ढोढा

ढोढा

जब भी कोई हिन्दुस्तान से आता है और पूछता है कि तुम्हारे लिये क्या लाऊँ…..कोई बोलता है ये ले आओ वो ले आओ….हमारे मिर्जा साहब को तो काजू कतली बहुत अच्छी लगती है, ऐसा नही है कि कुवैत मे नही मिलती लेकिन हिन्दुस्तान की तो बात ही कुछ और है. लेकिन मेरे साथ मामला कुछ अलग ही है, जब भी कोई पूछता है कि तो ना जाने क्यों मेरे मुँह से निकल जाता है ढोढा. अब आप पूछेंगे कि ढोढा क्या होता है. अरे भाई ये एक हरयाणवी मिठाई, जो एक बार आपके मुँह लग जाये तो फिर जल्दी नही उतरती…हमारे सारे रिश्तेदार भी जानते है कि मिठाई मेरी कमजोरी है, और ढोढा बोलें तो…….क्या करें कन्ट्रोल ही नही होता. सो इस बार भी हमारी सासू मा जब भारत से पधारी तो ढोढे का पैकैट लेकर ही आयी, एक और बात हरियाणा मे ढोढा कई तरह से बनता है सो थोड़ा बहुत स्वाद मे फर्क आ सकता है. ये बहुत ही हाई कैलोरी वाला प्रोडक्ट होता है, अगर आपके यहाँ मिलता हो जरूर चखियेगा.

अब ढोढे के बारे मे ज्यादा जानकारी तो पंकज भाई ही दे सकेंगे. हम तो बस इतना ही कहेंगे कि जिसने ढोढा नही खाया उसने हरियाणा नही देखा…………है ना पंकज भाई.

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Author: Jitendra Chaudhary (507 Articles)

जन्म से कानपुरी, लेकिन रोटी के लिये मिट्टी से दूर, साफ़्टवेयर बनाते बनाते कब ब्लॉग लिखने लगे, पता ही नही चला। फिर कुछ शरारती तत्वों ने लेखन की तारीफ़ दी, अब झेलो, कानपुरी हूँ, इत्ती जल्दी तो नही रुकने वाला। इंटरनैट के लती। लेखन शैली में श्री के पी सक्सेना जी से प्रेरित। भारतीय राजनेताओ से खासी चिढ,वैसे भी तारीफ़ के लायक तो कोई काम किए नही ये लोग। भारत की सामाजिक एवम राजनैतिक दुर्दशा से व्यथित। इसी व्यथा का ही नतीजा है कि हम ब्लॉगिंग मे कूदे। आजकल कुवैत मे डेरा है, यही पर बसेरा है। अब देखते है कब तक हम इस खूंटे डेरे से बंधे रहते है। सपनाः हिन्दी इन्टरनेट की आधिकारिक भाषा बने। पसन्दः राजनीतिक चर्चा, बचपन की यादें। नापसन्दःनहाने के बाद,पत्नी द्वारा,बाथरूम मे वाइपर लगाने को बाध्य किया जाना मेरे बारे मे बाकी जानकारी इधर है:

6 Responses to “ढोढा”

  1. अरे किस चीज की याद दिला दी। ये ढोढा की आदत कैसे पढ़ गई जनाब। अपना भी ढोढे से बहुत याराना है। बढ़िया ढोढा गुड़गाँव व रोहतक वाली साइड बनता है। अम्वाला चंडीगढ़ वाले भी कोशिश करते हैं पर वह बात नहीं आ पाती। तो अमरीका वापिस आते हुए मौसी जी जो कि गुड़गांवा में ही रहती हैं मेरे इस प्रेम को जानते हूए दिल्ली हवाई अड्डे पे छोड्ने भी आती हैं और दो डिब्बे भी साथ में ले कर आती हैं। इस बार मैं श्री मती जी से पहले आ गया था व जब वसुधा को आना था तो मौसेरा भाई जो कि ढोढा ले कर आ रहा था ट्रैफिक में फस गया। तो वसुधा जी बिना ढोढे के ही सुरक्षा में प्रवेश कर गई। पर जानती थी कि बिना ढोढे के मेरा मन बहुत टूटेगा तो अंदर से मोबाइल पर फोन लगाया गया और जब भैया आखिर में पहुंचे तो सिर्फ वे दो डिब्बे जुगाड़ लगा कर अंदर पहुँचाए गए।

  2. एक और बात मैंने यहाँ अमरीका में भी हल्दीराम की जो पैकड मिठाई आती है वाला ढोढा खाया है और काफी सही है। शायद इसलिए की हल्दीराम वालों की ढोढे की फैक्टरी गुड़गाँव के पास ही है।

  3. सच कहा।
    मुझे तो ढोढे की आदत मोहाली आने के बाद ऐसी लगी कि दिन में एक किलो साफ कर देता था ।
    अब जब भी जयपुर जाना होता है, कम से कम 3 किलो ले जाना होता है । सब की फरमाइश रहती है ।

  4. जीतू भइया,

    ढोढा से हमारा दोस्ताना चार-पाँच वर्ष पुराना ही है और हम महीने में एक बार तो ढाई-तीन सौ ग्राम तो निपटा ही देते हैं। वैसे शायद आप यह सुन कर और जल-भुन जाएँ कि गुड़गाँव में मेरा ठिकाने ओम् स्वीट्स से अधिक दूर नहीं है ;) हाँ अगर कूरियर से ये आइटम पहुँच सकता है तो बताएँ मैं प्रयास कर सकता हूँ :-)

    और हाँ मेरे फायरफॉक्स में आपका चिट्ठा भी ठीक नहीं दिख रहा। क्या मेरा ब्लॉग ठीक दिख रहा है आपको?

  5. white cotton dresses

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  6. आप सभी ने तारीफ तो ऐसी की है कि अब रहा नहीं जाता। अरे भाई लोगों इस ढोढा की तस्वीर, रेसिपी आदि की कोई लिंक तो दो या आप ही बताओ कि यह क्या है? कम से कम देख-पढ़ तो लें।

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