्ट

क्या आप दिल्ली से है? यदि हाँ तो आइए जरा आपका लिटमस टेस्ट कर लेते है। हमारे पास एक झकास ’जुगाड़’ है जिससे हमे पता चल जाएगा कि आप कितने प्रतिशत दिल्ली के है। पहले एक डिस्क्लेमर : ये एक इमेल मे मुझको मिला था, मेरा इस पर कोई कॉपीराइट नही है।

तो आइए हम बात कर रहे थे दिल्ली वालों के लिटमस टेस्ट की। यदि आप दिल्ली से है तो इस लेख को जरुर देखें और नीचे दिए प्वाइंट को पढकर आपना स्कोर जरुर जाँचे।  हर सही स्टेटमेंट के लिए एक प्वाइंट, टिप्पणी मे अपना स्कोर देना मत भूलिएगा।

आप दिल्ली के है यदि :

  1. आप सिर्फ़ सोमवार, बुधवार, गुरुवार और रविवार को ही पीते है। मंगलवार को बजरंगबली के द्वारे।
  2. दोस्त को इज्जत देने का मतलब दारु शारु ते कबाब शबाब।
  3. आप अद्दा, पऊवा के बारे मे बखूबी जानते हो।
  4. आपकी पोश कॉलोनी मे भी आलू ले लो, भिंडी ले लो जी आवाजें सुनाई दें।
  5. जब मोहल्ले की औरतें सब्जी वाले से धनिया मिर्च फ्री मे लेने के लिए पंगे लें।
  6. जब आपको सबको मिलने के लिए सिर्फ़ बरिस्ता मे ही टाइम दें।
  7. जब सैटिंग और जुगाड़ आपके प्रिय शब्द हों।
  8. जब आप कुतुबमीनार, लाल किला और लोटस टेम्पिल कभी ना गए हो। क्योंकि आपकी नज़र मे ये सब टूरिस्ट के लिए है।
  9. आप रिक्शे वाले से कम से कम एक बार जरुर झगड़ें हो।
  10. आप  गोलगप्पे वाले से जरुर पूछते हो “भैया! ये आटे के है या सूजी के?
  11. आप हर अजनबी को ’भैया’ बोलते हो।
  12. आप महरौली के किसी फार्म हाउस मे एक शादी मे जरुर गए हो।
  13. आप पंजाबी की सभी गालियां समझते हो और देने मे भी कभी नही चूकें हो।
  14. आप रेस्टोरेंट मे वेटर को बॉस या पाप्पे कहकर बुलाते हो।
  15. आपके अपनी बातचीत मे ’बंदा’, ’फड्डा’ और  ’पंगा’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल जरुर करते हो।
  16. यदि आपको पाप्पे का ढाबा या काक्के दा होटल का बटर चिकन, आपको ताज से भी ज्यादा अच्छा लगता हो।
  17. आपकी नजर मे पूर्वी दिल्ली ’जमुना पार’ हो।
  18. आप एम्स को मेडिकल कहकर पुकारते हो।
  19. लड़कियों के लिए कोडवर्ड यानि टोटा वगैरहा आप बखूबी समझते हो।
  20. आप हर आशिक मिजाज लड़के को ’मजनूं की औलाद’ कहते हो।
  21. आपकी नजर मे, गर्लफ्रेंड होना स्टेटस सिम्बल हो।
  22. आपने कभी भी क्रिकेट मैच की टिकट नही ली, हमेशा ’जुगाड़’ पर निर्भर रहे।
  23. आपकी नजर मे, अच्छा ड्राइवर वही है जो आगे वाले ड्राइवर के मन की बात समझे।
  24. आप ये बताना अपनी तौहीन समझेंगे कि आप आगे वाली गाड़ी को किस तरफ़ से ओवरटेक करेंगे।
  25. यदि आपके घर मे कम से कम दो गाड़ियां और एक मोटरसाइकिल जरुर हो।
  26. आप कनाट प्लेस/लाजपत नगर मे पार्किंग के लिए दो घंटे भटक सकते है, लेकिन अपनी कार ले जाना नही छोड़ते, क्योंकि आपकी नजर में “अपनी कंवेन्स होवे ना तो बड़ी कन्वेनियंस होन्दी है।”
  27. आप कम से कम पंद्रह दिनो मे एक बार पड़ोसी से पार्किंग को लेकर जरुर झगड़ें हो।
  28. आप ट्रैफिक पुलिस वाले को कम से कम एक बार रिश्वत जरुर दे चुके हो।
  29. आपकी नजर मे फार्महाउस का मतलब शादी पार्टी वाला घर ही होता हो।
  30. आपकी नजर मे जुगाड़ ही सबकुछ है, भले ही सिनेमा की टिकटे चहिए या बच्चे का स्कूल मे दाखिला।
  31. यदि आपने कम से कम एक बार विक्रम होटल के सामने अंडा पराँठा, धौला कुँआ का ’बन-आमलेट’, करोल बाग की कुल्फी, इंडियागेट के गोलगप्पे, मद्रास होटल का डोसा और चाँदनी चौक की चाट जरुर खायी हो।
  32. भले ही मेट्रो रेल दिल्ली की शान होगी, लेकिन आप तो अपनी गाड़ी से ही ’सफर’ करते हुए जाएंगे।
  33. आप हर साउथ इंडियन को ’मद्रासी’ समझते हो।
  34. और आपकी नजर मे हर नार्थ इस्टर्न ’चिंकी’ हो।
  35. आप हमेशा मुम्बई वालों से अपनी तुलना करते हो।
  36. आप चिड़ियाघर (Zoo) अपनी स्कूल पिकनिक पर ही गए हो।
  37. आप हर शहर मे उम्मीद करें कि दस एफएम स्टेशन होने चाहिए।
  38. आप दिन मे कम से कम एक बार जरुर कहेंगे ’दिल्ली रहने लायक जगह नही रही’, लेकिन फिर भी कभी छोड़कर नही जाएंगे।
  39. इत्ता सबकुछ होने के बाद आप दिल्ली को प्यार करते हो।
  40. आप हमेशा गाते रहे ’दिल्ली है दिलवालों की’

जाते जाते : मुम्बई और दिल्ली वाले एक दूसरे के शहर को बुरा बता रहे थे।
दिल्ली वाला : मुम्बई तो ’चिविंग गम’ की तरह है, एक ही लाइन मे बसी हुई।
मुम्बई वाला : और तुम्हारी दिल्ली, ऐसा लगता है किसी ने पान की पीक उड़ेल दी हो, हर जगह छितरी छितरी हुई सी बसी है।

बुढापे की चिंता

हर व्यक्ति को अपने बुढापे की चिंता होती है, जाहिर है मुझे भी है। सारी जिंदगी तो हम विदेश मे नही रह सकते है ना, कभी ना कभी तो वापस अपने वतन लौटना ही होगा। बच्चों की जिम्मेदारी ने निबटने के बाद, जीवन संध्या मतलब बुढापे मे तो हम चाहेंगे कि हम अपने हम उम्र लोगों के साथ ही रहे, ताकि आखिरी समय भी पूरी मौज मस्ती से कटे। इन्ही सभी चीजों को ध्यान रखकर मैने अपने बुढापे के लिए एक रिटायरमेंट रिसोर्ट की खोज करनी शुरु की। यह खोज जाकर समाप्त हुई आशियाना उत्सव पर। पिछ्ली पोस्ट मैने वही से लिखी थी। आइए कुछ आगे बात करें।पिछली संक्षिप्त पोस्ट मैने भारत मे गुड़गाँव के पास भिवाड़ी के रिटायरमेंट रिसोर्ट से लिखी थी। मैने आपसे वादा किया था कि वहाँ तक पहुँचने की कहानी जरुर बताऊंगा। आज मौका मिला है तो क्यों ना आपसे कुछ गपशप कर ली जाए।

मै वहाँ पर आशियाना उत्सव रिटायरमेंट विलेज मे था। हुआ यूं कि दो वर्ष पहले आशियाना उत्सव के विवेक भाई कुवैत पधारे और उन्होने अपना रिटायरमेंट विलेज का प्लान मुझे दिखाया और निवेश करने के लिए आमंत्रित किया। प्रोजेक्ट अनूठा था, प्रोपर्टी भी सही रेट पर मिल रही थी। अब जैसा कि आपको पता ही है हम ठहरे सिन्धी मांढू, इसलिए बिना प्रोपर्टी देखे और सिर्फ़ कागजों पर देखकर तो हम इन्वेस्ट करने से रहे। प्रोपर्टी को देखकर ही निवेश का निश्चय किया। काफी टाइम बीत गया, बात आई गई हो गयी, हर बार विवेक भाई हमसे आने के लिए बोलते, लेकिन इस बार हम उनको मना ना कर सके। सो हमने विवेक भाई का निमंत्रण स्वीकार किया और सीधे सीधे भिवाड़ी लैंड कर गए। इस बार की विजिट रिटायरमेंट रिसोर्ट मे अपार्टमेन्ट खरीदने के लिए ही थी।

भिवाड़ी, दिल्ली के पास, गुड़गाँव से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर, अलवर जिले का एक औद्योगिक नगर है। यह हरियाणा राजस्थान के बोर्डर पर स्थित है। यहाँ पर राजस्थान सरकार के उद्योग स्थापित करने के लिए काफी सुविधाएं प्रदान की हुई है, इसलिए दिल्ली/एनसीआर की ढेर सारी फैक्ट्रियां यहाँ पर स्थापित है। गुड़गाँव के पास होने के कारण दिल्ली के ढेर सारे बिल्डर आजकल भिवाड़ी मे अपार्टमेंट बनाने मे लगे हुए है। इन्ही बिल्डरों मे से एक प्रमुख बिल्डर है आशियाना ग्रुप। आशियाना ग्रुप ने यहाँ पर ढेर सारे अपार्टमेंट काम्प्लेक्स बनाए है, जिनमे सबसे प्रमुख है आशियाना उत्सव।

आशियाना उत्सव, देश का पहला रिटायरमेंट रिसोर्ट है, यानि कि एक ऐसी जगह जो सिर्फ़ और सिर्फ़ सीनियर सिटीजन्स के लिए आरक्षित है। आशियाना उत्सव मे हर वो सुविधा है जो कि बुजुर्गो के लिए जरुरी है, जैसे क्लब, गार्डन, जिमखाना, एक्टिविटी सेंटर, पूजाघर, ग्रासरी स्टोर, योगा सेंटर, इंटरनैट कैफ़े, क्लीनिक और ढेर सारी अन्य सुविधाएं। पूरा काम्प्लेक्स तिहरी सुरक्षा व्यवस्था से लैस है, जगह जगह पर क्लोज सर्किट कैमरे लगे है जिनसे बुजुर्गों सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जाती है। यहाँ पर एक से तीन बैडरुम के अपार्टमेंट उपलब्ध है। बाकी जानकारी आपको इनकी वैबसाइट पर मिल जाएगी। आशियाना उत्सव को बीबीसी और अन्य मीडिया ने काफी बार अपने चैनल पर दिखाया है। यह भारत का पहला रिटायरमेंट रिसोर्ट है।

मैने यहाँ पर एक दो बैडरुम का अपार्टमेंट अपने बुढापे के लिए खरीदा है। इस तरह से मै भी आशियाना उत्सव का हिस्सा बन गया हूँ। नियमानुसार मै 55 साल का होने से पहले, यहाँ पर रह नही सकता, इसलिए मैने अपने अपार्टमेंट को किराए पर चढा दिया है। यदि आप भी अपने रिटायरमेंट के लिए कोई सही स्थान चुन रहे है तो मेरे विचार से आशियाना उत्सव एक अच्छी प्रापर्टी है। आशियाना वालों ने भिवाड़ी के अलावा पुणे और जयपुर मे भी रिटायरमेंट रिसोर्ट बनाए है। किसी भी प्रकार के निवेश के पहले आप अपने निवेश सलाहकार से मशवरा अवश्य करें।

आतंकवाद पर सरकारी वक्तव्य और मिर्जा की प्रतिक्रिया

लीजिए पेश है आतंकवाद पर कुछ सरकारी वक्तव्य और उनपर हमारे एक्सपर्ट मिर्जा साहब की प्रतिक्रिया। मिर्जासाहब हमारे ब्लॉग सबसे पुराने पात्र है। नए लोगों को मिर्जा साहब का थोड़ा परिचय दे दिया जाए। मिर्जासाहब लखनऊ से है, जुबान अवधी लेकिन गालियां देने मे कानपुरियों को भी मात करते है। उनका ऐसा कोई वाक्य नही होता जिसमे गाली नही होती। अलबत्ता ये गालियां देने मे इत्ता जरुर ध्यान रखते है कि गालियां लोगो को ना दी जाएं, मतलब बात करते करते वे कभी एसी, कभी गाड़ी और कभी सोफे को ही गालिया दे देते है। व्यक्ति विशेष (अगर वो उपस्थित हो तो) उसको गालियां देने से परहेज किया जाता है। मिर्जासाहब नेताओं से बहुत चिढते है, बस आप चर्चा छेड़ दो, उसके बाद माहौल मे रह जाती है मिर्जा की बाते, नेता और गालियाँ। यहाँ पर मिर्जा की प्रतिक्रियाओं को सेंसर  (गालीमुक्त) करके छापा जा रहा है।

तो जनाब बात हो रही थी आतंकवादी घटना के पहले और बाद की सरकारी प्रतिक्रियाओं की और इन प्रतिक्रियाओं का मिर्जा द्वारा पोस्टमार्टम।

किसी आतंकवादी घटना के पहले

  • हमारी सीमाए सुरक्षित है। (फिर भी आतंकवादी टहलते हुए आ जाते है।)
  • देश मे सभी आतंकवादियों की गतिविधियों पर कड़ी निगाह है। (निगाहो से निगाहे मत मिला, हमले के पहले धर दबोचो।)
  • हम जमीन के हर इंच की रक्षा करेंगे। (इंचीटेप के आर्डर के लिए टेंडर अगले महीने मंगाए जाएंगे)
  • हर संवेदनशील जगह पर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए है। (कैमरे का ठेका, नेताजी के साले को दिया गया है।)
  • आतंकवादियों का हौसला पस्त है। (पस्त नही, वे लोग व्यस्त है, आप शुतुरमुर्ग की तरह रेत मे सर डालकर खतरा टल जाने का सोच रहे हो)
  • कड़ी चौकसी के कारण आतंकवादी किसी नयी योजना को अंजाम नही दे पा रहे। (अलबत्ता हैडली जैसे लोग आराम से रेकिंग कर पा रहे है, और हमें हवा भी नही लगती।)
  • केंद्र और राज्यों के बीच सूचनाओं के आदान प्रदान का अच्छा तालमेल है। (यही तालमेल हमले के बाद के परस्पर विरोधी बयानों से जाहिर हो जाता है।)
  • हम पाकिस्तान से तब तक बातचीत नही करेंगे जब तक वहाँ पर आतंकवादी कैम्प बन्द नही होते। (जिस दिन अंकल सैम ने आदेश किया, हम दंडवत वार्ता को राजी हो जाएंगे।)
  • पाकिस्तान से बातचीत की जा सकती है, आखिरी फैसला कैबिनेट लेगा। (अंकल सैम ने लगता है फोन कर दिया है।)
  • पाकिस्तान से बातचीत मे अगले महीने होगी। (लगता है अंकल सैम ने दबाव बढा दिया है।)

किसी आतंकवादी घटना के समय/उपरान्त

  • लश्कर ने इसको अंजाम दिया है। (किसी का भी नाम लगा दो, कौन सा प्रूव करना है।)
  • आतंकवादियों को बख्शा नही जाएगा। (पहले पकड़ो तो, जिनका पकड़ा है उनको ही दमाद बनाकर रखा है।)
  • सभी देशवासी एकजुट है। (और कोई विकल्प है क्या? )
  • आतंकवादी काफी समय से प्लानिंग कर रहे थे। (और हमारा सूचनातंत्र सो रहा था।)
  • ये राज्य सरकार की चूक है। (अक्सर ठीकरा राज्य सरकार पर ही फूटता है।)
  • केंद्र सरकार से हमले की आशंका की सूचना थी, लेकिन सटीक जानकारी नही दी गयी थी। (अगली बार आपको पूरा कार्यक्रम पहले फैक्स किया जाएगा, तब तक आप हाथ पर हाथ धरकर बैठिए।)
  • ये केंद्र सरकार की चूक है। (हम पहले ठाकरे जैसे नेताओं से फुरसत मिले तब तो सुरक्षा व्यवस्था देखें।)
  • सीसीटीवी कैमरे नही थे। (नेताजी के साले साहब पैसा डकार गए।)
  • सीसीटीवी कैमरे काम नही कर रहे थे। (किसी ने स्विच हटाकर मोबाइल चार्जर लगाया हुआ था।)
  • हम आतंकवादियों को जल्द पकड़ लेंगे। (बस खबर लग जाए, कि ये लोग कहाँ छिपे है।)
  • कुछ संदिग्ध लोगों को पकड़ा गया है। (नही भई, वे लोग बेकसूर है, ये तो हमारे वोटबैंक है, दिग्विजय सिंह जल्द ही उन लोगों से मिलकर उनकी रिहाई की आवाज उठाएंगे।)
  • आगे से ऐसी कोई घटना होगी तो भारत चुप नही बैठेगा। (यानि जैसे पहले एक्शन लिया था, वैसा ही लेंगे।)

यदि आपके पास भी ऐसी कोई प्रतिक्रिया है तो लिख डालिए, चुप मत बैठिए, कम से कम ऐसे ही भड़ास तो निकले। आते रहिए पढते रहिए आपका पसंदीदा ब्लॉग।

धूम्रपान कैसे छोड़ें?

आइए आजकुछ बात करते है धूम्रपान (Smoking) छोड़ने की। वैसे तो धूम्रपान की आदत को छोड़ना आसान नही होता, लेकिन यदि आप मेरे लिखे कुछ प्वाइंट्स के आजमाएंगे तो यकीनन आप धूम्रपान की आदत से छुटकारा पा जाएंगे। इसके पहले मै आपको कुछ बताना चाहूंगा। स्कूल/कालेज टाइम मे मैने भी स्मोकिंग के ढेरो रिकार्ड तोड़े थे, हर सिगरेट, बीड़ी और सिगार को ट्राई किया था। ट्राई क्या जी, एक सिगरेट बुझती नही थी और दूसरी जलाने के लिए मन मचलने लगता था। ऐसा कोई ब्रांड नही था जो हमने ट्राई नही किया था। जाहिर है संगत भी वैसी थी। लेकिन आज अगर कोई बगल मे खड़ा होकर सिगरेट पीता है तो धुंए से दिक्कत होती है। तो आइए हम अपने अनुभव से कुछ प्वाइंट बताते है जिससे आप अपनी (अथवा अपने साथियों की) स्मोकिंग छुड़वा सकते है। हो सकता है आप हमारे कुछ अनुभवों से सीख ले सकें, अन्यथा आप इन अनुभवों को दूसरे धूम्रपान करने वालों को बता सकते है।

1. अपने परिवार की फोटो अपने पास रखें
आप अपने परिवार की एक ग्रुप फोटो अपने पास जरुर रखें। जब भी आप सिगरेट पीजिए, तो धुंए के आरपार उस फोटो को देखिए। वैसे भी असली जिंदगी मे यही होता है, सिगरेट आप पीते है, और आपका पूरा परिवार पैसिव स्मोकिंग झेलता है। धुंए के पार फोटो देखने से आपको लगेगा कि आप सिगरेट पी रहे है, लेकिन धुंआ आपका परिवार झेल रहा है। यकीन मानिए धीरे धीरे आपको अपनी सिगरेट पीने की आदत से चिढ होने लगेगी। बस इसी पल का इंतजार करिए। अगला प्वाइंट पढिए।

2. दॄढ निश्चय
सबसे पहले तो आप यह निश्चय करें कि आप सिगरेट छोड़ना चाहते है। कारण चाहे कोई भी हो, लेकिन बिना आपकी मर्जी के, कोई भी आपसे सिगरेट नही छुड़वा सकता। ये बात आपके अंदर से ही आनी चाहिए, तभी कुछ आगे बात बनेगी। हो सके तो सिगरेट छोड़ने के कारणो को आप एक डायरी मे लिखें और हर रोज सोने से पहले उस डायरी के पन्ने को पढें।

3. कसम मत खाएं
कभी भी जल्दबाजी या आवेश मे आकर सिगरेट छोड़ने की गलती नही करें। यदि आप तैश मे आकर सिगरेट छोड़ने की कसम खाते है तो यकीनन आपका दिमाग अगले ही पल कसम तोड़ने के बहाने तलाशने लगेगा। इसलिए सिगरेट छोड़ने का फैसला पूरे होशो हवाश, बिना आवेग मे आकर करें।

4. आत्मसंयम
दॄढ निश्चय के बाद दूसरी सबसे जरुरी चीज जो आपको चाहिए होगी, वो है आत्मसंयम। यदि आप अपने ऊपर कंट्रोल नही रख पाएंगे तो सारा किया धरा धुंए मे उड़ जाएगा। इसलिए आत्मसंयम और आत्मनियंत्रण बहुत जरुरी है। हो सकता है शुरु शुरु मे दिक्कत आएं, लेकिन आप कर सकते है।

5. सिगरेट का स्टॉक हटाएं
जिस दिन आपने सिगरेट छोड़ने का मन बनाया, अपना सिगरेट का पुराना स्टॉक, पनवाड़ी को वापस करे दें यदि वो ना ले तो चौकीदार तो होगा। वैसे मुझे उम्मीद है, आप अपने आसपास सिगरेट/बीड़ी पीने वालों का पूरा रिकार्ड रखते होंगे। इसलिए आपके लिए सिगरेट का स्टॉक खपाना कोई बड़ी बात नही होगी। जब भी आपको सिगरेट की तलब लगे, तो आप जाकर एक जी हाँ सिर्फ़ एक सिगरेट लेकर आएं।

6. अपनी क्लास अलग बनाएं
सबसे पहले तो आप अपने आपको भीड़ से अलग माने। अपना अलग ब्रांड की सिगरेट ही पीजिए। यदि लोग गोल्डफ़्लेक पीते है तो आप मार्लबोरो पीजिए, कोशिश करिए ऐसी सिगरेट की आदत बनाए जो दूसरे लोगो के हाथों मे ना दिखे। कोशिश करिएगा कि वो सिगरेट आपके पड़ोस के पनवाड़ी की दुकान पर ना मिलती हो। दूर जाकर लाना पड़े।

From MeraPannaPhoto


7. सिगरेट को समय से जोड़े
अक्सर लोग जब खुश होते है तो सिगरेट पीते है, दु:खी होते है तो सिगरेट पीते है, टेंशन मे है तो पीते है और आनन्द अनुभूति मे भी सिगरेट पीते है। सबसे पहले तो आपको सिगरेट की फ्रिक्वेंसी पर लगाम लगानी पड़ेगी। आठ घंटे या दस घंटे मे एक सिगरेट। यदि आप चेनस्मोकर है तो आठ घंटे की फ्रिक्वेंसी सैट करिए और यदि आप दिन मे कभी कभार पीने वाले है तो 48 घंटे की फ्रिक्वेंसी सही रहेगी। वैसे यह व्यक्ति दर व्यक्ति अलग हो सकती है, सबसे बेहतर आप स्वयं ही जान सकते है कि कौन सी फ्रिक्वेंसी आपके लिए वाजिब रहेगी।

8. सिगरेट के दुश्परिणामो पर पढें
आपके पास कम से कम एक किताब तो ऐसी जरुर होनी चाहिए जिसमे सिगरेट पीने के बुरे परिणामो के बारे मे लिखा हो। कोशिश करिएगा कि उस किताब मे कुछ चित्र भी हो। जब भी आपके पास खाली समय हो, उस किताब के पन्ने जरुर पलटिएगा। वैसे भी इंटरनैट खंगालने पर आपको ऐसी ढेर सारी वैबसाइट मिल जाएंगी।

9. अपनी ऐशट्रे को साफ मत करिए
ध्यान रखिएगा, आप जितनी चाहे सिगरेट पीजिएगा, लेकिन अपनी ऐशट्रे को साफ मत करिएगा, ये आपको याद दिलाती रहेगी कि आपने कितनी सिगरेट पी है। हफ़्ते के हफ़्ते (अथवा हर पंद्रह दिनो में) आप अपनी ऐशट्रे मे बुझी सिगरेटों की गणना करिएगा, और निश्चय करिएगा कि अगली गणना मे यह संख्या और कम हो। यदि आप अलग अलग जगहों पर सिगरेट पीते है, ध्यान रखिएगा आप बुझी सिगरेट की बट अपने साथ घर ले आएं और घर मे एक गिलास मे सारे बट डालकर रखें, ताकि आपको यह पी हुई सिगरेट की याद दिलाता रहे।
10. सिगरेट गुल्लक
आप एक गुल्लक बना सकते है प्रत्येक सिगरेट पीने पर उसमे दस रुपए डालने का प्रण लें। जब उसमे कुछ अच्छे खासे पैसे हो जाएं तो बच्चों के लिए कुछ काम की चीज लाएं, जैसे अलार्मक्लॉक वगैरहा जो आपको लगातार दिखती रहे। यदि आप अपने ऊपर इस तरह का शुल्क ना लगाना चाहे तो सिगरेट ना पीने से होने वाली बचत को भी इस गुल्लक मे रख सकते है। ध्यान रखिएगा, इस बचत से होने वाले फायदे और सिगरेट पीने से होने वाले नुकसानों की तरफ़ आपका ध्यान दिन मे एक से अधिक बार जाएं।

उम्मीद है उपरोक्त सभी प्वाइंट आपने गाँठ बांध लिए होंगे। आप इनको आजमाने की कोशिश करिएगा, यकीन मानिए, मैने अपनी सिगरेट की आदत ऐसे ही छोड़ी थी, यदि मै छोड़ सकता हूँ तो आप क्यों नही?

हो सकता है आपके पास भी अपने कुछ अनुभव हो, तो लिख डालिए यहाँ टिप्पणी मे अथवा अपने ब्लॉग पर, हमे उसका लिंक देना मत भूलिएगा। तो फिर आते रहिए पढते रहिए आपका पसंदीदा ब्लॉग।

फिर मिले सुर…

मिले सुर मेरा तुम्हारा… कुछ याद आया? राष्ट्रीय एकता और सदभावना पर 1988 मे बना यह गीत जब पहली बार पंद्रह अगस्त को दिखाया गया तो कई लोगो ने सोचा कि यह कांग्रेस सरकार का प्रचार है, लेकिन कब यह गीत हमारे दिलों को छू गया,पता ही नही चला । इसकी लोकप्रियता कुछ इस कदर बढी कि लोग बार बार लगातार इस गीत को देखना/सुनना पसन्द करने लगे। इस बार 2010 मे इस गीत को दोबारा बनाया गया है, बोल वही है, लेकिन परिकल्पना अलग है। आप भी देखिए।

ये रहा भाग दो

वीडियो साभार यूट्यूब डाट काम

गीत दो भागों मे फिल्माया गया है, दोनो के लिंक ऊपर दिए हुए है। यह गीत आज भी हम सभी मे राष्ट्रीयता की भावना को जगाता है, जिसकी आज देश को बहुत जरुरत है। कुछ लोगों का कहना है कि इस गीत मे बॉलीवुड का तड़का कुछ ज्यादा ही है। लेकिन जब भी कोई नयी चीज बनती है तो आलोचनाएं तो कुछ होती ही है। उसलिए उन आलोचनाओं को दरकिनार करते हुए भावनाओं को समझते हुए, गीत को देखिए। रही बात तड़के की तो आप अपना नया संस्करण बना सकते है, उसमे सिर्फ़ ब्लॉगिंग वालो का ही तड़का दीजिएगा। है कि नही?

आपको कैसा लगा ये गीत?
इसमे दिखाए गए कलाकारों मे से कितनों को आपने पहचाना?
क्या इसका नया संस्करण आप नही बना सकते? तो फिर देर किस बात की है, उठाइए कैमरा और बनाइए अपना संस्करण, अपलोड करने के लिए यूट्यूब तो है ना। तो कब दिखा रहे है आप अपना संस्करण?

सम्बंधित लिंक
फिर मिले सुर भाग एक
फिर मिले सुर भाग दो
मिले सुर मेरा तुम्हारा (मूल रुप में)

दिल ढूंढता है…फुर्सत के रात दिन

आजकल इस भागदौड़ भरी जिंदगी मे थकना मना है, नही नही भाई मै कोई प्रोडक्ट बेचने की कोशिश नही कर रहा हूँ, बस इस भागदौड़ भरी जिंदगी से दूर कुछ पल आराम से गुजारने की सलाह दे रहा हूँ। आजकल हम लोग दिन भर ऑफिस/दुकान पर काम करते है, और शाम होते ही इस बोझ पर अपने कंधो पर उठाकर अपने घर ले जाते है। जिसका कारण है बढती हुई प्रतियोगिता या कहें गला काट प्रतियोगिता। लेकिन क्या ये बोझ घर ले जाना जरुरी है? हम क्यों ऑफिस की टेंशन घर ले जाते है?

अभी पिछले दिनो भारत यात्रा के दौरान मैने देखा, मेरे पुराने मित्र, नयी जीवनशैली मे रंग चुके है। उनकी जीवनशैली मे अप्रत्याशित तेजी आ चुकी है, ऑफिस मे काम का भारी दबाव है, पति पत्नी अगर दोनो काम करते है तो एक दूसरे के लिए समय निकालना काफी मुश्किल हो रहा है। इसका नकारात्मक प्रभाव उनकी पारिवारिक जिंदगी पर हो रहा है। पहले ऐसा नही था, आस पास के कुछ वर्षो मे ही ये बदलाव देखने के मिला है। लैपटाप मोबाइल के आने से यह बोझ बढता ही जा रहा है। जिंदगी तनाव मे गुजर रही है जिससे स्वभाव मे चिड़चिड़ापन बढ रहा है और ढेर सारी बीमारियां जैसे इस शरीर मे प्रवेश करने के लिए तैयार बैठी दिख रही है।

लेकिन क्या यह तनाव जरुरी है? विदेशो मे भी लोग काम करते है, शायद इससे ज्यादा ही करते होंगे, लेकिन मैने उनको तनावग्रस्त कम ही देखा है। शायद वे जितना मेहनत करने मे विश्वास रखते है, उतना ही अपनी व्यक्तिगत जिंदगी को जीने मे भी रखते है। मैने वीकेंड पर शायद ही किसी अंग्रेज को आफिस जाते या काम करते देखा है। वीकेंड को वे लोग पूरी मस्ती से जीते है, अपने परिवार के साथ। इसका मतलब ये कतई नही कि भारतीय वीकेंड पर मस्ती नही करते, लेकिन मैने उनको वीकेंड पर भी परिवार से ज्यादा अपने काम से जुड़ा पाया। हो सकता है कि भारत मे अभी परिस्थियां कुछ अलग हो। शायद मेरे कुछ भारतीय ब्लॉगर साथी इस पर कुछ प्रकाश डाल सकें।

Fursat

जहाँ तक कुवैत का सवाल है मेरी दिनचर्या कुछ इस तरह है। मै सुबह लगभग पाँच बजे उठता हूँ, थोड़ी देर योगा करता हूँ, चाय पीने के बाद आधे घंटे की वॉक जरुर करता हूँ, सम्भव हो सका तो पास के गार्डन मे और छुट्टी वाले दिन तो पक्का समुंद्र के किनारे जाता हूँ। लौट कर नहाना और ऑफिस के लिए तैयार होना। सात से तीन बजे तक ऑफिस, फिर चार बजे तक घर वापसी। वैसे तो मेरी कम्पनी मेरे को घर पर परेशान नही करती लेकिन जब भी जरुरत होती है, मै उपलब्ध रहता हूँ। मेरे सारे एप्लीकेशन ठीक से चल रहे है कि नही, उनका लेखा जोखा मेरे इमेल पर आता रहता है, अगर जरुरत पड़ती है तो मै कंही से भी उनको देख/ठीक कर सकता हूँ। घर पहुँचकर लंच के बाद एक घंटे की नींद फिर शाम की दिनचर्या, कुछ देर परिवार,टेनिस, टीवी, दोस्तों मे निकलता है, फिर रात की वॉक। डिनर तो मै करता नही, कुछ फल/दूध लेकर कुछ पढते हुए, बिस्तर की तरफ़ बढ लेते है। इस तरह दिन पूरा निकल जाता है। हाँ इस बीच बीबीजी की शॉपिंग और ब्लॉगिंग के लिए भी समय चुराया जाता है। वीकेंड पर रुटीन एकदम अलग है। वीकेंड पर पूरा समय सिर्फ़ परिवार को ही दिया जाता है, अक्सर मोबाइल को साइलेंट रखकर, गैरजरुरी इमेल वगैरहा को वीकडे पर टालते हुए सिर्फ़ और सिर्फ़ परिवार के साथ पूरा समय बिताने की कोशिश करता हूँ। हाँ इस बीच कभी कभी सामाजिक कार्यों (जैसे उपकार संस्था) अथवा ब्लॉगिंग के लिए भी समय निकाला जाता है। आपकी क्या दिनचर्या है?

सवाल ये है कि हम इस भागदौड़ भरी जिंदगी मे अपने परिवार को कितना समय देते है? देते भी है कि नही? क्या ऐसा तो नही इस भागदौड़ मे हम अपने परिवार को भुला ही बैठे है? आपका क्या कहना है इस बारे में?

बीत गया ये साल भी

लो जी, ये साल भी गुजर गया। ऐसा लगता है कि अभी अभी ही तो साल शुरु हुआ था, इत्ती जल्दी खत्म भी हो गया, लगता है इस साल को पर लग गए, तभी तो जल्दी जल्दी निकल गया। हम भी इस साल कुल जमा तीस लेख ही लिख पाए, बकौल मिर्जा लानत है ऐसे ब्लॉगर पर। शुकुल भी बोलते है तुमको शरम आती है कि नही? अब का करें, इत्ता जल्दी जल्दी जो निकल गया इ साल, सोचते ही रह गए, लिखने का टाइम ही नही मिला। अब साल के जल्दी निकलने की टेंशन हमसे ज्यादा तो कामनवेल्थ गेम्स की तैयारियां कराने वालो को है। समय निकला जा रहा है इनकी तैयारियां लगता है अगले ओलम्पिक तक भी पूरी ना हो सकेंगी। ज्यादा से ज्यादा होगा ये कि आखिरी टाइम मे इस्तीफ़ा विस्तीफा देने का नाटक होगा। अब आप भी कहेंगे कि क्या लेकर बैठ गए, इसलिए चलो उनको उनके हाल पर छोड़ते है, आइए बात करते है कुछ और। Read the rest of this entry »

एक संक्षिप्त पोस्ट भारत से

साथियो बहुत दिनो बाद लिख रहा हूँ, क्या करुं रोजी रोटी के बाद जो समय मिलता है परिवार को देने मे निकल जाता हूँ, इस समय मै भारत यात्रा पर हूँ, गुडगाँव के पास भिवाडी मे एक रिटायरमेंट रिसोर्ट मे हूँ, यहाँ तक कैसे पहुँचा इसकी कहानी अगली बार, अभी तो सिर्फ ये सूचना देना चाहता हूँ कि यदि किसी चिट्ठाकार को मुझसे मिलना हो तो अमित गुप्ता (भारीभरकम ब्लागर) या बैंगानी भाईयौ (अहमदाबाद वाले)से मेरा नम्बर प्राप्त कर सकता है। कल ही कुछ पुराने चिट्ठाकारो से मुलाकात हुई, काफी अच्छी रही, इसका विवरण अमित गुप्ता अपने चिट्ठे पर् करेंगे। बाकी का लेखा जोखा लौटने पर, तब तक के लिए नमस्कार।

चिट्ठा चर्चा और मेरे अनुभव

साथियों, आज चिट्ठा चर्चा अपनी 1000वी पोस्ट लिख रहा है, इस अवसर पर चिट्ठा चर्चा की टीम को ढेर सारी बधाईयां एवं भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामनाएं। जैसा कि आपको पता है कि मै भी चिट्ठा चर्चा से जुड़ा रहा हूँ, ढेर सारे चिट्ठों की चर्चाएं की है। आइए कुछ अवलोकन करें उन पुराने अनुभवों का।

चिट्ठा चर्चा की शुरुवात
मेरे ख्याल से 2004 की बात है, उस समय हिन्दी ब्लॉगजगत मे गिने चुने ब्लॉगर ही हुआ करते थे। उस समय हिन्दी ब्लॉगिंग को आगे बढाने और उसका प्रचार प्रसार करने पर पूरा जोर था। हम लोग कोई भी मंच और कोई भी अवसर, हिन्दी ब्लॉगिंग को प्रचारित प्रसारित करने के लिए नही छोड़ते थे। अक्सर भाई लोग अंग्रेजी ब्लॉगों पर हिन्दी मे टिप्पणियां कर आया करते थे, जिसे कुछ अंग्रेजी ब्लॉग वाले अपनी तौहीन समझकर हटा दिया करते थे, लेकिन कुछ अच्छे ब्लॉगर भी होते थे, उन टिप्पणियों को अपने ब्लॉग पर लगाए रखते थे, इस तरह से लोगों को पता चलता था कि हिन्दी में भी ब्लॉगिंग हुआ करती है।

बात शुरु हुई थी ब्लॉग मेला से। यजद ने अपने ब्लॉग पर ब्लॉग मेला आयोजित किया था, जिसमे हम लोगों ने भी शिरकत की थी। इस तरह से हम लोगों अंग्रेजी ब्लॉग वालों के साथ सब कुछ सही चल रहा था। फिर बारी आयी मैडमैन के ब्लॉग मेले की, जिसमे हम लोगों ने शिरकत की थी, वहाँ पर मैडमैन ने हिन्दी चिट्ठों की समीक्षा करने से साफ़ साफ़ मना कर दिया। ऊपर से एक जनाब, जो अपने को सत्यवीर कहते थे ने हिन्दी को एक क्षेत्रीय भाषा कह दिया और सुझाव दिया कि आप लोग अपना अलग से मंच तलाशो। बस फिर क्या था, इस पर मुझे, अतुल, देबाशीष और इंद्र अवस्थी को ताव आ गया, हम लोगों ने उनको अंग्रेजी मे ही पानी पी पी कर कोसा। काफी कहासुनी हुई, मेरे विचार से अंग्रेजी-हिन्दी ब्लॉगिंग का वो सबसे बड़ा फड्डा था। नतीजा ये हुआ कि मैडमैन ने अपनी उस पोस्ट पर कमेन्ट ही बन्द कर दी।

उनकी नजर मे मसला वंही समाप्त हो गया, लेकिन हमारे दिलों मे एक कसक रह गयी थी। जिसका नतीजा चिट्ठा चर्चा की नीव के रुप मे सामने आया। चूंकि चिट्ठे कम थे, इसलिए मासिक चर्चा हुआ करती थी, फिर ब्लॉग बढने के साथ साथ इसको पंद्रह दिनो, सप्ताह मे और अब तो रोज (कई कई बार तो दिन मे कई कई बार) ही चिट्ठा चर्चा होती है। काफी दिनो तक चिट्ठा चर्चा, चिट्ठा विश्व के साथ जुड़ी रही, फिर चिट्ठा विश्व मे कुछ समस्याएं आयी, तब नारद का उदय हुआ, धीरे धीरे और भी एग्रीगेटर आएं। लेकिन चिट्ठा चर्चा लगातार जारी रही। इसकी पूरी कहानी शुकुल की जुबानी ये रही।


चर्चाकारों के छिटकने की कहानी
चूंकि चिट्ठा चर्चा मे सिर्फ़ ब्लॉग की पोस्ट के बारे मे संक्षेप मे लिखकर उसका लिंक दे दिया जाता था। इसलिए धीरे धीरे इसमे नयापन जाता रहा। इससे चर्चा करने वालों का मन उचट गया, फिर नयी टीम की खोज शुरु हुई, कई नए लोग आए, चर्चा मे विविधिता लाए। यदि आपको चिट्ठा चर्चा के विभिन्न रंग देखने है तो पुरानी चर्चाओं को पढिए, सचमुच दिल खुश हो जाएगा। हमने भी काफी दिन चर्चाएं की थी, शुकुल ने हमारा दिन मुकर्रर कर दिया था, हर तारीख पर गवाही देने जाना पड़ता था। अगर नही जाते तो शुकुल का तगादा शुरु हो जाया करता था। तगादा भी ऐसा वैसा नही, इस तगादे में उलहाना और उँचे स्तरों का गाली गलौच (ऐसी गालियां जो सुनने मे तारीफ़ लगें) भी शामिल हुआ करता था। कभी कभी तो लगता था जीटॉक खोलें ही ना। मेरे विचार से ठलुवा (इंद्र अवस्थी) ने ब्लॉगिंग से सन्यास इसलिए लिया कि शुकुल उसको चिट्ठा चर्चा का सोमवार का ठेका दिए हुए था। बंदे ने सोचा ना ब्लॉगिंग करेंगे और ना ही चर्चा। यही कुछ हाल अपने अतुलवे का भी हुआ। खैर शुकुल डटा रहा और बाकायदा आज तक मोर्चे पर डटा हुआ है, डंडा हाथ मे लेकर सबसे तगादा करता रहता है। शुकुल के इस ज़ज्बे को सलाम।

मौजूदा स्वरुप और भविष्य के लिए सुझाव

मेरे विचार से चिट्ठा चर्चा का मौजूदा स्वरुप काफी अच्छा है, चूंकि एक ब्लॉग पोस्ट का अस्तित्व अगली पोस्ट आने तक ही होता है, इसलिए चिट्ठा चर्चा की अहमियत काफी बड़ी है। चिट्ठा चर्चा को वर्तमान स्वरुप मे चर्चा करते रहने के साथ साथ कुछ और भी करना चाहिए। मेरे कुछ सुझाव है :

  • चिट्ठा चर्चा का मासिक अंक निकालना चाहिए, जिसमे उस महीने के अच्छे चिट्ठों के बारे में उल्लेख हो।
  • यदि सम्भव हो तो, हिन्दी अखबारों से सम्पर्क करके उन्हे साप्ताहिक चिट्ठा चर्चा की पीडीएफ़ फाइल भेज दी जानी चाहिए।
  • ब्लॉग मेला, कहानी लेखन प्रतियोगिता टाइप के आयोजन चिट्ठा चर्चा के तत्वावधान मे किए जाने चाहिए।
  • नए चिट्ठाकारों को आगे लाने के लिए उनको चिट्ठा चर्चा मे शामिल किया जाना चाहिए।
  • चर्चाकारों की टीम बी(Team B) बनायी जानी चाहिए, ताकि यदि एक टीम चूक गयी तो दूसरी टीम अपनी चर्चा के साथ तैयार रहें।

एक बार फिर चिट्ठा चर्चा की टीम को बहुत बहुत शुभकामनाएं। चिट्ठा चर्चा इसी तरह पाँच हजार, दस हजार, लाख…… का आँकड़ा छूती रहे और आगे बढती रही। इन्ही शुभकामनाओं के साथ…….

अनदेखा करिए

हैलो टेस्टिंग,
कृप्या इस पोस्ट को इग्नोर करिए। इग्नोर मतलब अनदेखा करिए।
हैलो टेस्टिंग,
कृप्या इस पोस्ट को इग्नोर करिए। इग्नोर मतलब अनदेखा करिए।

दद्दा अब देखो, आ गयी क्या?