समयाभाव और नारद की जिम्मेदारी
आज दिल व्यथित है, बहुत ज्यादा। कुछ चिट्ठेकारों द्वारा नारद संचालकों की निन्दा किए जाने और अनर्गल आरोप लगाने के बाद और कुछ लोगों द्वारा उसको बढावा दिए जाने के बाद। आज मै आत्मचिन्तन करने पर मजबूर हो गया हूँ, कि आखिर हम इतना सब किसके लिए कर रहे है, ऐसे लोगों के लिए, जिन्हे इतनी समझ नही कि वे अपनी मनमानी ना होने पर, किसी की भी बेइज्जती करने से ना चूकें या उनके लिए जो इन लोगों को परोक्ष रुप से उकसा रहे है या फिर उनके लिए जो मूकदर्शक बने सब कुछ देख रहे है। सवाल तो कई है, लेकिन जवाब अभी नही मिल सके है। ये खुला पत्र बहुत बेतरतीब लिख रहा हूँ, शायद मै शब्द ही नही ढूंढ पा रहा हूँ।
हमने जब नारद शुरु किया था तब लोगों ने विश्वास की भावना थी, लोगो ने काम करने की लगन थी, एक दूसरे की इज्जत थी और सबसे बड़ी बात आपसी समझ थी। किसी भी मुद्दे पर हम खुलकर सामने आते थे। कई बातों पर हम सहमत नही भी होते, लेकिन सामूहिक बात पर हमेशा एक दूसरे का साथ देते। नारद की साइट बनाकर और सफलतापूर्वक चलाकर, हमने दिखा दिया कि हाँ ऐसे सामूहिक प्रोजेक्ट भी सफ़ल हो सकते है। अपने दिन का चैन और रातों की नींद, घर परिवार की लानते पाकर भी टीम नारद ने इस प्रोजेक्ट को बनाया। क्या यह साइट बनाने मे किसी एक व्यक्ति या टीम का हित था?
नारद हमेशा सही निर्णय करे ये सम्भव नही। एक अकेले व्यक्ति का निर्णय कभी कभी गलत भी हो सकता है, इसी वजह से मै हमेशा सामूहिकता का पक्षधर रहा हूँ। इसी वजह से मै निर्णयों मे सभी को शामिल करने की वकालत करता रहा हूँ। हमने कोशिश की भी। नारद के निर्णयों से कोई जरुरी नही कि नारद सभी सहमत हो, लेकिन यदि आलोचना की भी एक सीमा होती है। और पक्षपात का आरोप तो कतई सहन नही किया जाएगा।
आज के माहौल मे मुझे नही लगता कि सामूहिकता नाम की कोई चीज बची है। हर व्यक्ति के मन मे जो आता है बोल देता है, बिना कुछ आगा पीछा सोचे। मेरे विचार से, अपनी निजी व्यस्तताओं के बावजूद, नारद पर मैने सबसे बहुत ज्यादा समय दिया है। लेकिन इन सब बातों को नए लोगों को कोई सरोकार नही। हमने अपना काम कर दिया है, आगे भविष्य के कर्णधार आकर दिखाए कि उनमे कितना माद्दा है।
आज मै बहुत गम्भीरता पूर्वक नारद और अक्षरग्राम से सम्बंधित दूसरे प्रोजेक्ट्स से हटने की सोच रहा हूँ।
आत्म मंथन जारी है…….जल्द ही किसी निर्णय पर पहुँचता हूँ।


















































लड़ने भीड़ने में मैं भी कभी पीछे नहीं रहा, मगर अनर्गल प्रलाप सहन नहीं होता.
मेरे मन में आपकी छवि एक सच्चे और उत्साही इंसान की रही है . मैं यह नहीं कह रहा हूं कि आप गलती नहीं कर सकते पर आपमें हमेशा उस गलती को सुधारने का साहस रहा है.
पर यह गलती — नारद और अक्षरग्राम से हटने की — यदि आपने की तो फिर सुधार नहीं हो सकेगा यह याद रखियेगा .
कुछ लोग यदि नारद के संचालकों की निन्दा कर रहे हैं तो उससे भी बड़ी तादात में लोग नारद के संचालकों पर ‘अनकंडीशनल’ भरोसा व्यक्त कर रहे हैं यह तथ्य मत भूलिएगा .
बड़े और दीर्घकालिक लक्ष्य पर ध्यान दीजिए, तात्कालिक आलोचनाओं पर नहीं. मित्रों पर भरोसा कीजिए. जल्दबाज़ी में किसी गलत फ़ैसले पर मत पहुंच जाइएगा. आपका यह फ़ैसला अब सिर्फ़ एक निजी फ़ैसला नहीं होगा इसके दूरगामी परिणाम होंगे . समर्थन में हाथ उठाए खड़ा हूं .
कभी खुद को हटाने का प्रस्ताव! उन्हीं लोगों की पोस्टों से आहत होकर तुम यह सब कर रहे तो यह उन लोगों के साथ तुम्हारा विश्वासघात है जो उन से कई गुना ज्यादा हैं और जो नारद पर इस तरह की हरकतें नहीं देखना चाहते।
इस तरह तुम उनको अपनी हंसी उड़वाने का मौका भी सुलभ करा रहे हो जो हमेशा शंका ग्रस्त रहते हैं कि सारी दुनिया के पास उनका विरोध करने के अलावा कोई काम नहीं है।
तुम शायद भूल गये हो लेकिन तुमको हम याद दिला दें कि नारद के लिये पचास हजार से ज्यादा रुपये उन आम ब्लागर साथियों , तकनीकी गैरतकनीकी लोगों ने दिये हैं जो नारद से जुड़े लोगों पर भरोसा करते हैं। उन लोगों में से शायद किसी एक ने भी नारद की मंशा पर सवाल नहीं उठाया। उनके साथ विश्वास घात करने का हक तुमको किससे दिया बालक! तुम इतने कमजोर पड़ गये कि यह भी भूल गये कि तुम उन लोगों के प्रति जवाबदेह हो जिन्होंने तुम्हारे और नारद से जुड़े लोगों पर भरोसा किया। न कि उन लोगों के प्रति जो केवल और केवल विरोध करने के लिये बने हैं। सैकड़ों लोगों के विश्वास से ज्यादा बड़ी चीज तुम्हारे लिये दो-चार लोगों का अविश्वास हो गया?
तुम कोई खुदा नहीं हो बालक! और जब खुदा के विरोध के लिये भी लोग तर्क गढ़ लेते हैं, तलवारें भांजते हैं तो तुम कौन चीज हो जो बिना छीछालेदर झेले अपना काम कर लोगे?
जो विरोध में हैं उनसे कहो कि वे केवल विरोध करने के बजाय इससे बेहतर काम करके दिखायें। किसी लकीर को काट के छोटा करने का प्रयास करने की बजाय बड़ी लकीर खींच के दिखायें। ये तो बहुत आसान होता है कहना कि नारद यह नहीं कर रहा है, वह नहीं कर रहा लेकिन जो कह रहे हैं वे वैसा करके दिखायें।
चाहे जितना बड़ा तकनीकी सिद्द हो, चाहे कितना बड़ा समर्थ हो उसको ऊलजलूल आरोप लगाने का अधिकार उसकी बुद्दि भले दे लेकिन हम मानते हैं कि उसकी कूबत तब पता चलेगी जब वह अपनी काबिलियत और क्षमता का मुजाहिरा इससे बेहतर काम करके दिखाये।
हनुमान जी की तरह सबके सामने सीना फाड़ के मत खड़ा हुआ करो। जो तुम कर रहे हो वह अपने मन से करो। जो ठीक समझो करो। ये तुम्हारा फुल टाइम काम नहीं है। बीबी-बच्चों, यार-दोस्तों से समय चुराकर जितना कर पाऒ करो, कर ही रहे हो। ये देखोगे कि कौन क्या कह रहा है तो चकरघिन्नी बन जाओगे।
सबसे जरूरी बात यह कि किसी भी आरोप की गरिमा देखो कि आरोप कौन लगा रहा है। उसकी सोच क्या है? वो खुद क्या हरकतें कर रहा है?
यह बताने का कोई मतलब नहीं है कि नारद पर कोई भेदभाव नहीं है। लोग किसी न किसी तरह खोज ही लेंगे कि ऐसे हमारे साथ अन्याय किया नारद के लोगों ने।
लोगों को सोचना चाहिये कि क्यों उनकी लोगों को भड़काने वाली पोस्ट दुबारा पोस्ट होती है बहुत लोग पढ़ते हैं फिर भी कोई इस लायक नहीं समझता उसे कि उस पर कमेंट करे।
बातें बहुत हैं जीतू भाई! सब कहां तक लिखें? लेकिन अनुरोध है कि इस तरह की बातें अपने को
उनकी हरकतों में मत उलझाया करो जो ऐसा ही चाहते हैं।
हमारा समर्थन हमेशा है नारद के साथ। बिना शर्त! तब भी रहेगा। जब कभी मैं किन्ही कारणॊं बस लिखना कम/बन्द कर दूं। तब भी जब शायद मुझ अकेले को नारद की बातें कुछ नागवार लगें। अकेले से समूह हमेशा महत्वपूर्ण होता है। व्यक्ति से समाज हमेशा बड़ा होता है!
नारद के बारे में अगर कोई निर्णय करना ही है तो उन सभी लोगों से पूछकर करो जिन लोगों ने इसके लिये पैसे दिये। (मैंने अभी तक नहीं दिये)।जिन लोगों ने तुम पर भरोसा करके इसमें सहयोग दिया उनसे पूछे बिना रणछोड़दास बनने का तुम्हें कोई हक नहीं। तुम्हें अकेले न निर्णय लेने का अधिकार है न इसे छोड़ने का!
मेरा पूरा समर्थन तुम्हारे साथ है। अगर कुछ बुरा लगा हो तो बुरा मान लेना और हमारी किसी और चैट दोस्त के बारे में लोगों को बता देना!
नारद कोई व्यव्सायिक या किसी व्यक्तिगत लाभ के लिये किया गया कार्य नही है जो इससे जुड़े लोगो के बारे मे अनर्गल प्रलाप किया जाये। हां स्वस्थ आलोचना को मै बूरा नही मानता!
जीतु भाई, आप आलोचना या इन अनर्गल प्रलापो से हटे अच्छा नही लगता, आप डटे रहीये !
आप बात को इस नज़रिये से भी देखें कि लोग नारद की आलोचना इसलिए भी कर रहे होंगे कि नारद उनके मनमुताबिक कार्य नहीं कर रहा तो क्या ऐसी आलोचनाओं से व्यथित होकर नारद का प्रभार छोड़कर पलायन उचित होगा या फ़िर नारद का अपनी जवाबदेही के अनुसार कार्य करते रहना ही उचित होगा।
वैसे भी एक हिंदी गाना यही कहता है कि ” कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना”।
मेरी सलाह है कि आप दो-तीन दिन के लिए नारद और चिट्ठों से दूर होकर ठंडे दिमाग से सोचें। शायद तब आप नतीजे में यही पायेंगे कि पलायन उचित नही हैं।
इसके आगे अब कोई विचार-विचार करने की जरूरत नहीं है। अनूप भाई ने ठीक कहा है, कुछ लोग भयानक रूप से नकारात्मक होते हैं (जथा उलूकहिं तम पर नेहा) , उनके कुत्सित प्रयासों को नजरअन्दाज किया जाय।
आप अपने कीमती वक्त से समय निकाल कर जो कर रहे हैं ये शायद सबके बूते की बात नहीं ।
कुछ लोग “कुछ” कह रहे हैं और बहुत से लोग आपके साथ हैं , आपके किये गये नारद के काम को सराह रहे हैं , फिर संशय कैसा ?
डटे रहिये ।
बेटा : मैंने केला नहीं खाया ।
अब आप भी सेंटी हो लिए…
हम सब जानते हैं कोई कहीं नहीं जाने वाला. आप जाना चाहें तो भी नारद आपको जाने देगा नहीं. एकबार दिल से पूछकर देख लीजिए.
मैं तो गीता की पंक्ति याद रखता हुँ.. कर्म किए जा बस… नारद से एक चीज मिलती है, आत्मसंतुष्टि. बस वही सारी जमापूंजी है.
छोडिए यह सब अब… क्या खालीपीली टेंशन ले रहे हो, और किसके लिए????
दो चार अंट शंट ठोक दो… मन हल्का हो जाएगा.
खैर, अब थोड़ी संजीदगी से बात करें तो मसला ये है कि कुछ लोग-बाग़ कुछ कहते हैं जो कि माकूल नहीं, लेकिन मियां टेन्शन क्यों लेते हो? यह कोई नई बात नहीं है, दुनिया का दस्तूर है। जब भी कोई चीज़ शुरु होती है तो उसको शुरु करने वाले आपस में सहयोग करते हैं और कारवां बढ़ता रहता है, लेकिन बढ़ते कारवां में कुछ न कुछ लोग ऐसे आ ही जाते हैं जिनको शुरुआती दौर में लोगों का किया हुए काम की मालूमात नहीं और वे बदअमनी फैलाने लगते हैं, ज़िम्मेदार लोगों के काम उनको गैर-ज़िम्मेदाराना लगते हैं। मेरा तो यही कहना है कि यह कुदरत का नियम है, कोई नई बात नहीं, इसलिए ऐसे लोग जो कहते हैं कहने दो, हमें अपना काम करना है।
यदि इन लोगों में किसी और बात का दम होता तो अपने असंतोष को वाजिब ठहराते हुए ये दूसरा नारद खड़ा कर अपनी क्षमता का परिचय देते। लेकिन वो बस में नहीं तो इसलिए सिर्फ़ ज़ुबान और बद-मज़े/वाहियात शब्दों से काम चलाते हैं।
इन लोगों में और हममें यह फर्क है कि ये अपना समय खामखा दूसरों की बुराई करने में खराब करते हैं और हम अपने समय का सही इस्तेमाल करते हुए रचनात्मक कार्यों में लगाते हैं जिससे हमें ही नहीं दूसरों को और उन विरोधी लोगों को भी लाभ होता है। यह फर्क है और यह फर्क रहेगा।
और, जो लोग चुप हैं उन्हें अपने से अलग न समझिए। वे आपके साथ हो भी सकते हैं और नहीं भी, लेकिन जो आपके साथ वाले चुप हैं उनको कायर न समझें। उनकी चुप्पी का एक कारण यह भी हो सकता है कि इस तरह के वाहियात विवाद में अपना समय खराब करने से बेहतर वे किसी माकूल कार्य में अपना समय लगाना पसंद करते हैं।
अनिवार्य तो कोई भी कहीं भी नहीं है…..आप गये तो किसी और तरीके से कोई संभाल ही लेगा….पर क्या पलायन आपकी प्रवृति है?
आज आपके पास एक अपना सचमुच का मुद्दा है…क्या आप इसे सही समाधान की तरफ ले जाने में सक्षम हैं?
हम तो आपको मार्गदर्शक की तरह देख रहे थे…क्या आपको मार्ग नहीं दिखाई दे रहा?
या भावनाओं ने उसे भी धुँधला कर दिया है?
किसी भी प्रोजेक्ट को पैदा करना और उसे बड़ा करना प्रसव पीड़ा से कम नहीं है. इस व्यथा को सिर्फ़ प्रोजेक्ट बनाने बाले ही जान कसते हैं.
आपने अपने रोजाना का रिजक कमाने का काम करते हुये अपनी पत्नी एवं बच्चों के समय में से चुराकर नारद को दिया है. यह हम सभी दिल से समझते एवं जानते हैं.
मैं आपके इस कदम का विरोध करता हूं. दोस्त, मुस्कुराओ, और सारा गुस्सा झटक दो.
ना दैन्यम, न पलायनम.
धन्यवाद, आगे से ऐसा न सोचने के लिये ….
वन हू गाट ब्रैग्ड मोस्ट वर्क्ड मोस्ट
यानी अफ़सरों की सबसे ज्यादा गाली खाने वाला व्यक्ति ही सबसे ज्यादा काम करके देना वाला व्यक्ति होता है.
अब आप गाली के भय से काम करना छोड़ दें तो ये दूसरी बात है
वैसे घटना क्रम पढ़ कर लगता है कि लोगों की बातें सुन कर पहले आप को गुस्सा आया होगा, फिर आप उदास हुए होंगे. यही उदासी जब आत्म चिंतन की तरफ ले जाये और सब कुछ किया धरा बेकार होता नजर आये. लगे कि सब व्यर्थ है, तब आप उस अवस्था को प्राप्त होते हैं जिसे विद्वानों ने हिन्दी में डिप्रेशन की संज्ञा दी है. यह सेहत के लिए अति हानिकारक बताया गया है. इस अवस्था से तुरंत उबर जाना चाहिये. हंसते खेलते दिन बिताओ यार. कहाँ के लफड़ों पर नजर गड़ाये हो. हम सभी तो तुम्हारे साथ हैं. देखो, कितने सारे तो यहीं दरवाजे पर खड़े हैं.
कैसे भारतीय हो यार?? चार लोगों ने कुछ अगड़म बगड़म लिख दिया और तुम चले सब छोड़ छाड़ कर. बिना किसी गल्ती के. ये भी कोई बात हुई हम भारतियों के लिये. हम लोगों का रिवाज ऐसा नहीं है, चाहे खेल में हो या राजनिति में. एक तो वो गल्ती करते हैं और फिर सारा देश चिल्ला चिल्ला कर विरोध करता है, तब भी वो हैं कि छोड़ कर जाने तैयार ही नहीं, डटे हैं. आप उल्टा किये दे रहे हैं सारे नियम. एक तो इतना बढ़िया सकारात्मक कार्य कर रहें हैं, जो सबके बस की बात नहीं. दो चार को छोड़कर सब आपके साथ हैं और आप हैं कि छोड़ कर जाने का मानस बना रहे हैं. ऐसा नियम नहीं है, बॉस, यूँ नहीं जाने मिलेगा.
चलो, अब कोई बढ़िया हंसती खिलखिलाती पोस्ट हो जाये.
हम तो समीरजी से भी लेट हो गए। रहा सहा भी वे लिख मारे, अब क्या खाक मौलिक होंगे।
पर देखो हम कल ही लिखे थे ऐसा वैसा कि हम क्या करें…तो ये ऊपर वाले समीरजी ने चिढ़ाया कि कौन कहता है कुछ करो…ब हू हू हू
पर अच्छा अब नारद नहीं, चिट्ठा नहीं, तो क्या करोगे…अब इस उम्र में क्या खाक मुसलमॉं होगे। करते रहिए मिंया जो सबसे बेहतर आता है आपको, ओर वो आप कर ही रहे हैं….
या एक काम और कर सकते हैं…इस सबके अलावा, जो भटके मित्र (पता नही क्यों मुझे वो भी शत्रु नहीं लगते) यह सब कह रहे हैं उन्हें प्रस्ताव दिया जाए कि मित्र एक और अपने सपने का एग्रीगेटर खड़ा करें, विकल्प बनें और ऐसा करने में हमारा जो साथ चाहिए..जितना बस में है देते हैं। कुल मिलाकर हिंदी के ही लिए करेंगे ना..इससे अच्छा क्या है।
रही व्यक्तिगत स्तर पर टीस होने की बात…तो बुरा न मानो..ये दु:खदायी तो है पर नहीं सह पा रहे हो तो लौट ही जाओं क्योंकि बंधु आप से बेहतर कौन जानेगा कि इस राह पर तो यही सब मिलेगा। कोई फूल नहीं इस राह पर। और फिर चूंकि इस पेशेवर हिंदी वालों की दुनिया हूँ इसलिए कह रहा हूँ अभी जब ये लोग पहुँचेंगे असली आरोप-राजनीति तो तब देखना….
अरे पहुँचने तो दो राजेंद्र यादवों को यहॉं…
पढें
और फिर चूंकि इस पेशेवर हिंदी वालों की दुनिया से हूँ इसलिए कह रहा हूँ अभी प्रचार शुरू हुआ है जब ये पेशेवर लोग पहुँचेंगे असली आरोप-राजनीति तो तब देखना….
अरे पहुँचने तो दो राजेंद्र यादवों को यहॉं…
दूसरी ओर भगवान कृष्ण ने जब नरकासुर का वध करके उसके हरम में सर्वहारा 9 लाख 16 हजार नारियों को मुक्त कराया। संसार को कोई भी दूसरा पुरुष उन्हें अपनाने को तैयार नहीं हुआ। कहाँ जाती बेचारी। अनन्तः कृष्ण ने लोकलाज की परवाह न करके सबको अपनी पटरानी के गरिमामय पद पर विराजमान कर ‘पतितों’ को पावन बना दिया।
भारतीय पुराणों में वर्णित इन दोनों आख्यानों में से चुनना है कि राम बनें या कृष्ण? लोग क्या कहेंगे? दुनिया को अपनी अंगुलियों के इशारों पर नचाना चाहेंगे या दुनिया के इशारों पर अपना सिर नोंचते नोंचते अधमरे होना?
नारद पर पिछले चंद लेखों पर मुझे अफसोस है।
जीतू भाई को स्लाम करता हूं।
कब अपने विद्रोही मन ने स्वीकारा
कटी आस्था टूटी मर्यादा ओढ़ें
हम झरने से जिधर हुआ मन बढ़ जाते
कभी न अपना मित्र ! हठी संबल छोड़ें
आंधी बरसातों से यह मन डिगे नहीं
तूफ़ानों से कोई निश्चय झुके नहीं
बेचा करते हैं सौदागर भावुकता
हम जो बेचेण्गें, खरीद खुद ही लेंगें
नारद की मदभरी हवा के झोंके से
सौरभमय हो रहे आज कितने मधुवन
नहीं कभी पनिहारिन से गागर बिछुड़ी
नहीं कभी बादल से सागर बिछेड़े हैं
जैसे राधा का है रहा कन्हाई से
नारद से है मित्र तुम्हारा अनुबन्धन
अब जब आत्मचिंतन कर ही रहें हो तो अपनी इस पोस्ट के बारें में भी कर लेना… रोना हमेशा कमजोर रोते है… और कोई भी कमजोर सिपाही नारद टीम का कर्णधार बना रहे, नारद प्रशंसको को बर्दाश्त नहीं… यह समझ लें।
फटा-फट आँसू पोंछो और काम पर लगो, गलतफहमियाँ हो जाया करती है, चलता है।
एक बात और, नारद ना तो कभी व्यक्तिगत सोच था और ना ही कभी होगा, आप जाना चाहें, बेशक जायें मगर यह ख्याल रखें कि जितना पसीना आपने बहाया है, उतना बहाने वाला कोई विकल्प हो, क्या है?
एक बात और स्पष्ट रूप से समझ लें, आपने नारद को जो समय दिया है, वह किसी और के लिये नहीं, बल्कि अपने लिये दिया है। आपकी अपनी व्यक्तिगत रूचि के चलते दिया है, इसलिये रोना रोकर हास्य का पात्र ना बनें।
हो सकता है मेरा लिखा आपको कटू लगे, मगर विचार करेंगे तो निश्चित रूप से अपनी इस पोस्ट पर आपको हँसी आयेगी।
इतनी टिप्पणियाँ ये स्पष्ट दर्शाती हैं कि लोगों के मन में आपके लिए वही स्नेह है जो हमेशा से रहा है ।
मैं तो इतना जानती हूँ कि नारद ने मुझे एक नया जीवन दिया है, मुझे फिर से अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर दिया है ।
आप अच्छी तरह से जानते हैं कि हममें से अधिकतर को नारद व नारद के जन्मदाताओं से स्नेह है । मैं जानती हूँ कि नारद का निर्माण आपने हमारा आभार पाने को नहीं किया था । अत आभार प्रकट नहीं करूँगी , किन्तु आप यह भी जानते हैं कि हममें से अधिकतर आपका आदर करते हैं । आप एक बार कहते हैं तो अधिकतर हम सब आपकी सलाह मान लेते हैं, फिर बाद में चाहे आपसे तर्क वितर्क करें ।
मनुष्य उम्र से नहीं अपने कामों से आदर पाता है जो मुझ जैसे अधिक उम्र के लोग भी आपको देते हैं । कुछ बनाने में अधिक मेहनत लगती है तोड़ने में बहुत कम । आप एक बार फिर सोचिए कि क्या आपको इतना परेशान होने की आवश्यकता है ? यदि आपको विवाद असह्य लगता है तो सोचिये क्या विवाद होना अस्वाभाविक है ? क्या यह बेहतर नहीं होगा कि नारद असभ्य भाषा व गालियों पर प्रतिबन्ध लगा दे ?
घुघूती बासूती
कुवैत में लगता है कि पारा बहुत ऊपर है।
कुछ आराम करो, पर और ऊर्जा के लिये और इस निश्चय से कि नारद को ऊर्जारहित नहीं करोगे। अरे आने दो कोई और एग्रीगेटर, क्या नारद का महत्व इससे कम होगा? यदि ऐसा हो भी और वह नारद से भी अधिक तकनीकी रूप से समृद्ध हो तब तो और भी अच्छा है पर इससे भी नारद के योगदान (योगदान ही नहीं बल्कि अपने रूप के एकाकी और प्रथम प्रयास) का महत्व नहीं कम होगा, आखिर यह तो नींव के समन है। आने दो और एग्रीगेटर को? यह तो नाराज़गी का कारण नहीं हो सकता।
उदाहरण के लिये क्या आज जो Sun Solaris, BSD, और Linux का रूप ह, उसमें AT&T के Unix के योगदान को नज़रंदाज़ किया जा सकता है? क्या Unix ने कभी कोई आलोचना नहीं झेली होगी?
मुझे नहीँ पता कि किसने क्या कहा, पर क्या फ़र्क पड़ता है? अपना विवेक और धैर्य मत खो और जैसा शुकुल जी ने लिखा, कि मन से यथाशक्ति इसमें समय दो, जब मन भर जाये तब एक और पोस्ट लिख दो।
क्या और भी कहना पड़ेगा? अरे तुम तो स्वयं गीता के रहस्य को जानते हो, फिर यह क्लांत मुख कैसा!
ऐसे लोगों से मेरा कहना है कि भाई नारद को अपना समझोगे तो वो आप का ही है, पराया समझो तो पराया ही लगेगा उसमें क्या किया जा सकता है।
ऊपर प्रियंकर जी की टिप्पणी से सहमत हूँ:
५ आदमी नारद की बुराई कर रहे हैं तो ५०० आपके साथ खड़े हैं।
हर एक से पूछता है, नारद को किसने मार डाला है।
मजाक कर रिया हूँ, लेकिन अब सीरियस बात भाई भारत की तरह डेमोक्रेसी चलाओगे तो ऐसे ही होगा लोग पहले पान खाकर थूकेंगे फिर कहेंगे कि बहुत ही गंदगी रहती है। आप नीचे बताये गये तीन में से कम से कम एक काम करो -
१. नारद पर एग्रीगेटर कुछ हफ्तों के लिये बंद कर दो, चक्का जाम टाईप
या
२. सीधे सीधे घोषित कर दो, नारद ४-५ लोगों के द्वारा चलाया जा रहा है और ये इन्हीं लोगों की पसंद से चलेगा, जिसे मंजूर है वो हमारे साथ आये, जिसे नही वो किनारे कट ले और अपना पिटारा खुद खोल ले।
या
३. मानसिक तौर पर अपने को और मजबूत करिये जैसे जैसे संख्या बढेगी ऐसे वाक्ये भी बड़ते जायेंगे।
जीतू भाई टाईम जिसका जाता है वो ही जानता है, फ्री की मिठाई खाने वाले को उसकी कीमत कहाँ मालूम होती है, हम समझ सकते हैं आपका दुख।
तहँ बैठ महेस गन दोऊ। बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ।।
करहिं कूटि नारदहि सुनाई। नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई।।
रीझहि राजकुअँरि छबि देखी। इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेषी।।… …
अस कहि दोउ भागे भयँ भारी। बदन दीख मुनि बारि निहारी।।
बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा। तिन्हहि सराप दीन्ह अति गाढ़ा।।
दो0-होहु निसाचर जाइ तुम्ह कपटी पापी दोउ।
हँसेहु हमहि सो लेहु फल बहुरि हँसेहु मुनि कोउ।।135।। – रामायण बालकाण्ड
ब्लॉगर भाई-बहनो! नारद जी को नाराज कर कभी उनके अभिशाप के हकदार नहीं बनो! भगवान विष्णु भी नहीं बच पाए!
नारद को हमने एक विचार की तरह खड़ा किया है, यह व्यक्ति आधारित नही है, अलबत्ता कुछ नाम सामने जरुर आते है कि इसने ये किया उसने वो किया। लेकिन सच मानिए, नारद पूर्णत: विचार आधारित है। व्यक्ति रहे या ना रहे, विचार जिन्दा रहेगा। यही हमारा ध्येय है।
नारद पर कार्य पूर्ववत चल रहा है, उसके संचालन और परिचालन मे किसी भी तरह का व्यवधान नही है ना आएगा।
हाँ जीतू, आप सभी के प्यार, स्नेह, आदर और सम्मान को देखकर नतमस्तक है और अपने फैसले पर फिर से गौर करने के लिए मजबूर हुआ है। आशा है फैसला बहुमत के हक मे ही होगा। एक बार फिर से आप सभी की टिप्पणियों, सुझाव, आलोचनाओं के लिए धन्यवाद।
“सीधे सीधे घोषित कर दो, नारद ४-५ लोगों के द्वारा चलाया जा रहा है और ये इन्हीं लोगों की पसंद से चलेगा, जिसे मंजूर है वो हमारे साथ आये, जिसे नही वो किनारे कट ले और अपना पिटारा खुद खोल ले।”
पूरी तरह सहमत हूँ।
ब्लाग अग्रगेट करने से पहले कुछ टर्म्स और कण्डीशन ऐक्सेप्ट करवायें….।
जीतू भाई, शब्दों में बड़ी ताकत है। शब्दों के बनाये हमारे आपसी रिश्तों की दुहाई देते हुए आपसे दो बातें कहूंगा…
पहली बात कि मैं अनूप भैया के सारे शब्द उधार ले रहा हूं और उन्हें मेरे शब्द मानकर आप उन्हें एक बार फिर से बांचो।
और दूसरी बात,
एक विनती करता हूं कि आप एक हफ्ते की छूट्टी ले लो (मेरा मतलब कुवैती कंपनी से छूट्टी नहीं नारद नामक एनजीओ से)। छूट्टी मतलब पूरी छूट्टी… एकदम झांकना भी मत नारद की ओर… मेरा पन्ना पर कुछ मत लिखना… और न ही किसी का चिट्ठा पढ़ना… दिमाग से बोझ हल्का करो… और फिर जब आठवें दिन आप लौटोगे तो मुझे पूरा यकीन है आप चौगुने उत्साह के साथ लौटोगे।
मेरा सुझाव है कि नारद कार्यकारिणी बनाई जाए और पुराने नए सभी विवादित मामलों पर वह अपना फ़ैसला दे. व्यक्तिगत रूप से अब मैं अपनी राय रखना चाहता हूं-
1. सभी चिट्ठाकारों के ब्लाग वापस जोड़े जाएं. यदि कोई नहीं आना चाहे तो यह उसकी राय है किंतु नारद उवाच इसे सार्वजनिक कर दे. जब आना चाहे तब आए.
2. मोहल्ला पर बैन, इग्नोरेंस वगैरह का कोई तुक नहीं है. यह नकारात्मक प्रवृति है. लोकतंत्र के ख़िलाफ़. यदि कोई चिट्ठाकार ग़ैरक़ानूनी कृत्य भी करता है तो भी यह उसका स्वविवेक हैं और सीधे तौर पर वही ज़िम्मेदार है. नारद स्पष्ट कर दे कि फीड एग्रीगेटर का सामग्री से कोई लेना-देना नहीं है.
3. नारद कार्यकारिणी सभी निर्णय सामूहिक तौर पर ले. सदस्यसंख्या विषम हो ताकि बहुमत के आधार पर फैसले हो सकें.
हिन्दी चिट्ठाकार एक बड़े लक्ष्य को लेकर चले हैं जो मूर्त रूप में अब भी अपने साकार होने की प्रतीक्षा कर रहा है. संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को वैश्विक भाषा का दर्ज़ा दिलाना. क्या हम विवादों में फंसकर, या पीड़ा देकर-पाकर लक्ष्य से नहीं भटक रहे हैं?
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