
जब भी कोई हिन्दुस्तान से आता है और पूछता है कि तुम्हारे लिये क्या लाऊँ…..कोई बोलता है ये ले आओ वो ले आओ….हमारे मिर्जा साहब को तो काजू कतली बहुत अच्छी लगती है, ऐसा नही है कि कुवैत मे नही मिलती लेकिन हिन्दुस्तान की तो बात ही कुछ और है. लेकिन मेरे साथ मामला कुछ अलग ही है, जब भी कोई पूछता है कि तो ना जाने क्यों मेरे मुँह से निकल जाता है ढोढा. अब आप पूछेंगे कि ढोढा क्या होता है. अरे भाई ये एक हरयाणवी मिठाई, जो एक बार आपके मुँह लग जाये तो फिर जल्दी नही उतरती…हमारे सारे रिश्तेदार भी जानते है कि मिठाई मेरी कमजोरी है, और ढोढा बोलें तो…….क्या करें कन्ट्रोल ही नही होता. सो इस बार भी हमारी सासू मा जब भारत से पधारी तो ढोढे का पैकैट लेकर ही आयी, एक और बात हरियाणा मे ढोढा कई तरह से बनता है सो थोड़ा बहुत स्वाद मे फर्क आ सकता है. ये बहुत ही हाई कैलोरी वाला प्रोडक्ट होता है, अगर आपके यहाँ मिलता हो जरूर चखियेगा.
अब ढोढे के बारे मे ज्यादा जानकारी तो पंकज भाई ही दे सकेंगे. हम तो बस इतना ही कहेंगे कि जिसने ढोढा नही खाया उसने हरियाणा नही देखा…………है ना पंकज भाई.
आप इन्हे भी पसंद करेंगे
- नवम्बर 9, 2007 -- ब्लॉगिंग सम्बंधी कुछ कार्टून/चुटकुले (15)
- अगस्त 20, 2007 -- अपहरण, फिरौती, डॉन और बीमा कम्पनी (4)
- अगस्त 7, 2007 -- चोर, नैकलेस और केले.. (7)
- अगस्त 1, 2007 -- अनुगूँज 24: हिन्दुस्तान अमरीका बन जाए तो कैसा होगा – पाँच बातें (11)
- अप्रैल 17, 2007 -- गुल्लू (ट्रक ड्राइवर) का इन्टरव्यू (14)
- अप्रैल 16, 2007 -- हाय! हम अंग्रेज क्यों ना हुए? (10)
- नवम्बर 20, 2006 -- लड़कियॉ क्या चाहें – रीडर्स च्वाइस (14)
- नवम्बर 19, 2006 -- अभी ख़त्म नही हुआ, जारी है| (2)
- नवम्बर 15, 2006 -- लड़कियाँ क्या चाहे? (39)
- अगस्त 23, 2006 -- टेलीमार्केटिंग वालों की काट (20)
This entry was posted
on सोमवार, जनवरी 24th, 2005 at 12:15 am and is filed under आपबीती.
You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed.
You can leave a response, or trackback from your own site.
Author: Jitendra Chaudhary (507 Articles)

जन्म से कानपुरी, लेकिन रोटी के लिये मिट्टी से दूर, साफ़्टवेयर बनाते बनाते कब ब्लॉग लिखने लगे, पता ही नही चला। फिर कुछ शरारती तत्वों ने लेखन की तारीफ़ दी, अब झेलो, कानपुरी हूँ, इत्ती जल्दी तो नही रुकने वाला। इंटरनैट के लती। लेखन शैली में श्री के पी सक्सेना जी से प्रेरित। भारतीय राजनेताओ से खासी चिढ,वैसे भी तारीफ़ के लायक तो कोई काम किए नही ये लोग। भारत की सामाजिक एवम राजनैतिक दुर्दशा से व्यथित। इसी व्यथा का ही नतीजा है कि हम ब्लॉगिंग मे कूदे। आजकल कुवैत मे डेरा है, यही पर बसेरा है। अब देखते है कब तक हम इस खूंटे डेरे से बंधे रहते है।
सपनाः हिन्दी इन्टरनेट की आधिकारिक भाषा बने।
पसन्दः राजनीतिक चर्चा, बचपन की यादें।
नापसन्दःनहाने के बाद,पत्नी द्वारा,बाथरूम मे वाइपर लगाने को बाध्य किया जाना
मेरे बारे मे बाकी जानकारी इधर है:
मेरा पन्ना पर टिप्पणी करने वालों के लिए एक तोहफा। आप टिप्पणी करिए और अपने ब्लॉग का पता सही सही भरिए, हम आपके ब्लॉग की आखिरी पोस्ट का लिंक यहाँ दिखा देंगे। इससे आपके ब्लॉग को कुछ और पाठक मिलेंगे। है ना सही चीज? तो फिर देर किस बात की है, शुरु हो जाइए।
मुझे तो ढोढे की आदत मोहाली आने के बाद ऐसी लगी कि दिन में एक किलो साफ कर देता था ।
अब जब भी जयपुर जाना होता है, कम से कम 3 किलो ले जाना होता है । सब की फरमाइश रहती है ।
ढोढा से हमारा दोस्ताना चार-पाँच वर्ष पुराना ही है और हम महीने में एक बार तो ढाई-तीन सौ ग्राम तो निपटा ही देते हैं। वैसे शायद आप यह सुन कर और जल-भुन जाएँ कि गुड़गाँव में मेरा ठिकाने ओम् स्वीट्स से अधिक दूर नहीं है
हाँ अगर कूरियर से ये आइटम पहुँच सकता है तो बताएँ मैं प्रयास कर सकता हूँ
और हाँ मेरे फायरफॉक्स में आपका चिट्ठा भी ठीक नहीं दिख रहा। क्या मेरा ब्लॉग ठीक दिख रहा है आपको?
white cotton dresses
white cotton dresses